दरीचों पे बैठी गहरी ख़ामोशी
दीवारों पे नाम-ओ-निशाँ लिख रही है
आईने में जब भी तकूँ अपना चेहरा
पहचान अपनी कहीं खो रही है
अँधेरे के कोने में बुझता दीया बस
हवा के थपेड़ों से दम तोड़ता है
दराज़ों में रक्खे हुए ख़त पुराने
सुनाने लगे हैं कई ग़म के फ़साने
वजूद अपना अफ़्साना लगने लगा है
'सुबोध' अपनी हस्ती भी अब मिट रही है
सदियों से फैली हुई ये उदासी
मुझसे ही मेरे घर का पता पूछती है
सुबोध
1 सितंबर 2026
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