शनिवार, 26 सितंबर 2026

पूर्णिया डायरी-31: मथूत (Math-hoot): पूर्णिया के अकाल-ग्रस्त रैयतों के लिए एक अभिशाप 1770 ईo


​1769–70 के अकाल के दौरान, जब लक्ष्य के अनुसार राजस्व की वसूली मुश्किल लग रही थी, तब जी. जी. डुकरेल ने 'मथूत' जैसे क्रूर उपकर को लगाया।

​जेम्स ग्रांट ने 'अबवाब' (उपकर) की अपनी तालिका में मथूत को एक संचयी और अनियंत्रित उपकर का दर्जा दिया है। यह एक आनुपातिक कर था, जो मूल लगान ('असल') पर इसलिए लगाया जाता था ताकि अप्रत्याशित घाटे की भरपाई की जा सके या उन प्रांतीय/स्थानीय खर्चों को पूरा किया जा सके जो नियमित बंदोबस्त में शामिल नहीं थे।

​जॉन शोर ने 1789 के अपने प्रसिद्ध 'मिनट' में 1770–1772 के पूर्णिया के इन प्रयोगों—जिनमें मथूत और नजाए जैसे कर लगाए गए थे—की तीखी आलोचना करते हुए कहा कि पूर्णिया में 'हस्त-ओ-बूद' (Hast-o-bud) सर्वेक्षण पर आधारित मनमाना बंदोबस्त थोपने और देवी सिंह जैसे देशी एजेंटों के अधीन मथूत तथा नजाए की विभिन्न वृद्धियों को जोड़ने का परिणाम यह हुआ कि जिले की कृषि पूरी तरह से बर्बाद हो गई। सुपरवाइजर डुकरेल का ध्यान केवल तय रकम की वसूली पर था, जबकि इसका आंतरिक वितरण उन हाथों पर छोड़ दिया गया जिन्होंने पुश्तैनी जमींदारों तक को नहीं बख्शा, काश्तकारों की तो बात ही क्या थी। ब्रिटिश संसद की 'फिफ्थ रिपोर्ट' स्वयं स्वीकार करती है कि सुपरवाइजर की उदासीनता और स्थानीय दीवान की क्रूरता ने मिलकर पूर्णिया के ग्रामीण ढांचे को पूरी तरह ध्वस्त कर दिया।

पूर्णिया डायरी-30 : नजाय (Najay)18वीं सदी के पूर्णिया के इतिहास का काला धब्बा .

  ​पूर्णिया के पहले डिस्ट्रिक्ट सुपरवाइजर गेरार्ड गुस्टावस डुकरेल द्वारा 1769–1770 के अकाल वाले वर्ष में रैयतों पर 'नजाय' जैसा क्रूर भू-राजस्व उपकर लगाया गया।

      ​नजाय मुगल काल में कभी-कभार गांव के राजस्व के साझा नुकसान की भरपाई के लिए एक स्थानीय परंपरा के रूप में लगाया जाने वाला उपकर था। लेकिन 1770 में पूर्णिया के अकाल के दौरान डुकरेल के निर्देश पर दीवान देवी सिंह और कंपनी के अमलों ने इस बेहद क्रूर और दमनकारी उपकर की वसूली की। नजाय सामूहिक दंड के सिद्धांत पर आधारित था। 

    ब्रिटिश राजस्व तंत्र में प्रत्येक गांव या परगने का एक निश्चित लगान (जमा) तय होता था। अकाल या महामारी में जब गांव के किसान मर जाते या अपनी जमीन छोड़कर भाग जाते थे (जिन्हें पलातक या फरारी रैयत कहा जाता था), तब कंपनी तय राजस्व में कोई कमी नहीं करती थी। मृत या भाग चुके रैयतों के हिस्से का लगान गांव के जीवित किसानों पर अतिरिक्त अधिभार के रूप में आनुपातिक ढंग से बांट दिया जाता था। इसी जबरन वसूली को 'नजाय' कहते थे। जब यह कर वसूला जाने लगा, तो गांव-के-गांव वीरान (depopulated) होने लगे। आधी आबादी तो पहले ही अकाल और महामारी के कारण काल-कवलित हो चुकी थी।

  ​अप्रैल 1770 में डुकरेल ने मुर्शिदाबाद काउंसिल के रेजिडेंट रिचर्ड बीचर को पत्र भेजकर स्पष्ट किया कि

  " हवेली पूर्णिया, धर्मपुर और आसपास के इलाकों में लगभग आधी आबादी काल-कवलित हो गई है। राजस्व के घाटे को रोकने के लिए परगना स्तर पर आमिल और चौधरी 'नजाय' की पद्धति का सहारा ले रहे हैं, जिससे जीवित रैयतों पर पलायन कर चुके और मृत रैयतों का लगान लादा जा रहा है।"

    1770–1771 में पूर्णिया मुर्शिदाबाद काउंसिल के अधीन था। काउंसिल के रिकॉर्ड में पूर्णिया के भू-राजस्व खातों में नजाय को बाकायदा एक लेखा मद के रूप में दर्ज किया गया था।

​     पूर्णिया के विभिन्न परगनों, विशेषकर धर्मपुर, सुल्तानपुर और ताजपुर के रैयतों ने 'कमेटी ऑफ सर्किट' के समक्ष लिखित आपत्ति और गवाही दी कि अकाल के दौरान डुकरेल, उनके दीवान राजा देवी सिंह और उनके शिकदारों ने न केवल उनका उपजाया हुआ अनाज छीना, बल्कि गांव के जो किसान भूख से मर गए थे, उनकी जमीन का बकाया लगान नजाय के रूप में जीवित बचे किसानों से लाठियों के बल पर वसूला। इस वसूली ने पूर्णिया की आधी से अधिक कृषि योग्य जमीन को बंजर में तब्दील कर दिया और यहां की परंपरागत कृषि व्यवस्था पूरी तरह से ध्वस्त हो गई।

पूर्णिया डायरी-29 : अकाल (1769-1770) और जी. जी. डुकारेल द्वारा भू-राजस्व (लगान) की वसूली.

​1770 में जब डुकारेल पूर्णिया का डिस्ट्रिक्ट सुपरवाइज़र बना, तो उसने लगान वसूली के लिए जिले का ‘हस्त-ओ-बूद’ (Hast-o-bud) तैयार कराया। हस्त-ओ-बूद भू-राजस्व वसूली के लिए खेतों और फसलों के वास्तविक मूल्य का सर्वेक्षण था। इस सर्वेक्षण के आधार पर किया गया नया राजस्व निर्धारण स्थानीय उत्पादन क्षमता से कहीं अधिक था। 

   जब मानसून में बारिश नहीं हुई और अकाल पड़ा, तब इस अवास्तविक राजस्व मांग को बनाए रखने के लिए अतिरिक्त सेस (Cess), अबवाब और उपकर लगाए गए। इसने किसानों को भुखमरी और दरिद्रता के कगार पर लाकर छोड़ दिया। पलायन के अलावा उनके पास कोई विकल्प नहीं बचा। यही कारण है कि जहाँ बिहार, बंगाल और उड़ीसा में इस अकाल में लगभग एक-तिहाई आबादी काल-कवलित हुई, वहीं पूर्णिया में करीब आधी आबादी की मौत हो गई।

     ​कंपनी ने प्रत्यक्ष राजस्व वसूली के लिए देवी सिंह को दीवान और इज़ारेदार (Revenue Farmer) नियुक्त किया। डुकारेल ने कई प्रमुख परगनों—जैसे हवेली पूर्णिया और धरमपुर—का वित्तीय प्रबंधन उसके हाथों में सौंप दिया। डुकारेल के संरक्षण में देवी सिंह ने पूर्णिया में राजस्व वसूली को इस तरह संचालित किया कि स्थानीय जमींदार और आम रैयत पूरी तरह असहाय हो गए। किसी भी घाटे की भरपाई के लिए ‘आकस्मिक प्रभार’ (Occasional Charges) के नाम पर अतिरिक्त वसूली की जाने लगी।

​1770 के अकाल में जब पूर्णिया की आधी भूमि बंजर (Fallow) हो गई, तब जी. जी. डुकारेल के संरक्षण में देवी सिंह और कंपनी के अमले ने सरकारी मांग को पूरा करने के लिए 'नजाए' (Najay) जैसा क्रूर उपकर लगाया। मूल लगान में छूट देने के बदले जीवित बचे किसानों पर 'माथुत' (Math-hoot) जैसे क्रूर उपकर की दरें बढ़ा दी गईं। स्थानीय बही-खातों में इसे ‘माथौत परगना’ और ‘रशूम’ के तहत दर्ज किया गया। माथौत एक आनुपातिक कर था, जो मूल लगान (असल) पर इसलिए लगाया जाता था ताकि अप्रत्याशित घाटों की भरपाई की जा सके या उन प्रांतीय/स्थानीय खर्चों को पूरा किया जा सके जो नियमित बंदोबस्त में शामिल नहीं थे।

​नजाए और माथौत जैसे उपकरों ने पूर्णिया के किसानों, रैयतों और जमींदारों को दरिद्रता के कगार पर लाकर खड़ा कर दिया। अकाल और महामारी के बाद जो लोग जीवित बच गए, वे इन करों के दबाव में मोरंग के जंगलों और आसपास के इलाकों में पलायन कर गए तथा साधुओं के साथ रहने लगे। इससे सन्यासियों की संख्या में भारी वृद्धि हुई, जिसने आगे चलकर 'संन्यासी विद्रोह' की पूर्व-पीठिका तैयार की।

शुक्रवार, 25 सितंबर 2026

पूर्णिया डायरी-28 छियतर का मन्वंतर

 1769–1770 ईस्वी में बिहार, बंगाल और ओडिशा में एक भीषण अकाल पड़ा, जिसे स्थानीय भाषा और संदर्भ ग्रंथों में  छियत्तर का मन्वंतर कहा जाता है। इस आपदा के कारण इस पूरे क्षेत्र की लगभग एक-तिहाई आबादी (करीब 1 करोड़ लोग) भुखमरी और महामारी के कारण काल के गाल में समा गई।​ पूर्णिया ज़िले में इसका प्रभाव सर्वाधिक था। तत्कालीन डिस्ट्रिक्ट सुपरवाइज़र जी. जी. डुकरेल द्वारा भेजे गए आधिकारिक पत्र में उल्लेख किया गया था कि इस अकाल में पूर्णिया की आधी आबादी समाप्त हो गई। बांग्ला संवत 1176 में यह दुर्भिक्ष (अकाल) पड़ा था। यद्यपि 'मन्वंतर' का शाब्दिक अर्थ युग परिवर्तन होता है, किंतु पूर्वी भारत और बंगाल की लोक-भाषा में इसका आशय भीषण अकाल, महामारी अथवा प्रलयंकारी भुखमरी से लिया जाता है।​इस मानवीय त्रासदी के बीच भी पूर्णिया के सुपरवाइज़र जी. जी. डुकरेल और दीवान देवी सिंह ने आपदा में अवसर तलाशा। उन्होंने अनाज की कालाबाज़ारी कर अकूत धन अर्जित किया और रैयतों (किसानों) से अत्यंत बेरहमी से लगान वसूला। यहाँ कंपनी ने शत-प्रतिशत (100%) लगान वसूली की; यहाँ तक कि इस संकट काल में वसूला गया लगान वर्ष 1768 के सामान्य वर्ष में वसूले गए लगान से भी अधिक था।

मंगलवार, 22 सितंबर 2026

पूर्णिया डायरी-27( दीवान देवी सिंह का रैयतों पर अत्याचार और उसकी शिकायत)

1772 ईस्वी में वारेन हेस्टिंग्स ने कोर्ट ऑफ डायरेक्टर्स के आदेश पर बंगाल में द्वैध शासन समाप्त कर दिया। डिस्ट्रिक्ट सुपरवाइजर के पद को डिस्ट्रिक्ट कलेक्टर में परिवर्तित कर दिया गया।

​1772 में ही पंचशाला बंदोबस्त लागू किया गया, जिसके अंतर्गत 5 वर्षों के लिए जमींदारियों की नीलामी की जाती थी। सर्वाधिक बोली लगाने वाले को 5 वर्ष के लिए इजारेदारी (राजस्व वसूली का अधिकार) सौंपी जाती थी। पूर्णिया के दीवान देवी सिंह ने अपने चहेतों और रिश्तेदारों को इजारेदारी दिलवाकर पुश्तैनी जमींदारों को बेदखल कर दिया।

​ईस्ट इंडिया कंपनी ने यह अनुभव किया कि कलकत्ता में बैठकर केवल अनुमान लगाने और रिपोर्ट मंगवाने के बजाय जिलों में प्रत्यक्ष जाकर भूमि की वास्तविक स्थिति और राजस्व क्षमता का आकलन किया जाना चाहिए। इसी उद्देश्य से वारेन हेस्टिंग्स ने 14 मई 1772 को 'कमेटी ऑफ सर्किट' का गठन किया, जिसमें उनके अतिरिक्त चार अन्य सदस्य शामिल थे।

​इधर देवी सिंह ने रैयतों और जमींदारों पर अत्याचार करना प्रारंभ कर दिया। नीलामी में वास्तविक क्षमता से कहीं अधिक ऊंची बोली लगाकर जमींदारी हासिल कर ली गई थी, अतः राजस्व के उस भारी लक्ष्य को पूरा करने के लिए रैयतों से जबरन वसूली की जाने लगी।

​    अकाल के समय दीवान देवी सिंह ने पूर्णिया में बड़े पैमाने पर जमाखोरी की। उसने किसानों की उपज को औने-पौने दामों—दो मन से ढाई मन प्रति रुपया—पर खरीदा। वर्ष के अंत में जबरन ताले तुड़वाकर एक रुपया प्रति मन की दर से अनाज हड़प लिया गया। इसके बाद अनाजों को बैलों पर लदवाकर पूर्णिया स्थित अपने निजी गोदामों में भरवा दिया और अकाल के चरम पर इसे मात्र तीन से चार सेर प्रति रुपया की अत्यधिक महंगी दर से बेचा।

​देवी सिंह के इन अत्याचारों से त्रस्त होकर रैयतों और जमींदारों ने 'कमेटी ऑफ सर्किट' के समक्ष अपनी शिकायतें दर्ज कराईं। ताजपुर और पूर्णिया जिले के परगना हवेली पूर्णिया, सुल्तानपुर, सेनपुर, सुरजापुर तथा ताजपुर के रैयतों ने कमेटी के सामने दीवान देवी सिंह पर जमाखोरी का सीधा आरोप लगाया। जमींदार इंद्र नारायण के वकील प्रभु राम, पूर्णिया के कानूनगो मायानाथ, तथा कानूनगो लक्ष्मी नारायण की विधवा के नायब हरी सिंह ने आवेदन प्रस्तुत किया। इसमें पूर्णिया के नाजिम राजा देवी सिंह द्वारा जमींदारों और रैयतों पर किए जा रहे उत्पीड़न की शिकायत की गई तथा प्रार्थना की गई कि जिले को बर्बादी से बचाने और राजस्व स्थिति को सुधारने हेतु उसके स्थान पर किसी योग्य व्यक्ति को नियुक्त किया जाए।

​इसके अतिरिक्त परगना धरमपुर, हवेली पूर्णिया, श्रीपुर, सुल्तानपुर, सुरजापुर, असजा, बेदौर और ताजपुर के रैयतों ने भी शिकायत की कि देवी सिंह स्वयं द्वारा जारी किए गए पट्टों की शर्तों का उल्लंघन कर रहे हैं। अकाल वर्ष के आरंभ में ही किसानों की उपज जब्त कर ली गई और बदले में नाममात्र का मूल्य दिया गया। लगान की दरें बढ़ा दी गईं और कई प्रकार के गैर-कानूनी उपकर (आबवाब) वसूले जाने लगे, जिससे किसान घोर दरिद्रता में पहुंच गए और अनेक रैयतों को गांव छोड़कर पलायन करना पड़ा।

जुलाई से अगस्त 1772 के दौरान ‘कमेटी ऑफ सर्किट’ कृष्णानगर (नदिया) में कैंप कर रही थी। 5 अगस्त 1772 को कमेटी के समक्ष राजा देवी सिंह के विरुद्ध अनाज की जमाखोरी, रैयतों को गर्म लोहे से दागने तथा अन्य अत्याचारों की शिकायत दर्ज कराई गई। इस पर कमेटी ने तुरंत पूर्णिया के कलेक्टर गेरार्ड गुस्तावस डुकारेल (Gerard Gustavus Ducarel) से स्पष्टीकरण माँगा।

,24 अगस्त 1772 को डुकारेल ने अपना जवाब भेजा। उस समय डुकराल हुगली जिला के जिला सुपरवाइजर थे। उसने दीवान देवी सिंह का पक्ष लिया और अपने पत्र में इन सभी आरोपों का खंडन करते हुए दावा किया कि दीवान देवी सिंह पर लगाए गए सभी आरोप सर्वथा निराधार और झूठे हैं।

    यह घटना प्रारंभिक ब्रिटिश औपनिवेशिक तंत्र के उस भ्रष्ट गठजोड़ को उजागर करती है, जहां कंपनी के अंग्रेज अधिकारी और उनके भारतीय एजेंट (दीवान/नाजिम) निजी मुनाफे के लिए एक-दूसरे के अत्याचारों पर पर्दा डालते थे।

इसके बाद कमेटी ने यह निर्णय लिया कि जब वह अपने दौरे के क्रम में स्वयं पूर्णिया पहुँचेगी, तब शिकायतकर्ताओं और आरोपी को आमने-सामने बैठाकर उनकी गवाही लेगी तथा मौके पर ही इसका फैसला करेगी।

सुबोध 

22.9.26


सोमवार, 21 सितंबर 2026

पूर्णिया डायरी-26( पुश्तैनी जमींदारों का विस्थापन)

​1769 ईस्वी में जिन जिलों में 'डिस्ट्रिक्ट सुपरवाइजर' (जिला पर्यवेक्षक) की नियुक्ति हुई, वहां उनके सहयोग के लिए एक 'नेटिव दीवान' (देशी दीवान) को भी संबद्ध किया गया। इसी क्रम में पूर्णिया में देवी सिंह को नेटिव दीवान नियुक्त किया गया।

​1769-70 ईस्वी में पूर्णिया में भीषण अकाल पड़ा, जिससे वहां की लगभग आधी आबादी काल-कवलित हो गई। तत्कालीन सुपरवाइजर डुकरेल (Ducarrel) के लिए स्थानीय भाषा और परंपराओं की अनभिज्ञता राजस्व प्रशासन संभालने में बड़ी बाधा बन रही थी। इस कारण मालगुजारी का निर्धारण, अभिलेखों की जांच तथा किसानों व जमींदारों से कर-वसूली का वास्तविक नियंत्रण पूर्णतः देवी सिंह के हाथों में आ गया।

एक ओर जहाँ डुकरेल द्वारा अनाज वितरण जैसे कुछ राहत कार्य किए गए, जो सर्वथा अपर्याप्त थे; वहीं दूसरी ओर देवी सिंह ने भुखमरी की कगार पर खड़े किसानों और विपन्न जमींदारों से क्रूरतापूर्वक कर वसूल कर अकाल की विषम परिस्थिति में भी भारी राजस्व जुटाया। अकाल के दौरान भी संकलित राजस्व को नियमित रूप से फोर्ट विलियम (कलकत्ता) भेजने के कारण वह डुकरेल और वारेन हेस्टिंग्स की नज़रों में एक अत्यंत विश्वसनीय और कुशल राजस्व एजेंट बन गया।

​जब ईस्ट इंडिया कंपनी के निर्धारित लक्ष्य के अनुसार बंगाल में राजस्व संकलन नहीं हो पाया, तब 1772 ईस्वी में वारेन हेस्टिंग्स ने पाँच वर्षीय भू-बंदोबस्त (पंचशाला बंदोबस्त) व्यवस्था लागू की।

​देवी सिंह ने कंपनी से अपने घनिष्ठ संबंधों का लाभ उठाया और पूर्णिया के सबसे बड़े तथा समृद्ध परगनों—जैसे हवेली पूर्णिया, धरमपुर और सैफगंज—का बंदोबस्त अपने तथा अपने रिश्तेदारों के नाम पर कराने में सफल रहा।

​यहीं से पारंपरिक राजस्व व्यवस्था में आमूलचूल परिवर्तन देखने को मिलता है, जहाँ से जमींदारों और रैयतों के बीच के पारंपरिक सौहार्दपूर्ण संबंधों के टूटने का दौर शुरू हुआ। इसके परिणामस्वरूप पुराने पुस्तैनी जमींदार—जैसे हवेली के चौधरी (मुस्लिम जमींदार), श्रीपुर और सुल्तानपुर के पुस्तैनी बक्कायस (कायस्थ) जमींदार, तथा ताजपुर व सूरजपुर (सुजापुर) के फखरुद्दीन हुसैन व उनके परिवार (सैयद घराने)—के हाथों से ज़मींदारी छिन गई।

​दीवान देवी सिंह के इन दमनकारी कृत्यों के विरुद्ध 1772 ईस्वी में पूर्णिया के रैयतों और विस्थापित जमींदारों ने 'कोर्ट ऑफ सर्किट' में आवेदन दिया।

सुबोध 

22.9.26

शनिवार, 19 सितंबर 2026

पूर्णिया डायरी-25 (रिचर्ड समनर पूर्णिया के दूसरे कलेक्टर)

रिचर्ड समनर पूर्णिया ज़िले के दूसरे कलेक्टर थे। जेरार्ड गुस्तावस ड्युकारेल (G. G. Ducarel) के बाद 1781 मे रिचर्ड समनर पूर्णिया के कलेक्टर बने। वे गवर्नर-जनरल वॉरेन हेस्टिंग्स के सबसे अंतरंग सहयोगियों और विश्वासपात्र अफ़सरों में गिने जाते थे। वे 1769–70 में ईस्ट इंडिया कंपनी की सेवा में 'राइटर' के रूप में फोर्ट विलियम (कलकत्ता) पहुँचे थे। उनकी निष्ठा और प्रशासनिक दक्षता को देखते हुए उन्हें 1781 में पूर्णिया का कलेक्टर नियुक्त किया गया।

                               ‌       (चित्र प्रतीकात्मक)

​पूर्णिया उस समय एक अत्यंत संवेदनशील सीमांत ज़िला था, जो नेपाल और भूटान की सीमाओं से सटा हुआ था तथा 1770 के भीषण अकाल (छियत्तर का मन्वंतर) के दुष्प्रभावों से उबरने का प्रयास कर रहा था। रिचर्ड समनर ने पूर्णिया ज़िले में राजस्व सुधार से जुड़े कई महत्वपूर्ण कार्य किए। उन्होंने धरमपुर, हवेली पूर्णिया और असुर्जा जैसे विशाल परगनों में स्थानीय इज़ारेदारों और ज़मींदारों के बही-खातों की गहन पड़ताल की तथा बकाया मालगुज़ारी की वसूली को नियमित किया।

​सामरिक दृष्टिकोण से भी उन्होंने सीमा की सुरक्षा को सुदृढ़ किया और क्षेत्र में सक्रिय सन्यासी व फ़कीर विद्रोहियों के छापों को रोकने के लिए सैन्य दस्तों तथा सीमावर्ती चौकियों का पुनर्गठन किया।

पूर्णिया डायरी- 24 (डुकारेल‌ और दीवान देवी सिंह)

1765 में इलाहाबाद की संधि के बाद जब ईस्ट इंडिया कंपनी को बंगाल, बिहार और उड़ीसा की दीवानी मिली, तब कंपनी ने राजस्व वसूली को सीधे अपने हाथ में न लेकर 'द्वैध शासन' (Dual System) के तहत देशी अधिकारियों पर छोड़ दिया। भ्रष्टाचार, अकाल और प्रशासनिक अव्यवस्था के चलते इस प्रणाली में सुधार के लिए 1769 में कंपनी ने जिलों में 'सुपरवाइजर' (Supervisor) पद का सृजन किया।
इसी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में पूर्णिया में अंग्रेजी प्रशासनिक ढांचे की औपचारिक नींव पड़ी।
        सन् 1769 में जेरार्ड गुस्तावस डुकारेल (Gerard Gustavus Ducarel) को पूर्णिया का पहला सुपरवाइजर नियुक्त किया गया।
नियुक्ति का उद्देश्य स्थानीय भू-राजस्व व्यवस्था की वास्तविक स्थिति का आकलन करना, मालगुजारी के पुराने अभिलेखों की जांच करना, उत्पादन क्षमता को समझना और कंपनी के राजस्व को नियमिमित व अधिकतम करना।
 डुकारेल का कार्यकाल 1769–1770 के भीषण बंगाल और बिहार के महाअकाल (Chhiattarer Manwantar) के समानांतर था। इस दौर में पूर्णिया की एक बड़ी आबादी अकाल और भुखमरी की शिकार हुई, लेकिन कंपनी के कड़े आदेशों के कारण राजस्व वसूली की कठोरता में कोई रियायत नहीं बरती गई।
        सुपरवाइजर यूरोपीय अधिकारी होते थे, जिन्हें स्थानीय भाषा, भूमि बंदोबस्त की बारीकियों और प्रथागत कानूनों की गहरी समझ नहीं होती थी। इसलिए उनकी सहायता के लिए एक स्थानीय वित्तीय प्रमुख या 'दीवान' की नियुक्ति की जाती थी। पूर्णिया में डुकारेल के दीवान के रूप में देवी सिंह को नियुक्त किया गया।
देवी सिंह पूर्णिया में राजस्व आकलन, कर निर्धारण और वास्तविक वसूली के प्रमुख सूत्रधार थे। डुकारेल काफी हद तक उनके प्रशासनिक कौशल और वित्तीय तंत्र पर निर्भर थे।
              पूर्णिया में डुकारेल और देवी सिंह की यह साझेदारी भारतीय प्रशासनिक इतिहास में उस शुरुआती दौर का उदाहरण है जब पारंपरिक भारतीय दीवानी व्यवस्था को ब्रिटिश उपनिवेशवादी नौकरशाही में बदला जा रहा था। 1769 का यह सुपरवाइजर पद ही आगे चलकर कलेक्टर (District Collector) के पद में विकसित हुआ।

सुबोध 
20.9.2026

शनिवार, 12 सितंबर 2026

धुएं में लिपटा शहर

          धुएं में लिपटा शहर

​इस शहर की बात हो या उस शहर की बात हो,

घुट रहा हो दम तो कहिए किस शहर की बात हो।

​

आग दिल्ली में, धुआँ पसरा है सारे मुल्क में,

धुंध-अंधियारे में कहिए किस सहर की बात हो।


​साँस घुटती जा रही है, बंद सब दरवाज़े हैं,

ज़हर ही जब ओढ़ना हो, किस बसर की बात हो।


​पेड़ सारे काट डाले मुफ़्त के मुनाफ़ों ने,

धूप जब चमड़ी जलाए, किस शजर की बात हो।

​

छीन ली लाचार आँखों से जहाँ की रौशनी,

अंधा बनकर जो खड़ा है, उस नज़र की बात हो।


​प्यास से तड़पे परिंदा, सूखती नदियाँ यहाँ,

बूँद तक जब बिक चुकी हो, किस नहर की बात हो।


​गाँव के चूल्हे बुझाकर ढूँढ़ते हैं रोटियाँ,

मुफ़लिसी में ठोकरें हों, किस डगर की बात हो।


​छा गई ख़ामोशी ऐसी, बोलती आवाज़ गुम,

चीख़ भी जब दब गई हो, किस असर की बात हो।

​

शोर है दरबार में बस खोखले वादों का ही,

जब दवा ही जान ले ले, किस ज़हर की बात हो।


​चीर दे जो इस सियाही को 'सुबोध' आवाज़ बन,

सोते हुक्मरानों को झकझोरे, उस क़हर की बात हो।

                                                       सुबोध

                                                   10.9.2026


मंगलवार, 1 सितंबर 2026

पूर्णिया डायरी - 23 डुकारेल की पूर्णियाः हिंदी साहित्य में नए जमीन की तलाश

घर का पता

 दरीचों पे बैठी गहरी ख़ामोशी

दीवारों पे नाम-ओ-निशाँ लिख रही है


​आईने में जब भी तकूँ अपना चेहरा

पहचान अपनी कहीं खो रही है


​अँधेरे के कोने में बुझता दीया बस

हवा के थपेड़ों से दम तोड़ता है


​दराज़ों में रक्खे हुए ख़त पुराने

सुनाने लगे हैं कई ग़म के फ़साने


​वजूद अपना अफ़्साना लगने लगा है

'सुबोध' अपनी हस्ती भी अब मिट रही है


​सदियों से फैली हुई ये उदासी

मुझसे ही मेरे घर का पता पूछती है

सुबोध

1 सितंबर 2026

सोमवार, 31 अगस्त 2026

शफ़्फ़ाफ़

 

वो शफ़्फ़ाफ़ आँखें, वो बेनूर ग़ज़लें,

उसी को तलाशे चली जा रही हैं।


हवाओं में बहती हुई कुछ उदासी,

चराग़ों को जैसे बुझाए रही हैं।


​न रस्तों पे कोई निशाँ बन रहा है,

न आहट का कोई गुमाँ बन रहा है।


मगर दिल की बस्ती उसी मोड़ पर अब,

धुएँ का मुसलसल मकाँ बन रहा है।


​किताबों के पन्नों पे ठहरी ख़मोशी,

छुपाए हुए इक सदा ढूँढती है।


जुदा हो गई थी नज़र से जो कल तक,

उसी सादगी की अदा ढूँढती है।


​धुँधलके में डूबी हुई सी लकीरें,

हथेली पे फिर से सँवरने लगी हैं।


उफ़ुक़1 पर चमकते हुए इक सितारे

की मानिंद पलकें ठहरने लगी हैं।


​सुबोध अब क़लम से बहे जा रहे हैं,

जो अफ़साने लफ़्ज़ों में रह जा रहे हैं।


उसी गुमशुदा की तलब ओढ़ कर फिर,

ये बेताब आँखें, ये ख़ामोश ग़ज़लें,

उसी को तलाशे चली जा रही हैं।

1.क्षितिज

                                      सुबोध 31 अगस्त 2026

गुरुवार, 20 अगस्त 2026

गया डायरी- 3 (अहिल्याबाई होलकर विष्णु मंदिर और गौङ ब्राह्मण)

 

फाल्गु नदी के पावन तट पर बहती मंद बयार में मातोश्री अहिल्याबाई होलकर गहरी ध्यानमुद्रा में थीं। उनके सम्मुख था गया का वह पवित्र तीर्थ, जहाँ पीढ़ियों से लोग अपने पितरों की मुक्ति और मोक्ष की कामना लेकर आते थे। भगवान श्रीहरि के पदचिह्नों को नमन करते हुए रानी के अंतर्मन में एक तीव्र संकल्प ने जन्म लिया—मोक्षदायिनी गया की इस पावन भूमि पर एक ऐसा भव्य मंदिर स्थापित हो, जो युगों-युगों तक सनातन आस्था और मुक्ति की चेतना का केंद्र बना रहे।


​किंतु विष्णुपद मंदिर का निर्माण कोई साधारण कार्य नहीं था। इसके लिए ऐसे पत्थरों और सिद्धहस्त हाथों की आवश्यकता थी, जो कठोर शिलाओं में भी दिव्यता और सूक्ष्म कला के प्राण फूंक सकें। अहिल्याबाई की दृष्टि राजस्थान के मरुधरांचल पर गई, जहाँ की शिल्पकला पूरे आर्यावर्त में विख्यात थी। उन्होंने राजस्थान से गौड़ ब्राह्मण परिवारों को इस दैवीय कार्य के लिए सादर आमंत्रित किया। ये केवल शिल्पी नहीं, बल्कि पत्थरों की भाषा समझने वाले अनूठे साधक थे।