बुधवार, 21 अक्टूबर 2026

मैला आंचल : पुनर्पाठ (किसी एक अंचल नहीं संपूर्ण भारत के ग्रामीण जीवन का यथार्थ )


  रेणु ने उपन्यास का नाम "मैला आंचल" रखा और सुधि आलोचकों ने इसे आंचलिक उपन्यास घोषित कर कोसी के आँचल को ना जाने क्यों मैला कह दिया. यह उपन्यास स्वतंत्रोत्तर काल के सामाजिक आर्थिक एवं राजनीतिक जीवन को प्रतिबिंबित करता है. इसकी शुरुआत परतंत्र और स्वतंत्र भारत के संधिकाल से होता है, जब बिहार में कांग्रेस मंत्रिमंडल की सरकार बनी थी. 1942 का आंदोलन समाप्त हुआ था महात्मा गांधी सर्वजन स्वीकार्य जीवित किंवदन्ती नेता हो चुके थे. कांग्रेस के अलावा किसी अन्य राजनीतिक दल की पहुँच ग्रामीण क्षेत्र में नहीं हुई थी.  
भारतवर्ष के लाखों गांव की तरफ मेरीगंज भी अपने नाम के साथ एक आख्यान जोड़े हुए था. जिसका संबंध नीलहे अंग्रेज मार्टिन और उसकी पत्नी मेरी से था. गांव जाति के अनुरूप विभिन्न टोलो में बँटा था, यथा मलिक टोली, कैथ टोली, ग्वालटोली, ततमा टोली, राजपूत टोली या सिपहिया टोली, पासवान टोला, बभन टोली इसमें यादव और ततमा अपने को क्षत्रिय होने का दावा करते थे. राजपूत और कायस्थों की परस्पर जातिगत प्रतिद्वंदिता थी वह एक दूसरे के टोलों को परस्पर  सिपहिया टोली और कैथ टोली कहते हैं.  
        ग्राम्य जीवन के सामाजिक ताने-बाने, जटिलता एवं विषमता का जितना बारिक विश्लेषण निरपेक्ष दृष्टि से किया गया है, खासकर जाति व्यवस्था का उतना अन्यत्र दुर्लभ है. यही कारण है कि आलोचक इसे सहजता से स्वीकार न कर सके और आंचलिकता का दर्जा देते हुए दरकिनार करने की कोशिश की । 
   ग्रामीण क्षेत्र में मठ होना आम बात है सो मेरी गंज में भी एक कबीर मठ है. जिसके महंथ सेवादास दासीन लक्ष्मी और रामदास है. इस मठ के प्रसंग के कारण उपन्यास कबीरमय में हो गया है. मठ में लक्ष्मी को कम उम्र में ही लाकर दासिन बना दिया जाता है.  "एक बाघ है तो दूसरा बिलार बीच में लक्ष्मी" कबीर मठ के अधःपतन का जो वर्णन किया गया वह भी कहीं ना कहीं वामपंथी आलोचकों को उस जमाने में खटका होगा, पर लेखक ने ईमानदारी से मठ व्यवस्था का रोचक वर्णन किया है. यह उपन्यास का केंद्र तो नहीं पर केंद्र के आसपास की चीज जरूर है जब सेवादास अपने कुकर्मों के कारण सामाजिक उपेक्षा का शिकार हो जाता है. उसे अपने किए की सजा मिलती है. लक्ष्मी के जवान होने से पूर्व ही अंधा हो जाता है. और ग्रामीण मठ को को हेय दृष्टि से देखने लगते हैं, तो वह एक भंडारा देने का निर्णय लेता है, ताकि इसी बहाने वह अपने आप को पुनर्स्थापित कर सके यहां फिर जाति व्यवस्था के ताने-बाने की बारीकियां उभर कर सामने आती है, ब्राह्मण कहते हैं कि वे सर्व-संगठन में नहीं खाएंगे, राजपूत कहते हैं ग्वालों के साथ बैठकर नहीं खाऐंगें वे कहते हैं कि उनका आटा घी, चीनी दे दें वह अलग बनवा लेंगे, यादव कहते हैं कि धानुक लोग के साथ बैठकर नहीं खाएंगे.  
      इसके बावजूद बलदेव यादव गांधी बाबा का सच्चे शिष्य है और उनके आदर्शों पर चलता है जब राजपूत टोला में एक दिन जाता है तो शिव शंकर सिंह के दरवाजे पर चार पांच लोग बैठे हैं कोई उसे बैठने को नहीं कहता, इसके बावजूद वह सबको 'जय हिंद' कहता है. इस पर हरगौरी सिंह उसे अपमानित करते हुए कहता है "अरे भाई सभी काशी चले, पतल चाटने के लिए भी कुछ लोग रह जाओ जेल क्या गए पंडित जमाहिरलाल वन गये कांग्रेश ऑफिस में भोलंटियरी करते थे, अब अंधों में काना बनकर यहां लीडरी छांटने आया है. स्वयंसेवक ना घोड़ा का दुम."  बालदेव के इस अपमान पर पूरा यादव टोला राजपूत टोला पर आक्रमण कर देता है पर बलदेवे गांधीवाद एवं अहिंसा के सिद्धांत का पालन करते हुए बलवा को रोकते हैं और गांधी महात्मा की जय कह कर स्वजातीय बलबाइयों को लौटा देता है, हरगौरी को क्षमा कर देता है. भ्रष्टाचार समाज में अपनी जड़ें जमाने लगा है एक प्रसंग में हरगौरी जो क्लास में बार-बार फेल करता है उसका बाप उसे पास कराने के लिए मास्टर को घूस देने गया था पर मास्टर ने डांट कर भगा देता है.  
उपन्यास की शुरुआत ही विकास की नई बयार की आहट देता है, जो भविष्य में बनने वाले नवोदित भारतवर्ष के लोक कल्याणकारी राज्य की पृष्ठभूमि बनाता है. डिस्टिक बोर्ड के लोग एक जमीन की तलाश में गए हैं जिसे मार्टिन के डिस्पेंसरी बनाने के लिए रजिस्ट्री कर दिया था. डिस्पेंसरी बनाने में भी मजदूरी के लिए तिकड़म पेंच होती है और ग्रामीण परिवेश के मैले हो रहे आंचल का प्रथम दर्शन करवाता है लोगों ने जिस उत्साह से एक होकर स्वतंत्रता आंदोलन में हिस्सा लिया था विकासात्मक कार्य में रुचि नहीं दिखाते और इसे डिस्ट्रिक्ट बोर्ड का काम मानते हैं. उन्हें लगता है कि लीडर मजदूरी के पैसे खा गया है और हम से मजदूरी करवाना चाहता है.  
             डिस्पेंसरी में एक अज्ञात कुलशील का डॉक्टर आता है उसके पहुंचने से पहले ही लोग बाग उसके जात जानने को लेकर बेचैन हो जाते हैं. यह जाति व्यवस्था की कटु सच्चाई है कि ग्रामीण समाज में बिना जात जाने उसका कोई स्थान ही नहीं निर्धारित हो पाता नाम से यदि जातीय स्पष्ट नहीं होती तो नाम के बाद जाति पूछी जाती है.
 
    "जाति बहुत बड़ी चीज होती है जाति-पात नहीं मानने वाली की भी जाति होती है शहर में कोई किसी से जाति नहीं पूछता शहर के लोगों की जाति का क्या लेकिन गांव मैं तो बिना जाति का पानी नहीं चलेगा" 
 
यह किसी भी गांव के सामाजिकता का यथार्थ है किसी व्यक्ति के गांव पहुंचने से पहले उसकी जाति पहुंचती है । राही बटोही से भी गांव घर पहुंचने के बाद उसकी जाति पहुंच जाती है. सामाजिक हैसियत के लिए जाति सबसे महत्वपूर्ण मानदंड है राजपूतों के मुखिया राम कृपाल सिह निरक्षर है जब उन्हें एक बार अपने निरक्षर होने पर ग्लानि होती है तो वे सोचते हैं:  "सचमुच विद्या की महिमा बड़ी है लेकिन भगवान ने शरीर दिया है, उच्च जाति में जन्म दिया है. इसी के बल पर बाबू- बबुआन हाकिम-हुककाम और अमला-फैला से हेल-मेल हुआ जान पहचान हुई"  
  ग्लानि सिर्फ इसलिए कि डिस्टिक बोर्ड के ओवरसीर किरानी के आगे तहसीलदार विश्वनाथ प्रसाद बाजी मार गए इसके बावजूद भी वह विद्या ग्रहण की बात नहीं सोचते अस्पताल होने की बात सुनकर ही ब्राह्मणों ने इसका विरोध शुरू कर दिया दिन-रात डॉक्टर अंग्रेजी दवा के खिलाफ तरह-तरह की कहानियां सुनाने लगे सामाजिक ताने-बाने में शीर्ष पर बैठे व्यक्ति हमेशा यथास्थिति बनाए रखना चाहता है ताकि उसके आसन को कोई खतरा न पहुंचे. ब्राह्मणों को लगा कि यदि बीमारियां अस्पताल से ही ठीक हो जाएगी तो उसकी पूछ घट जाएगी, लोग बीमार होंगे तो अस्पताल की और दौड़ेंगे न कि ब्राह्मण ज्योतिषी के घर.  
          हरगौरी-बालदेव प्रकरण के बाद यादव सेना का राजपूतों पर हमले से ग्राम्य जीवन में दलबंदी शुरू हुई अन्य जाति के लोग यथा ज्योतिखी जी इसे हवा देते हुए कहते हैं की "यादव लोग बात-बात में लाठी-भाला दिखाते हैं राजपूतों के लिए यह डूब मरने की बात है." यह उस भविष्य की आहट हैं जिसने जातीय सेनाओं को जन्म दिया सनलाइट सेना, लोरिक सेना, रणवीर सेना इत्यादि यहीं ग्राम्य जीवन का आंचल मैला हुआ यह किसी एक अंचल का यथार्थ नहीं संपूर्ण भारत के ग्रामीण परिवेश का यथार्थ है.  
                                                           
                                                         ( डायरी के पुराने पन्नों से)

गुरुवार, 15 अक्टूबर 2026

18वी शताब्दी मे ब्रितानी हुकूमत द्वारा लगाया गया एक गैर कानूनी कर : अबवाब (ABWAB)

अबवाब भारतीय इतिहास की राजस्व व्यवस्था में एक अत्यंत महत्वपूर्ण और जटिल कर प्रणाली रहा है जिसका गहरा प्रभाव यहाँ की सामाजिक और आर्थिक संरचना पर पड़ा। शाब्दिक रूप से यह अरबी भाषा के शब्द बाब का बहुवचन है जिसका अर्थ अध्याय, खंड या द्वार होता है लेकिन ऐतिहासिक संदर्भ में इसका प्रयोग मुख्य भूमि राजस्व के अतिरिक्त लगाए जाने वाले विविध प्रकार के उपकरों या गैर-कानूनी शुल्कों के लिए किया जाता था।
           इस कर व्यवस्था की जड़ें भारत के मध्यकालीन इतिहास और विशेष रूप से दिल्ली सल्तनत के दौर में देखी जा सकती हैं जब सुल्तानों ने राज्य की वित्तीय आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए मूल कर के ऊपर अतिरिक्त कर लगाने की शुरुआत की थी। आगे चलकर मुग़ल काल और अठारहवीं शताब्दी के बंगाल के नवाबों के शासनकाल में इस व्यवस्था का अत्यधिक विस्तार हुआ। जब मुग़ल केंद्रीय सत्ता कमजोर हुई और क्षेत्रीय नवाबों तथा ज़मींदारों का प्रभाव बढ़ा तब उन्होंने अपनी व्यक्तिगत विलासिता, प्रशासनिक खर्चों और सैन्य आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए किसानों तथा आम जनता पर अनगिनत छोटे-बड़े अबवाब थोप दिए।
इन अतिरिक्त करों को लगाने के पीछे कई तरह के बहाने और प्रशासनिक कारण होते थे जिनकी प्रकृति अत्यंत विविध थी। 
        कुछ अबवाब सीधे तौर पर उन शासकों के नाम से जुड़े थे जिन्होंने उन्हें लागू करने का आदेश दिया था जैसे नवाब मीर कासिम के समय लगाया गया कर जबकि अन्य कर किसी विशेष प्रशासनिक सेवा या आवश्यकता के बहाने वसूले जाते थे। उदाहरण के लिए स्थानीय पुलिस और सैन्य व्यवस्था के खर्चों को पूरा करने के लिए ज़मींदारों से शुल्क लिया जाता था जिसे बाद में आम जनता पर डाल दिया जाता था। इसी प्रकार सैन्य चौकियों से लगे बाज़ारों में मदिरा और अन्य दैनिक वस्तुओं की बिक्री करने वाले छोटे दुकानदारों से भी विशिष्ट शुल्क वसूला जाता था जो कानून व्यवस्था बनाए रखने के नाम पर एकत्रित होता था। इसके अलावा कुछ कर ऐसे भी थे जो सीधे तौर पर सम्राट या उच्च अधिकारियों को खुश करने के लिए नजराने के रूप में वसूले जाते थे जैसे ईस्ट इंडिया कंपनी को दीवानी अधिकार मिलने के समय शासकों को भेंट देने के बहाने जनता पर कर लगा दिया गया। 
   इन करों का स्वरूप केवल प्रशासनिक ही नहीं था बल्कि यह ग्रामीण जीवन के सामाजिक और व्यक्तिगत स्तर तक फैला हुआ था। ग्रामीण क्षेत्रों में ज़मींदार जब भी किसी गाँव के दौरे पर जाते थे तो उनके रहने, खाने और स्वागत-सत्कार का पूरा खर्च उसी गाँव के गरीब निवासियों से एक विशेष उपकर के रूप में वसूला जाता था जिसे मेहमानी कर कहा जाता था।
   इसी तरह यदि स्थानीय क्षेत्रों में सार्वजनिक सड़कों या रास्तों की मरम्मत करानी होती थी तो उस जिले या शहर के लोगों से राहदारी के रूप में अलग से दरें वसूली जाती थीं। इससे भी अधिक शोषणकारी रूप तब देखने को मिलता था जब समाज के सबसे निचले और श्रमजीवी वर्गों को निशाना बनाकर टैक्स लगाए जाते थे। 
           ओडिशा जैसे क्षेत्रों में बुनकरों, पान बेचने वालों और पारंपरिक मिठाई बनाने वाले कारीगरों जैसी विशिष्ट जातियों और व्यवसायों पर उनके काम के आधार पर विशेष कर लगाए गए जिन्हें सामाजिक रूप से हेय दृष्टि से देखा जाता था। 
      ब्रिटिश शासन के आगमन के बाद जब लॉर्ड कॉर्नवालिस ने सत्रह सौ तिरानवे में बंगाल में स्थायी बंदोबस्त की शुरुआत की तो इस व्यवस्था में एक बड़ा बदलाव आया। ब्रिटिश सरकार ने अपनी राजस्व प्राप्ति को निश्चित और सुचारू बनाने के लिए इन सभी अतिरिक्त और बिखरे हुए अबवाबों को आधिकारिक रूप से अवैध घोषित कर दिया या फिर उन्हें मुख्य भूमि राजस्व के साथ ही समाहित कर दिया। 
        कानूनी रूप से इन करों को समाप्त करने के बावजूद ज़मींदारी व्यवस्था के भीतर इसका प्रचलन पूरी तरह बंद नहीं हुआ। ग्रामीण भारत में ज़मींदार अपने स्थानीय प्रभाव और शक्ति के बल पर अदालती नियमों की अनदेखी करते हुए लंबे समय तक किसानों से गुप्त रूप से ऐसे विभिन्न शुल्कों की वसूली करते रहे जिसके कारण ग्रामीण ऋणग्रस्तता और किसानों का शोषण निरंतर बढ़ता गया। अंततः भारत की स्वतंत्रता के बाद जब बीसवीं शताब्दी के मध्य में विभिन्न राज्यों द्वारा ज़मींदारी उन्मूलन अधिनियम पारित किए गए तब जाकर इस दमनकारी कर व्यवस्था और ज़मींदारों के इस पारंपरिक अधिकार को पूरी तरह और हमेशा के लिए समाप्त किया जा सका।


परिशिस्ट : कुछ अबवाब जो इस दौर में वसूले जाते थे - 
  • अबवाब कासिम अली खान: यह कर बंगाल के नवाब कासिम अली खान (जिन्हें मीर कासिम भी कहा जाता है) द्वारा जारी आदेशों के तहत वसूला जाने वाला कर था।
  • अबवाब-फौजदारी: यह टैक्स ज़मींदारों पर लगाया जाता था, जो मुख्य सैन्य और पुलिस मजिस्ट्रेट यानी फौजदार के कार्यालय को दिए जाने वाले शुल्कों के बदले में चुकाया जाता था।
  • अबवाब थानादारी: यह शुल्क शुजा खान द्वारा पुलिस या सैन्य चौकियों से जुड़े बाज़ारों में शराब और अन्य वस्तुएँ बेचने वाले खुदरा व्यापारियों से वसूला जाता था और इसे कोतवाल को दिया जाता था।
  • अबवाब खमसा: खमसा शब्द से बना यह कर ढाका के गवर्नर द्वारा उस समय लगाया गया था जब ईस्ट इंडिया कंपनी को दीवानी अधिकार प्राप्त हुए थे, और इसे सम्राट को दीवानी अनुदान की पावती के रूप में भेंट देने के बहाने वसूला जाता था।
  • अबवाब मेहमानी: यह एक ऐसा उपकर था जिसे किसी गाँव के निवासियों पर तब लगाया जाता था जब ज़मींदार वहाँ कभी-कभार दौरे पर आते थे, ताकि उनके रहने और स्वागत का खर्च निकाला जा सके।
  • अबवाब राहदारी: यह दरें या टैक्स किसी शहर या जिले के आम लोगों से वहाँ की सार्वजनिक सड़कों और रास्तों की मरम्मत तथा रखरखाव के लिए वसूला जाता था।
  • अबवाब पटाला: यह कर विशेष रूप से ओडिशा क्षेत्र में प्रचलित था जिसका शाब्दिक अर्थ पतितों या दुष्टों पर कर था, और इसे आठ निम्न या पिछड़े माने जाने वाले व्यवसायों और जातियों पर लगाया जाता था जिनमें बुनकर (तांती), पान-सुपारी बेचने वाले (तांबुली) और मिठाई बनाने वाले (गुड़िया) शामिल थे।

बुधवार, 7 अक्टूबर 2026

ख़्वाब आँखों में अधूरे

इस गली की बात हो
या उस डगर की बात हो,
आँख में आँसू भरे हैं
किस सफ़र की बात हो।

बस्तियाँ जलती रहीं,
और लोग चुप बैठे रहे,
राख हर आँगन में है अब
किस के घर की बात हो।

हवा में बारूद है,
साँसों पे पहरा लग गया,
ज़िंदगी बेदम खड़ी है
किस असर की बात हो।

ज़हर की भाषा यहाँ अब
हो गई इतनी सुबोध,
प्यार का लहज़ा छुपा है
किस असर की बात हो।

बाँटते हैं जो दिलों को
मज़हबों के नाम पर,
नफ़रतें जब बढ़ रही हैं
किस हुनर की बात हो।

ख़्वाब आँखों में अधूरे,
रास्ते धुंधला गए,
रात का पहरा कड़ा है
किस सहर की बात हो।

                                                                      सुबोध 
                                                                   7.10.26