"डुकारेल की पूर्णिया " को पढ़ते हुए 18वीं शताब्दी का बंगाल बिहार और पूर्णिया जीवंत हो उठता है, जब मुगलिया सल्तनत के जूते में ईस्ट इंडिया कंपनी पांव रखकर डेगा-डेगी प्रशासन चलाने की कवायदात कर रहा था ।
यह उपन्यास भारतीय इतिहास के एक सत्य घटना पर आधारित है, जिसका केंद्र वर्तमान बिहार और तत्कालीन बंगाल का एक सीमावर्ती जिला पूर्णिया है। इसकी शुरुआत 1770 से होती है । ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा आधुनिक प्रशासनिक व्यवस्था का बीजारोपण भी इसी समय हुआ था। बक्सर की लड़ाई के बाद जब उसे दीवानी अधिकार मिला था तो क्षेत्रीय प्रशासनिक व्यवस्था विकसित करना बाध्यकारी भी था । पूर्णिया बंगाल के उन 10- 12 जिलों में से था जहां पहली बार क्षेत्रीय प्रशासन और लगान वसूली के पर्यवेक्षण के लिए डिस्ट्रिक्ट सुपरवाइजर की नियुक्ति 1769 इस्वी में हुई ।
तब के बंगाल में आज का बांग्लादेश पश्चिम बंगाल बिहार और उड़ीसा शामिल थे । 1770 में डिस्ट्रिक्ट सुपरवाइजरो ने प्रभार ग्रहण किया। उपन्यास का प्रारंभ भी इसी समय से होता है, जब पूर्णिया का डिस्ट्रिक्ट सुपरवाइजर डुकारेल कोलकाता से चलकर (जल मार्ग से ) काढ़ागोला घाट पहुंचता है । वहां मुगल प्रशासनिक व्यवस्था का क्षेत्रीय प्रधान फौजदार उसके स्वागत मे कई दिनों से प्रतीक्षारत है। यह अंग्रेजों के आगे मुगल सल्तनत के आत्मसमर्पण का प्रतीक है।
1770 में बंगाल में भयंकर अकाल पड़ा था पूर्णिया भी इससे अछूता नहीं था यहां की आधी आबादी काल-कलवित हो गई थी । डुकारेल मानवीय गुणों से लबरेज एक उदात्त नायक है
अकाल की समस्या मे बड़ी सूझ-बूझ से निपटता है । उसके इस नायकत्व को हमारा जेहन आसानी से स्वीकार नहीं करता। हम यह पढ़ते और सुनते हुए पले-बढ़े हैं कि अंग्रेज आताताई होते थे ।उसका यह उदात्त चरित्र और विशाल बनकर तब उभरता है जब वह सती प्रथा का विरोध करते हुए एक सती होने जा रही स्त्री को उसके पति कि चिता पर से उतारकर प्राण रक्षा करता है। रूढ़िवादी समाज का विरोध झेलता है उस से विवाह करता है और उसे अपने साथ वापस इंग्लैंड ले जाता है।
यह एक शोध परक ऐतिहासिक उपन्यास है, जिसके अंत में संदर्भ ग्रंथों की लंबी फेहरिस्त है। यह भी हिंदी साहित्य मे ऐतिहासिक उपन्यासों के लिए एक बिल्कुल स्वस्थ, ईमानदार और अनुकरणीय परंपरा की शुरुआत है।
प्रकाशक द्वारा प्रूफ-रिडर रखने की परंपरा समाप्त हो गई है। जिस कारण इसमें कई वर्तनी संबंधी एवं भाषागत अशुद्धियां है । यदि इसे हटा दिया जाए तो विश्वास करना थोड़ा मुश्किल है की यह लेखक डॉक्टर लक्ष्मीकांत सिंह का पहला उपन्यास है । यह उपन्यास एक ओर हमें गेरार्ड गुस्तावस डुकारेल के गुमनाम ऐतिहासिक चरित्र से रू-ब-रू कराता है वहीं दूसरी ओर 18वी शताब्दी के जन-जीवन, कृषि, मौसम विज्ञान , रैयत- जमींदार संबंध और न जाने कितने अनछुए पहलुओं से अवगत कराता है। यह हिंदी साहित्य में इतिहास के रास्ते एक नई बयार लेकर आया है ।इसे एक बार अवश्य पढ़ना चाहिए।





पठनीय और संग्रहणीय पुस्तक है यह । इसकी पंक्तियों से होकर गुजरना एक सुखद अनुभव है ।
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