1772 ईस्वी में वारेन हेस्टिंग्स ने कोर्ट ऑफ डायरेक्टर्स के आदेश पर बंगाल में द्वैध शासन समाप्त कर दिया। डिस्ट्रिक्ट सुपरवाइजर के पद को डिस्ट्रिक्ट कलेक्टर में परिवर्तित कर दिया गया। इस प्रकार पूर्णिया जिले में गेरार्ड गुस्तावस डुकारेल (जी. जी. डुकारेल) पहले डिस्ट्रिक्ट कलेक्टर बने।
1772 में ही पंचशाला बंदोबस्त लागू किया गया, जिसके अंतर्गत 5 वर्षों के लिए जमींदारियों की नीलामी की जाती थी। सर्वाधिक बोली लगाने वाले को 5 वर्ष के लिए इजारेदारी (राजस्व वसूली का अधिकार) सौंपी जाती थी। पूर्णिया के दीवान देवी सिंह ने अपने चहेतों और रिश्तेदारों को इजारेदारी दिलवाकर पुश्तैनी जमींदारों को बेदखल कर दिया।
ईस्ट इंडिया कंपनी ने यह अनुभव किया कि कलकत्ता में बैठकर केवल अनुमान लगाने और रिपोर्ट मंगवाने के बजाय जिलों में प्रत्यक्ष जाकर भूमि की वास्तविक स्थिति और राजस्व क्षमता का आकलन किया जाना चाहिए। इसी उद्देश्य से वारेन हेस्टिंग्स ने 14 मई 1772 को 'कमेटी ऑफ सर्किट' का गठन किया, जिसमें उनके अतिरिक्त चार अन्य सदस्य शामिल थे।
इधर देवी सिंह ने रैयतों और जमींदारों पर अत्याचार करना प्रारंभ कर दिया। नीलामी में वास्तविक क्षमता से कहीं अधिक ऊंची बोली लगाकर जमींदारी हासिल कर ली गई थी, अतः राजस्व के उस भारी लक्ष्य को पूरा करने के लिए रैयतों से जबरन वसूली की जाने लगी।
अकाल के समय दीवान देवी सिंह ने पूर्णिया में बड़े पैमाने पर जमाखोरी की। उसने किसानों की उपज को औने-पौने दामों—दो मन से ढाई मन प्रति रुपया—पर खरीदा। वर्ष के अंत में जबरन ताले तुड़वाकर एक रुपया प्रति मन की दर से अनाज हड़प लिया गया। इसके बाद अनाजों को बैलों पर लदवाकर पूर्णिया स्थित अपने निजी गोदामों में भरवा दिया और अकाल के चरम पर इसे मात्र तीन से चार सेर प्रति रुपया की अत्यधिक महंगी दर से बेचा।
देवी सिंह के इन अत्याचारों से त्रस्त होकर रैयतों और जमींदारों ने 'कमेटी ऑफ सर्किट' के समक्ष अपनी शिकायतें दर्ज कराईं। ताजपुर और पूर्णिया जिले के परगना हवेली पूर्णिया, सुल्तानपुर, सेनपुर, सुरजापुर तथा ताजपुर के रैयतों ने कमेटी के सामने दीवान देवी सिंह पर जमाखोरी का सीधा आरोप लगाया। जमींदार इंद्र नारायण के वकील प्रभु राम, पूर्णिया के कानूनगो मायानाथ, तथा कानूनगो लक्ष्मी नारायण की विधवा के नायब हरी सिंह ने आवेदन प्रस्तुत किया। इसमें पूर्णिया के नाजिम राजा देवी सिंह द्वारा जमींदारों और रैयतों पर किए जा रहे उत्पीड़न की शिकायत की गई तथा प्रार्थना की गई कि जिले को बर्बादी से बचाने और राजस्व स्थिति को सुधारने हेतु उसके स्थान पर किसी योग्य व्यक्ति को नियुक्त किया जाए।
इसके अतिरिक्त परगना धरमपुर, हवेली पूर्णिया, श्रीपुर, सुल्तानपुर, सुरजापुर, असजा, बेदौर और ताजपुर के रैयतों ने भी शिकायत की कि देवी सिंह स्वयं द्वारा जारी किए गए पट्टों की शर्तों का उल्लंघन कर रहे हैं। अकाल वर्ष के आरंभ में ही किसानों की उपज जब्त कर ली गई और बदले में नाममात्र का मूल्य दिया गया। लगान की दरें बढ़ा दी गईं और कई प्रकार के गैर-कानूनी उपकर (आबवाब) वसूले जाने लगे, जिससे किसान घोर दरिद्रता में पहुंच गए और अनेक रैयतों को गांव छोड़कर पलायन करना पड़ा।
जुलाई से अगस्त 1772 के दौरान ‘कमेटी ऑफ सर्किट’ कासिमबाज़ार (मुर्शिदाबाद) में कैंप कर रही थी। 5 अगस्त 1772 को कमेटी के समक्ष राजा देवी सिंह के विरुद्ध अनाज की जमाखोरी, रैयतों को गर्म लोहे से दागने तथा अन्य अत्याचारों की शिकायत दर्ज कराई गई। इस पर कमेटी ने तुरंत पूर्णिया के कलेक्टर गेरार्ड गुस्तावस डुकारेल (Gerard Gustavus Ducarel) से स्पष्टीकरण माँगा।
,24 अगस्त 1772 को डुकारेल ने अपना जवाब भेजा। उसने दीवान देवी सिंह का पक्ष लिया और अपने पत्र में इन सभी आरोपों का खंडन करते हुए दावा किया कि दीवान देवी सिंह पर लगाए गए सभी आरोप सर्वथा निराधार और झूठे हैं।
यह घटना प्रारंभिक ब्रिटिश औपनिवेशिक तंत्र के उस भ्रष्ट गठजोड़ को उजागर करती है, जहां कंपनी के अंग्रेज अधिकारी और उनके भारतीय एजेंट (दीवान/नाजिम) निजी मुनाफे के लिए एक-दूसरे के अत्याचारों पर पर्दा डालते थे।
इसके बाद कमेटी ने यह निर्णय लिया कि जब वह अपने दौरे के क्रम में स्वयं पूर्णिया पहुँचेगी, तब शिकायतकर्ताओं और आरोपी को आमने-सामने बैठाकर उनकी गवाही लेगी तथा मौके पर ही इसका फैसला करेगी।
सुबोध
22.9.26


















































