मंगलवार, 1 सितंबर 2026

घर का पता

 दरीचों पे बैठी गहरी ख़ामोशी

दीवारों पे नाम-ओ-निशाँ लिख रही है


​आईने में जब भी तकूँ अपना चेहरा

पहचान अपनी कहीं खो रही है


​अँधेरे के कोने में बुझता दीया बस

हवा के थपेड़ों से दम तोड़ता है


​दराज़ों में रक्खे हुए ख़त पुराने

सुनाने लगे हैं कई ग़म के फ़साने


​वजूद अपना अफ़्साना लगने लगा है

'सुबोध' अपनी हस्ती भी अब मिट रही है


​सदियों से फैली हुई ये उदासी

मुझसे ही मेरे घर का पता पूछती है

सुबोध

1 सितंबर 2026

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