धुएं में लिपटा शहर
इस शहर की बात हो या उस शहर की बात हो,
घुट रहा हो दम तो कहिए किस शहर की बात हो।
आग दिल्ली में, धुआँ पसरा है सारे मुल्क में,
धुंध-अंधियारे में कहिए किस सहर की बात हो।
साँस घुटती जा रही है, बंद सब दरवाज़े हैं,
ज़हर ही जब ओढ़ना हो, किस बसर की बात हो।
पेड़ सारे काट डाले मुफ़्त के मुनाफ़ों ने,
धूप जब चमड़ी जलाए, किस शजर की बात हो।
छीन ली लाचार आँखों से जहाँ की रौशनी,
अंधा बनकर जो खड़ा है, उस नज़र की बात हो।
प्यास से तड़पे परिंदा, सूखती नदियाँ यहाँ,
बूँद तक जब बिक चुकी हो, किस नहर की बात हो।
गाँव के चूल्हे बुझाकर ढूँढ़ते हैं रोटियाँ,
मुफ़लिसी में ठोकरें हों, किस डगर की बात हो।
छा गई ख़ामोशी ऐसी, बोलती आवाज़ गुम,
चीख़ भी जब दब गई हो, किस असर की बात हो।
शोर है दरबार में बस खोखले वादों का ही,
जब दवा ही जान ले ले, किस ज़हर की बात हो।
चीर दे जो इस सियाही को 'सुबोध' आवाज़ बन,
सोते हुक्मरानों को झकझोरे, उस क़हर की बात हो।
सुबोध
10.9.2026


















































