Bihar Gazzetter
मंगलवार, 1 सितंबर 2026
घर का पता
दरीचों पे बैठी गहरी ख़ामोशी
दीवारों पे नाम-ओ-निशाँ लिख रही है
आईने में जब भी तकूँ अपना चेहरा
पहचान अपनी कहीं खो रही है
अँधेरे के कोने में बुझता दीया बस
हवा के थपेड़ों से दम तोड़ता है
दराज़ों में रक्खे हुए ख़त पुराने
सुनाने लगे हैं कई ग़म के फ़साने
वजूद अपना अफ़्साना लगने लगा है
'सुबोध' अपनी हस्ती भी अब मिट रही है
सदियों से फैली हुई ये उदासी
मुझसे ही मेरे घर का पता पूछती है
सुबोध
1 सितंबर 2026
सोमवार, 31 अगस्त 2026
शफ़्फ़ाफ़
वो शफ़्फ़ाफ़ आँखें, वो बेनूर ग़ज़लें,
उसी को तलाशे चली जा रही हैं।
हवाओं में बहती हुई कुछ उदासी,
चराग़ों को जैसे बुझाए रही हैं।
न रस्तों पे कोई निशाँ बन रहा है,
न आहट का कोई गुमाँ बन रहा है।
मगर दिल की बस्ती उसी मोड़ पर अब,
धुएँ का मुसलसल मकाँ बन रहा है।
किताबों के पन्नों पे ठहरी ख़मोशी,
छुपाए हुए इक सदा ढूँढती है।
जुदा हो गई थी नज़र से जो कल तक,
उसी सादगी की अदा ढूँढती है।
धुँधलके में डूबी हुई सी लकीरें,
हथेली पे फिर से सँवरने लगी हैं।
उफ़ुक़1 पर चमकते हुए इक सितारे
की मानिंद पलकें ठहरने लगी हैं।
सुबोध अब क़लम से बहे जा रहे हैं,
जो अफ़साने लफ़्ज़ों में रह जा रहे हैं।
उसी गुमशुदा की तलब ओढ़ कर फिर,
ये बेताब आँखें, ये ख़ामोश ग़ज़लें,
उसी को तलाशे चली जा रही हैं।
1.क्षितिज
सुबोध 31 अगस्त 2026
गुरुवार, 20 अगस्त 2026
गया डायरी- 3 (अहिल्याबाई होलकर विष्णु मंदिर और गौङ ब्राह्मण)
फाल्गु नदी के पावन तट पर बहती मंद बयार में मातोश्री अहिल्याबाई होलकर गहरी ध्यानमुद्रा में थीं। उनके सम्मुख था गया का वह पवित्र तीर्थ, जहाँ पीढ़ियों से लोग अपने पितरों की मुक्ति और मोक्ष की कामना लेकर आते थे। भगवान श्रीहरि के पदचिह्नों को नमन करते हुए रानी के अंतर्मन में एक तीव्र संकल्प ने जन्म लिया—मोक्षदायिनी गया की इस पावन भूमि पर एक ऐसा भव्य मंदिर स्थापित हो, जो युगों-युगों तक सनातन आस्था और मुक्ति की चेतना का केंद्र बना रहे।
किंतु विष्णुपद मंदिर का निर्माण कोई साधारण कार्य नहीं था। इसके लिए ऐसे पत्थरों और सिद्धहस्त हाथों की आवश्यकता थी, जो कठोर शिलाओं में भी दिव्यता और सूक्ष्म कला के प्राण फूंक सकें। अहिल्याबाई की दृष्टि राजस्थान के मरुधरांचल पर गई, जहाँ की शिल्पकला पूरे आर्यावर्त में विख्यात थी। उन्होंने राजस्थान से गौड़ ब्राह्मण परिवारों को इस दैवीय कार्य के लिए सादर आमंत्रित किया। ये केवल शिल्पी नहीं, बल्कि पत्थरों की भाषा समझने वाले अनूठे साधक थे।
गुरुवार, 14 नवंबर 2024
किताब-ए-बिहार(बिहार से जुड़ी किताबों की महफिल)-3
'वर्चस्व' राजेश पांडे की पुस्तक का नाम है, जो वर्ष 2004 में प्रकाशित हुई है. इसी वर्ष पुस्तक के तीन संस्करण आ चुके हैं.पुस्तक के फ्लैप पर एक ओर "सत्य कथा'
अंकित है और दूसरी ओर 'उत्तर प्रदेश के एक आपराधिक कालखंड की सच्ची दास्तान' . लेखक 1996 बैच के यूपी पुलिस प्रांतीय सेवा के अधिकारी हैं, जिन्हें भारतीय पुलिस सेवा में वर्ष 2005 में प्रोन्नति दी गई है . यह वर्ष 2021 मे सेवानिवृत्ति हुए. 35 वर्ष की पुलिस सेवा के बाद कोविड काल में पुस्तक को लिखने का ख्याल आया.
इसी तरह के एक पुस्तक की रचना बिहार कैडर के आईपीएस अधिकारी (1998 बैच) अमित लोढ़ा ने 'बिहार डायरीज' नाम से की है, जिस पर वेब सीरीज 'खाकी' बना, जो पुस्तक से कहीं ज्यादा लोकप्रिय हुई . य़ह पुस्तक 2018 में अंग्रेजी में प्रकाशित हुई , इसकी भूमिका न जाने क्यों टिंकल खन्ना से लिखवाई गई .
अपराधिक कालखंड की चर्चा करते हुए लेखक ने लिखा कि इसकी शुरुआत 1975 में भारत के रेल मंत्री ललित नारायण मिश्र की हत्या (जो उनके गृह नगर समस्तीपुर में हुई थी) के साथ हुई. परंतु इसका अंत कब हुआ सो नहीं लिखा है. न हीं यह लिखा कि आपराधिक कालखंड अभी चल रहा है.
यह पुस्तक उत्तर प्रदेश के दूर्दांत अपराधी को केंद्र में रखकर लिखी गई है. उसके एनकाउंटर के साथ ही पुस्तक समाप्त हो जाती है. 295 पृष्ठ के पुस्तक से गुजरते हुए पाठक हत्या दर हत्या अपराध की दुनिया से रूबरू होता है. पुलिसिया कार्रवाई एसoटीoएफo का गठन उसे उबाउ लगने लगता है और वह उन पन्नों से सरसरी तौर पर आगे बढ़ते हुए एक जासूसी उपन्यास की तरह नए संभावित घटनाओं को तलाशता है. इस पुस्तक में 'पल्प फिक्शन' सा आकर्षण तो है, पर कहीं से साहित्य की श्रेणी में रख पाना मुश्किल है . यदि इसमें साहित्य के किसी रस की तलाश की जाए तो 'वीभत्स रस' के अलावा और कोई रास नहीं मिलता है .
. लेखक ने बेबाकी से कुछ ऐसी शख्सियत का उल्लेख किया है जो अपराध की दुनिया से राजनीति में आए और कई अपराधी घटनाओं के षड्यंत्र कर्ता रहे. एक दो मामला तो बिहार से जुड़ा है . बिहार की अब तक चर्चित राजनीतिक हत्या में दूसरे नंबर पर इसका जिक्र करते हुए उनकी स्पष्ट भागीदारी बताई गई सुप्रीम कोर्ट से बरी हो गए. सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के बाद यह पुस्तक और पात्र पुनः चर्चा में आए. इस परिस्थिति में सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश एवं पुस्तक के विवरण में विरोधाभास है. लेखक का दायित्व बनता है कि एक बार फिर न्याय निर्णय का अध्ययन बताएं कि चूक किस स्तर पर हुई है.
पुस्तक जो जुगुप्सा का भाव पैदा करता है. कहीं-कहीं लगता है कि यह अपराध के रास्ते राजनीतिक सत्ता हासिल करने की प्रक्रिया का महिमा मंडल कर रहा है. यद्यपि लेखक का उद्देश्य यह नहीं है. पाठक पुस्तक के उन पन्नों से तेजी से आगे बढ़ना चाहता है जिसमें एसoटीoएफo का गठन पुलिसिया तैयारी का ब्यौरा है. एक डर यह भी है कि अपराध जगत में प्रवेश कर गए युवा इस पुस्तक से सबक लेकर वह गलतियां ना करें जो इसके मुख्य पात्र ने की ,व्यभिचार में लिप्त होने और मोबाइल के प्रयोग के चलते ही वह पकड़ में आया और मारा गया.
मैं यह सलाह दूंगा की 16 से 18 वर्ष के बच्चों को पढ़ने के लिए इस पुस्तक को अनुशंसित ना की जाए. हताशा निराशा या प्रतियोगिता परीक्षा में सफलता उन्हें सत्ता की ओर जाने के लिए बंदूक का सहारा लेने की प्रेरणा ना दे दे. पुस्तक के अंत के पहले तक माओ की पंक्तियां इस पर लागू होती है की 'राजनीतिक शक्ति बंदूक की नली से निकलती है' परंतु मुख्य पात्र के एनकाउंटर के बाद इस धारणा को विराम लगता है .जिसका विवरण पुस्तक के अंतिम 10 प्रस्तों पर है. डर यह है कि 295 पृष्ठ की पुस्तक का तरुण पाठक के मन पर यदि पहले के 285 पन्ने ना हावी हो जाए.
एक अपराधी के एनकाउंटर की सूचना मुख्यमंत्री द्वारा विधानसभा में दी जाने एवं विधायकों द्वारा मेज थप-थपा कर स्वागत करना और एक दूसरे को बधाइयां देना कहीं ना कहीं राजनीतिक महत्वाकांक्षा लिए दुर्दांत अपराधी का महिमा मंडन ही है. खैर जो भी हो इस पुस्तक में इतना माद्दा था कि मुझसे दो दिन में पढवा लिया. मेरे पुत्र ने इतनी तन्मयता से पढ़ते देखा तो पुस्तक समाप्त होने के बाद मुझसे मांगा पर मैंने कहा कि नहीं, यह पुस्तक मैं बंटी जी से मांग कर लाया उन्हें आज ही लौटना है.
शनिवार, 4 मई 2024
वाणावर डायरी - 8 (पेड़ की पैरवी)
20.5.2023
श्री श्याम जी चौहान को मैं वर्ष 2013 से जानता हूं । तब मैं जहानाबाद में था वाणावर की यात्राओं के क्रम में सोमवार को यह मुझे प्रायः मिल जाते थे, हथियाबोर भागीरथ धर्मशाला की ओर से जाने वाले रास्ते को बनाते हुए । स्थानीय लोग और सोमवारिया इन्हें इंजीनियर साहब के नाम से जानते हैं ।
पटना में मुझसे मिलने ये दूसरी बार आए हैं। मुझे सुबह उन्होंने फोन किया था कि वे कोईलवर आए हुए हैं वहां से पटना होते हुए अपने गांव भलुआ (बेला-गया )लौटेंगे । मुझसे मिलने की इच्छा व्यक्त की मैंने विनम्रता पूर्वक उन्हें बुलाया । पहली बार आज से दो-ढाई वर्ष पूर्व आए थे पत्नी की दवा लेने, बताया था कि 3 महीने में एक बार आते हैं और दवा लेकर चले जाते हैं। पत्नी हृदय रोग की मरीज है । इस बार कोईलवर में रामायण यज्ञ से लौट रहे थे। प्रारंभिक बातचीत के बाद मैंने उनकी पत्नी का हाल-चाल पूछ, अपने पांव के अंगूठे की ओर देखते हुए कहा की वह इस दुनिया में नहीं रहीं। मैं हतप्रभ हो गया मैंने कहा कि आपने मुझे सूचना क्यों नहीं दी । फिर एक क्षण रुक कर सोचा की सूचना पाकर भी मैं क्या करता बहुत होता तो उनके गांव जाकर संवेदना व्यक्त कर आता।
चौहान जी के पांच पुत्र हैं पर पति-पत्नी का अलग चूल्हा जलता है । पुत्रों या बहूओ में उतनी संवेदना नहीं थी कि वह उन्हें अपने साथ रख सके । हृदय रोग के कारण पत्नी को शौचकर्म में दिक्कत थी । आसपास कई घर बन गए थे जिस कारण वहां खेतों में जाना संभव नहीं होता। इस समस्या के समाधान के लिए उन्होंने बस्ती से थोड़ी दूरी पर पईन के किनारे मिट्टी का एक कमरा बनाया और वही पत्नी के साथ रहने लगे। उद्देश्य था कि पत्नी को शौचकर्म में कोई दिक्कत ना आए। मैं सरकार के संपूर्ण स्वच्छता अभियान ओ0 डी0 एफ0 और इसके तहत खर्च किए जा रहे हैं अरबों रुपए के बारे में सोचने लगा। उन्होंने आगे बताया कि कुछ दिनों बाद शौचालय बनाने का जुगाड़ लग गया मैं समझा कि उन्हें संपूर्ण स्वच्छता अभियान के तहत शौचालय बनाने की राशि मिल गई होगी। परंतु ऐसा नहीं था। बताया कि एक खेत को ईट भट्ठा लगाने के लिए लीज पर दिया था। उससे पैसा ना लेकर ईट ही ले लिया और शौचालय बनवा दिया।
पत्नी नहीं रही तो आपका खाना-पीना कैसे होता है, रसोई कौन बनाता है, क्या बेटे खाना बना कर दे जाते हैं मैंनै जिज्ञासा प्रकट की तब उन्होंने बताया कि एक पोती है जो आकर खाना बना देती है । बेटों के बीच जमीन बंटवारे के बाद जमीन का एक टुकड़ा उनके हिस्से भी आया, जिसकी उपज से जीवन यापन चल रहा है पोते पोतियो की जब मैंने गणना की तो कुल संख्या 19 थी।
अभी भी प्रत्येक सोमवार को प्रातः 3:30 बजे प्रातः उठकर पूजा पाठ कर, वाणावर पर्वत की ओर प्रस्थान कर जाते हैं। कोई गाड़ी वाला मिला तो उन्हें हथियाबोर तक छोड़ देता है, अन्यथा पैदल ही निकल पड़ते हैं । पर्वत के शिखर पर स्थित बाबा सिद्धनाथ मंदिर में भगवान शिव को जलाभिषेक कर अपने काम में लग जाते हैं। बड़े चट्टानों को खंती के सहारे लाना उन्हें उचित तरीके से सही जगह पर रखना, ताकि श्रद्धालुओं को चढ़ने उतरने में सुविधा हो फिर सीमेंट से जोड़ना। दोपहर का भोजन वे लेकर आते हैं यदि कोई भक्त इस कार्य में उनका हाथ बॅटाता है तो वह उसे भी भोजन करवाते हैं। आते-जाते भक्तजन उनकी इस श्रद्धा भक्ति को देखकर काम में मदद करते हैं। मैं भी कभी सोमवार को अपने पुत्र के साथ जाता हूं तो थोड़ा श्रमदान आवश्यक कर देता हूं । वे रास्ता बनाने का कर लगभग 20 वर्षों से कर रहे हैं 4 किलोमीटर रास्ता लगभग तैयार हो गया।
10 वर्षों से आत्मीयता रहने के बावजूद श्री चौहान ने कभी मुझसे कोई मदद नहीं मांगी। सरकारी पदाधिकारी होने के 23 वर्षों के अनुभव से मैंने जाना है कि लोग किसी मदद या पैरवी के उद्देश्य से ही नजदीकियां बढ़ाते हैं।
हां एक बार श्याम जी चौहान ने मुझे एक काम की पैरवी करने के लिए कहा था । यह वाणावर पर्वत पर सिद्धनाथ मंदिर जाने के मार्ग के किनारे लगाए गए नन्हे बरगद के पेड़ को बचाने के लिए था। अपने बनाए रास्ते के किनारे राहगिरों को छाया के लिए बरगद का पेड़ लगाया था इस उम्मीद से की एक दिन दरख्त बनकर छाया देगा। श्रावणी मेले के ठेकेदारों ने जब बिजली के तार और ट्यूबलाइट से जकड़ कर इसकी इसकी कोपलों को तोड़ दिया तो दुखी मन से उन्होंने रात 10:00 बजे मुझे फोन कर इस पेड़ को बचाने की गुहार लगाते हुए मुझसे यह उम्मीद की कि मैं जिले के कलेक्टर को फोन कर दूॅ । मैं स्तब्ध था कि इस पेड़ की पैरवी इतनी रात को मैं किससे करूं। यदि नहीं करता तो न जाने कब तक मेरी अंतरात्मा मेरे पर्यावरण प्रेमी मन को धिक्कारती रहती, शायद जीवन भर। मैंने तत्काल जिले के उपविकास आयुक्त परितोष जी को रात्रि फोन कर कहा कि मैं एक बरगद के पेड़ की पैरवी के लिए फोन किया है, जो इसे लगवाने वाले श्याम जी चौहान के माध्यम से मुझ तक पहुंची है । परितोष जी ने व्यक्तिगत अभिरुचि लेकर बरगद पर लगा बिजली का तार और ट्यूब लाइट्स को हटवा कर पेड़ को संरक्षित करवाया ।आज श्याम जी चौहान का आना अच्छा लगा परंतु उनकी पत्नी की मृत्यु की सूचना ने मुझे आहत किया। मैंने भारी मन से उन्हें 1:30 बजे विदा किया उनकी गाड़ी 3:00 बजे थी।
बुधवार, 15 फ़रवरी 2023
गया डायरी-2
6 फरवरी 2023- गया से लौटकर
श्री शैवाल उन कथाकारों में से है जिन्होंने अपने पात्रों के साथ जीवन जिया है ,उनके साथ समय बिताया है । फणीश्वर नाथ रेणु भी अपने पात्रों के साथ ही जिए । अपनी कहानियों का पात्र बनाया और ये कहानियां कथा जगत का पैमाना साबित हुई। ऐसे कम ही कथाकार है जो अपने सृजन का उत्स जीवन के जटिल संघर्षों से निकालकर सामने लाते है। उन्हें पाठकों के रू-ब-रू खड़ा कर देते हैं कई प्रश्नों के साथ। एक अदना सा पात्र जिसका सामान्य जन-जीवन में कोई नोटिस नहीं लेता उसे इतना व्यापक और मर्मस्पर्शी बना देते हैं कि पाठक कहानीकार का नाम भूल जाए पर पात्र का नाम नहीं भूल पाता। परंतु कभी-कभी ये पात्र कथा जगत से बाहर निकल कर फिल्मों के माध्यम से जनमानस में स्थानी ठिकाना बना कर लोक-कथा का रूप ले लेते हैं।
कल गया, गया तो शैवाल जी से मिला 5-6 वर्षों बाद मुलाकात हो रही थी। अक्सर उनसे कहानी के पात्र फिल्म और रचनाओं पर बात होती है । आज भी उन्होंने कई कथा पात्रों के बारे में बताया जिसमें एक जेहल था जो उनकी कहानी का नायक है .
"तोरो औरतिया छोड़ के चल गलो हे का?"
बिखरे दांपत्य जीवन के समग्र बिरह की पीड़ा इस एक वाक्य से ही व्यंजित हो गई। आगे उन्होंने बताया कि जब एक बार उसने सुना कि उसकी पत्नी बगल के गांव में चादर चढ़ाने आई है तो बरसात में भरी नदी को पार करने के लिए उसने कूद गया। हम प्रेम के वर्गीय चरित्र पर बात कर रहे थे । कहानी धर्म युग में छपी थी।
दूसरा वाकय इससे ज्यादा हृदयस्पर्शी है। 1981 में श्री शैवाल अतरी (गया) में जनगणना के कार्य में लगे थे। उन्हें एक व्यक्ति मिला जो उनकी कहानी का पात्र बना । प्रचंड गर्मी में ताड़ के पेड़ के पास खगड़े (तार के सूखे पत्ते ) की झोपड़ी में वह रहता था । कहानी लिखकर छपने के लिए भेजी गई। धर्मयुग के संपादक धर्मवीर भारती ने कुछ सत्य घटनाओं की स्वीकार्यता पर संदेह व्यक्त करते हुए कथाकार से उस अंश को हटा देने का अनुरोध किया । 'आदिम राग ' कहानी संपादित कर धर्मयुग में छपी।
फिर दशकों बाद केतन मेहता श्री शैवाल से मिलने गया आये वो और उनकी पत्नी दीपा मेहता इसी बरामदे में बैठी थी जहां मैं आज बैठा हूं। बिजली नहीं थी , गया के प्रचंड गर्मी में ताड़ के सूखे पत्ते के बने हाथ-पंखे से सभी हवा झल रहे थे। कहानी के उसी अंश पर बात हो रही थी जिसे धर्मवीर भारती ने हटा दिया था। केतन मेहता उस पर फिल्म बनाना चाह रहे थे। उनके अनुरोध पर श्री शैवाल दशरथ मांझी पर बनने वाली फिल्म के स्क्रिप्ट कंसलटेंट बने। वह डायलॉग जो इस फिल्म का पंचलाइन बना
"भगवान के भरोसे मत बैठो क्या पता भगवान हमारे भरोसे बैठा हो।" शैवाल जी की ही देन है।
फिर बात 'मृत्युदंड' तक पहुँची। प्रकाश झा एनo एफo डीo सीo से अनुदानित एक फिल्म बनाना चाह रहे थे। इसके लिए जरूरी था कि समय से फिल्म की कहानी एनoएफoडीoसीo में जमा कर दी जाए । कहानी इतनी सशक्त हो की अस्वीकृत ना होने पाए। तब उन्होंने शैवाल जी को मुंबई बुलाया जल्द से जल्द अच्छी कहानी लिखने का अनुरोध किया। यदि कहानी एक-दो दिन में एनoएफoडीoसीo में जमा नहीं होती तो प्रकाश झा को अनुदान नहीं मिल पाता। होटल के कमरे में कहानी लिखना प्रारंभ किया प्रकाश झा वहां से निगरानी करने लगे थे कि कहानी लिखने में कोई व्यवधान न हो । यहां तक की होटल वाले को भी हिदायत दे रखी थी कि खाना दरवाजे के नीचे से सरका कर दे दिया जाए। 18 घंटे में कहानी लिख दी गई। ससमय इसे एनoएफoडीoसीo में जमा कर दिया गया। इस कहानी पर एक छोटे बजट की फिल्म बनाने की योजना थी। कुछ दिनों बाद बॉलीवुड के बौद्धिक जगत में इस कहानी की चर्चा होने लगी। कहानी माधुरी दीक्षित तक पहुंची। कहानी पसंद आई। उन्होंने इस कहानी पर बनने वाली फिल्म में काम करने की इच्छा व्यक्त की। तब कई लोग आगे आए और एक बड़े बजट की सफल फिल्म बनी जिसमें शबाना आजमी, ओम पुरी, माधुरी दीक्षित, शिल्पा शिरोडकर हार मोहन आगाशे जैसे कलाकारों ने काम किया। यह फिल्म 1997 में सिनेमाघरों में प्रदर्शित हुई।
माधुरी दीक्षित ने इस फिल्म में कार्य के अनुभव को साझा करते हुए एक साक्षात्कार में कहा था कि मैंने अपने जीवन में मृत्युदंड की पात्र 'केतकी ' से बेहतर चरित्र का अभिनय नहीं किया है।
तीन बजने वाले थे और मुझे पटना लौटना था। गया की व्यस्त सड़कों से गुजरता हुआ मैं टावर चौक पहुंचा। गणिनाथ भारती के प्रसिद्ध ईमरती दुकान से ही ईमरती ले एनoएचo 82 के निर्माणाधीन धूल'धूसरित सड़कों पर पटना की ओर बढ़ गया।
शनिवार, 11 फ़रवरी 2023
गया डायरी-1( गयाशिर्ष स्तूप)
06 फरवरी 2023
रविवार का दिन पटना से बाहर की मेरी यात्राओं के लिए अनुकूल होता है. आज सुबह 7:00 बजे मैं अपने पुत्र प्रणय के साथ गया की ओर निकल पड़ा.
सुबह के कारण सड़क पर कम भीड़ थी परंतु पटना से महुली तक निर्माणाधीन फ्लाईओवर के कारण सड़क संकरी और धूल भरी थी इसे पार कर पुनपुन की ओर मुड़ा तो पुनपुन नदी के पुल से गुजरते हुए फिर निर्माणाधीन एनएच 82 पर चल पड़ा पुनपुन नदी के बाद सड़क संकरी हुआ करती थी जिसका अस्तित्व नहीं दिख रहा था नए सड़क ने इसे विलीन कर दिया था. इसके बाद लगातार हम निर्माणाधीन NH 82 और पुराने सड़क पर चढ़ते-उतरते 9:30 बजे गया शहर में प्रवेश कर गये .
हमें गयासिस पर्वत (ब्राह्मयोनि) जाना थाआज माघ पूर्णिमा (6 फरवरी 2033) को यहां गयाशिर्ष स्तूप को प्राण-प्रतिष्ठित किया जाना था.वियतनाम की बौद्ध भिक्षुणी वेन बोधितचित्ता एवं दीपक आनंद जी ने बड़ी शिद्दत से मुझे आमंत्रित किया था. दोनों ही संत प्रवृत्ति के हैं. मुझसे पुरानी मित्रता है. स्तूप के निर्माण में इनकी अहम भूमिका है .
विगत 3 वर्षों से इसका निर्माण कार्य चल रहा था . भिक्षुणी बोधितचित्ता सही मायने में एक संत है, सन् 2019 से श्रीलंका के एक गुमनाम पहाड़ पर विपश्यना (तपस्या) मे थी. मैंने एक बार पूछा था तो उन्होंने बताया कि पहाड़ी के आसपास कुछ बौद्ध धर्मावलंबी श्रद्धावश उन्हें भोजन दान कर जाते हैं, जिससे उनकी जीविका चल पाती है.
450 फीट की ऊंचाई पर स्तूप का निर्माण करना कठिन कार्य था पर यह पूरा हुआ. गया टावर चौक से आगे बढ़ने के बाद कई सड़कों में वन वे ट्रैफिक रहने के कारण मेरी गाड़ी को प्रवेश न करने दिया गया. तंग सड़कों से गुजरते हुए गूगल और स्थानीय पूछ-ताछ के बाद विष्णुपद मंदिर के पास पहुंचा. यहां का संकरा रास्ता और रविवार के भीषण भीड़ को झेलता हुआ मैं 10:45 बजे स्तूप के पास पहुंचा.
इस स्थान पर भगवान बुद्ध ने बोधगया से राजगीर जाने के क्रम में अग्नि पूजक जटिल भाइयों, गया और नदी कश्यप को आदित्य पर्याय सूत्त का उपदेश दिया था. यहां घटित दूसरी महत्वपूर्ण ऐतिहासिक घटना यह है कि जब देवदत्त 500 बौद्ध भिक्षुको के साथ संघ से अलग हो गए थे तो इसी पर्वत पर आकर रुके थे, बिंबिसार ने उनके संघ के लिए भोजन की व्यवस्था की थी .
भगवान बुद्ध के निर्देश पर सारीपुत्र यहां आए थे और संगीतिपर्याय सूत्त का उपदेश दिया था. जिसके बाद संघ का एकीकरण हुआ. इस प्रकार यह स्तूप हमें याद दिलाता रहेगा कि भगवान बुद्ध के जीवन काल में ही संघ में दरार आनी प्रारंभ हो गई थी और इसे रोकने का सफल प्रयोग इसी स्थल पर किया गया था.
आज सैकड़ों की संख्या में कई देश के बौद्ध भिक्षु भिक्षुणियों ने यहां प्रार्थना की और भगवान बुद्ध के इन सूत्रों का पाठ किया . आज भगवान बुद्ध यहां जीवंत हो उठे.
माता बोधितचित्ता और दीपक आनंद जी अत्यंत सहृदयता से मिले, मुझे और मेरे पुत्र को आशीर्वाद दिया . पुत्री राजतरंगिणी जिसके जन्म के बाद वे बिहार शरीफ अस्पताल में आई थी और अपना नाम उसे दे दिया था 'बोधितचित्ता' .उसका भी हालचाल पूछा कि" लिटिल 'बोधितचित्त' कैसी है" . कार्यक्रम संपन्न होने के बाद इन्होंने मुझे बोधगया चलने का अनुरोध किया परंतु मुझे शैवाल जी से मिलना था इसलिए दोनों से क्षमा मांग कर वहां से गया की ओर निकल गया.
मंगलवार, 25 अक्टूबर 2022
बिहार फिल्म डायरी 1
प्रख्यात साहित्यकार शैवाल की रचनाओं पर कई फिल्मों का निर्माण हो चुका है जिसमें 'दामुल' 'मृत्युदंड' और 'दास कैपिटल गुलामों की राजधानी' प्रमुख है. शैवाल बिहार के एक छोटे से अंचल घोसी को अपना कथा गुरु मानते हैं. उक्त सभी कहानियों और फिल्मों की पृष्ठभूमि बिहार है. वस्तुतः शैवाल ने ही प्रकाश झा को प्रकाश झा बनाया 'दामुल' प्रकाश झा की पहली फिल्म थी इसकी कहानी इतनी सशक्त है कि इसे राष्ट्रीय स्वर्ण कमल पुरस्कार मिला था, जिसने उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाई . 'मृत्युदंड' फिल्म की शूटिंग के बाद मुख्य नायिका माधुरी दीक्षित ने कहा था कि मैंने अपने जीवन में इस फिल्म की स्त्री चरित्र से बेहतर चरित्र का रोल अदा नहीं किया है. 'दास कैपिटल गुलामों की राजधानी' वर्ष 2020 में रिलीज हुई थी अभी हाल ही में फिल्म 'मट्टो की साइकिल' की समीक्षा लिखते हुए प्रख्यात फिल्म समीक्षक सुभाष केo झा ने इस फिल्म पर कुछ इस तरह की टिप्पणी की है
"मट्टो की साइकिल ने मुझे दिवंगत छायाकार राजेन कोठारी के निर्देशन में बनी दास कैपिटल गुलामों की राजधानी की बहुत याद दिलाई। जाने-माने हिंदी लेखक शैवाल के लेखन के आधार पर, यह हमें सीधे बिहार के एक दूरदराज के शहर में एक सरकारी कार्यालय में ले जाता है जहां भ्रष्टाचार न केवल जीवन का एक तरीका है बल्कि अस्तित्व का एकमात्र साधन भी है। रिश्वतखोरी, कमीशन और अन्य अंडर-द-टेबल प्रथाओं का महिमामंडन किए बिना मानव अध: पतन का यह विश्वसनीय नाटक हमें मनहूस जीवन के दलदल में डाल देता है, जिनमें से कुछ जैसे यौन शोषित पत्नी (आयशा रजा) की लेखक शैवाल के कथा पात्र से पहचाने जाने योग्य व्यक्ति हैं। नायक पुरुषोत्तम राम को , एक वंचित व्यक्ति, जिसकी बढ़ती वित्तीय देनदारियां हैं, हर सरकारी कर्मचारी ने जीवन के एक तरीके के रूप में भ्रष्टाचार और रिश्वत स्वीकार कर लिया है। यह एक ईश्वरविहीन, मनहूस शहर है यहां जीवन यापन कर रहे गरीबों के लिए एक सतत संघर्ष है, बीमार पड़ना एक विलासिता है जिसे पात्र बीमार कर सकते हैं। इसे बिहार के लोकेशन पर शूट किया गया, सिनेमैटोग्राफी का कार्य राजेन कोठारी ने नहीं बल्कि चंदन गोस्वामी द्वारा किया गया है, दास कैपिटल एक सामाजिक तालाबंदी में फंसे अपूरणीय पात्रों का एक निरा और अनगढ़ रूप है।
(सुभाष के झा के मूल आलेख का लिंक
सोमवार, 29 नवंबर 2021
नवादा डायरी-2 : गांधी इंटर स्कूल और राजकमल चौधरी
इस विद्यालय का भवन ऑग्ल-भारतीय शैली के स्थापत्य का नायाब नमूना है।
मंगलवार, 23 नवंबर 2021
इस्लामपुर डायरी (Islampur Dayari) -4
पटना के असिस्टेंट सेटलमेंट अफसर जेoएफoडब्ल्यूoजेम्स ने सर्वे के फाइनल रिपोर्ट में लिखा है कि इस्लामपुर का चौधरी परिवार पटना के कुछ महत्वपूर्ण जमींदार यथा मसौढी के राजा जसवंत सिंह अमावा स्टेट और गुजरी परिवारों में से एक था शाहजहांपुर और भीमपुर में भी अपने पूर्वजों की जमीदारी का कुछ हिस्सा वापस पाया था।
साहित्य अकादमी पुरस्कार विजेता उर्दू साहित्यकार अब्दुस्समद के उपन्यास 'दो गज जमीन ' में भी इस्लामपुर के चौधरी परिवार की कुछ झलक मिलती है।
शुक्रवार, 19 नवंबर 2021
पटना डायरी-6 (पटना काउंसिल का गठन)
गुरुवार, 5 नवंबर 2020
पटना पर लिखी एक वाहियात किताब
'मैटर ऑफ रैट्स' पटना पर लिखी एक वाहियात किताब है. लेखक अमिताभ कुमार है जो अमेरिका में रहते है. पुस्तक संस्मरणात्मक लहजे में लिखी गई है, परंतु कोई निरंतरता नहीं है. 'कहीं का ईंट कहीं का रोड़ा भानुमति ने कुनबा जोड़ा'. लेखक का बचपन एवं किशोरावस्था पटना मे बीता है. यह बताना नहीं भूलते की वे अंग्रेजीदा स्कूल मे पढ़ें एक उच्च अधिकारी के पुत्र है . पाठक पुस्तक पढकर सहज अनुमान लगा सकते है की इनका जमीनी हकीकत से कभी वास्ता नहीं रहा . यदि कोई विदेशी इस पुस्तक को पढ़ ले तो उसे लगेगा कि पटना चूहों का शहर है.
भूमिका में वे लिखते हैं कि पटना का भोग मनुष्य नहीं चूहे करते हैं और दोनों एक साथ जीते हैं. कभी जलान संग्रहालय कभी अरुण प्रकाश की कहानी कभी बिंदेश्वर पाठक के सुलभ शौचालय में घुमाते हैं; कोई तारतम्यता नहीं है. ऐसा लगता है कि पटना संबंधित बेतरतीब नोट्स को पुस्तक का रूप दे दिया हो. अपने स्कूल की उत्कृष्टता बताते हैं, उसका नाम भी बताना नहीं भूलते. उनके बौद्धिक दिवालियापन का आलम यह है वे चूहों और उसके मारने की कला के संबंध में किसी गांव में जाकर नहीं पूछते बल्कि बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री से मिलते हैं, और इस संबंध में पूछ-ताछ करते हैं. कुल मिलाकर अमिताभ जी उस जमात में शामिल है जो पहली दुनिया में रहकर अपनी तीसरी दुनिया की गलत तस्वीर पेश कर सस्ती लोकप्रियता हासिल करना चाहते है. चीजों को वैसे ही परोसते है जैसा उनका आश्रयदाता चाहता है.
रविवार, 31 मई 2020
जलालगढ़ डायरी : पूर्णिया का किला (jalalgarh fort of purneya)

19 वी सदी के प्रारंभ में पूर्णिया का जिला मुख्यालय, और कोर्ट-कचहरी रामबाग में था जो सौरा और कोसी नदी की धारा के बीच में स्थित था. अस्वास्थ्यकर परिस्थितियों के कारण इसे ईस्ट इंडिया कंपनी ने यहां से स्थानांतरित करने का निर्णय लिया.
सन 1815 ई० में तत्कालीन कलेक्टर ने जिला मुख्यालय को रामबाग से हटाकर जलालगढ़ में स्थानांतरित करने की अनुशंसा की थी परंतु कतिपय कारणों से संभव नहीं हो सका. वर्तमान में किले की लंबाई पूरब से पश्चिम 550 फिटर उत्तर से दक्षिण 410 फीट है. किले की दीवार की ऊंचाई 22 फीट और चौडाई 7 फिट है.
यद्यपि पर्यटन के दृष्टिकोण से यहां कुछ विशेष सुविधा उपलब्ध नहीं है, परंतु एन.एच-57 से सटे होने के कारण यहां पहुंचना मुश्किल नहीं है. इतिहास और मध्यकालीन स्थापत्य में रुचि रखने वाले व्यक्तियों को इस किले का भ्रमण एक बार अवश्य करना चाहिए.

















































