1769–70 के अकाल के दौरान, जब लक्ष्य के अनुसार राजस्व की वसूली मुश्किल लग रही थी, तब जी. जी. डुकरेल ने 'मथूत' जैसे क्रूर उपकर को लगाया।
जेम्स ग्रांट ने 'अबवाब' (उपकर) की अपनी तालिका में मथूत को एक संचयी और अनियंत्रित उपकर का दर्जा दिया है। यह एक आनुपातिक कर था, जो मूल लगान ('असल') पर इसलिए लगाया जाता था ताकि अप्रत्याशित घाटे की भरपाई की जा सके या उन प्रांतीय/स्थानीय खर्चों को पूरा किया जा सके जो नियमित बंदोबस्त में शामिल नहीं थे।
जॉन शोर ने 1789 के अपने प्रसिद्ध 'मिनट' में 1770–1772 के पूर्णिया के इन प्रयोगों—जिनमें मथूत और नजाए जैसे कर लगाए गए थे—की तीखी आलोचना करते हुए कहा कि पूर्णिया में 'हस्त-ओ-बूद' (Hast-o-bud) सर्वेक्षण पर आधारित मनमाना बंदोबस्त थोपने और देवी सिंह जैसे देशी एजेंटों के अधीन मथूत तथा नजाए की विभिन्न वृद्धियों को जोड़ने का परिणाम यह हुआ कि जिले की कृषि पूरी तरह से बर्बाद हो गई। सुपरवाइजर डुकरेल का ध्यान केवल तय रकम की वसूली पर था, जबकि इसका आंतरिक वितरण उन हाथों पर छोड़ दिया गया जिन्होंने पुश्तैनी जमींदारों तक को नहीं बख्शा, काश्तकारों की तो बात ही क्या थी। ब्रिटिश संसद की 'फिफ्थ रिपोर्ट' स्वयं स्वीकार करती है कि सुपरवाइजर की उदासीनता और स्थानीय दीवान की क्रूरता ने मिलकर पूर्णिया के ग्रामीण ढांचे को पूरी तरह ध्वस्त कर दिया।


















































