सोमवार, 31 अगस्त 2026

शफ़्फ़ाफ़

 

वो शफ़्फ़ाफ़ आँखें, वो बेनूर ग़ज़लें,

उसी को तलाशे चली जा रही हैं।

हवाओं में बहती हुई कुछ उदासी,

चराग़ों को जैसे बुझाए रही हैं।

​न रस्तों पे कोई निशाँ बन रहा है,

न आहट का कोई गुमाँ बन रहा है।

मगर दिल की बस्ती उसी मोड़ पर अब,

धुएँ का मुसलसल मकाँ बन रहा है।

​किताबों के पन्नों पे ठहरी ख़मोशी,

छुपाए हुए इक सदा ढूँढती है।

जुदा हो गई थी नज़र से जो कल तक,

उसी सादगी की अदा ढूँढती है।

​धुँधलके में डूबी हुई सी लकीरें,

हथेली पे फिर से सँवरने लगी हैं।

उफ़ुक़1 पर चमकते हुए इक सितारे

की मानिंद पलकें ठहरने लगी हैं।

​सुबोध अब क़लम से बहे जा रहे हैं,

जो अफ़साने लफ़्ज़ों में रह जा रहे हैं।

उसी गुमशुदा की तलब ओढ़ कर फिर,

ये बेताब आँखें, ये ख़ामोश ग़ज़लें,

उसी को तलाशे चली जा रही हैं।

1.क्षितिज

                                      सुबोध 31 अगस्त 2026

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