मंगलवार, 1 सितंबर 2026
घर का पता
दरीचों पे बैठी गहरी ख़ामोशी
दीवारों पे नाम-ओ-निशाँ लिख रही है
आईने में जब भी तकूँ अपना चेहरा
पहचान अपनी कहीं खो रही है
अँधेरे के कोने में बुझता दीया बस
हवा के थपेड़ों से दम तोड़ता है
दराज़ों में रक्खे हुए ख़त पुराने
सुनाने लगे हैं कई ग़म के फ़साने
वजूद अपना अफ़्साना लगने लगा है
'सुबोध' अपनी हस्ती भी अब मिट रही है
सदियों से फैली हुई ये उदासी
मुझसे ही मेरे घर का पता पूछती है
सुबोध
1 सितंबर 2026
सोमवार, 31 अगस्त 2026
शफ़्फ़ाफ़
वो शफ़्फ़ाफ़ आँखें, वो बेनूर ग़ज़लें,
उसी को तलाशे चली जा रही हैं।
हवाओं में बहती हुई कुछ उदासी,
चराग़ों को जैसे बुझाए रही हैं।
न रस्तों पे कोई निशाँ बन रहा है,
न आहट का कोई गुमाँ बन रहा है।
मगर दिल की बस्ती उसी मोड़ पर अब,
धुएँ का मुसलसल मकाँ बन रहा है।
किताबों के पन्नों पे ठहरी ख़मोशी,
छुपाए हुए इक सदा ढूँढती है।
जुदा हो गई थी नज़र से जो कल तक,
उसी सादगी की अदा ढूँढती है।
धुँधलके में डूबी हुई सी लकीरें,
हथेली पे फिर से सँवरने लगी हैं।
उफ़ुक़1 पर चमकते हुए इक सितारे
की मानिंद पलकें ठहरने लगी हैं।
सुबोध अब क़लम से बहे जा रहे हैं,
जो अफ़साने लफ़्ज़ों में रह जा रहे हैं।
उसी गुमशुदा की तलब ओढ़ कर फिर,
ये बेताब आँखें, ये ख़ामोश ग़ज़लें,
उसी को तलाशे चली जा रही हैं।
1.क्षितिज
सुबोध 31 अगस्त 2026
गुरुवार, 20 अगस्त 2026
गया डायरी- 3 (अहिल्याबाई होलकर विष्णु मंदिर और गौङ ब्राह्मण)
फाल्गु नदी के पावन तट पर बहती मंद बयार में मातोश्री अहिल्याबाई होलकर गहरी ध्यानमुद्रा में थीं। उनके सम्मुख था गया का वह पवित्र तीर्थ, जहाँ पीढ़ियों से लोग अपने पितरों की मुक्ति और मोक्ष की कामना लेकर आते थे। भगवान श्रीहरि के पदचिह्नों को नमन करते हुए रानी के अंतर्मन में एक तीव्र संकल्प ने जन्म लिया—मोक्षदायिनी गया की इस पावन भूमि पर एक ऐसा भव्य मंदिर स्थापित हो, जो युगों-युगों तक सनातन आस्था और मुक्ति की चेतना का केंद्र बना रहे।
किंतु विष्णुपद मंदिर का निर्माण कोई साधारण कार्य नहीं था। इसके लिए ऐसे पत्थरों और सिद्धहस्त हाथों की आवश्यकता थी, जो कठोर शिलाओं में भी दिव्यता और सूक्ष्म कला के प्राण फूंक सकें। अहिल्याबाई की दृष्टि राजस्थान के मरुधरांचल पर गई, जहाँ की शिल्पकला पूरे आर्यावर्त में विख्यात थी। उन्होंने राजस्थान से गौड़ ब्राह्मण परिवारों को इस दैवीय कार्य के लिए सादर आमंत्रित किया। ये केवल शिल्पी नहीं, बल्कि पत्थरों की भाषा समझने वाले अनूठे साधक थे।
