गुरुवार, 20 अगस्त 2026

गया डायरी- 3 (अहिल्याबाई होलकर विष्णु मंदिर और गौङ ब्राह्मण)

 

फाल्गु नदी के पावन तट पर बहती मंद बयार में मातोश्री अहिल्याबाई होलकर गहरी ध्यानमुद्रा में थीं। उनके सम्मुख था गया का वह पवित्र तीर्थ, जहाँ पीढ़ियों से लोग अपने पितरों की मुक्ति और मोक्ष की कामना लेकर आते थे। भगवान श्रीहरि के पदचिह्नों को नमन करते हुए रानी के अंतर्मन में एक तीव्र संकल्प ने जन्म लिया—मोक्षदायिनी गया की इस पावन भूमि पर एक ऐसा भव्य मंदिर स्थापित हो, जो युगों-युगों तक सनातन आस्था और मुक्ति की चेतना का केंद्र बना रहे।


​किंतु विष्णुपद मंदिर का निर्माण कोई साधारण कार्य नहीं था। इसके लिए ऐसे पत्थरों और सिद्धहस्त हाथों की आवश्यकता थी, जो कठोर शिलाओं में भी दिव्यता और सूक्ष्म कला के प्राण फूंक सकें। अहिल्याबाई की दृष्टि राजस्थान के मरुधरांचल पर गई, जहाँ की शिल्पकला पूरे आर्यावर्त में विख्यात थी। उन्होंने राजस्थान से गौड़ ब्राह्मण परिवारों को इस दैवीय कार्य के लिए सादर आमंत्रित किया। ये केवल शिल्पी नहीं, बल्कि पत्थरों की भाषा समझने वाले अनूठे साधक थे।