गुरुवार, 15 अक्टूबर 2026

18वी शताब्दी मे ब्रितानी हुकूमत द्वारा लगाया गया एक गैर कानूनी कर : अबवाब (ABWAB)

अबवाब भारतीय इतिहास की राजस्व व्यवस्था में एक अत्यंत महत्वपूर्ण और जटिल कर प्रणाली रहा है जिसका गहरा प्रभाव यहाँ की सामाजिक और आर्थिक संरचना पर पड़ा। शाब्दिक रूप से यह अरबी भाषा के शब्द बाब का बहुवचन है जिसका अर्थ अध्याय, खंड या द्वार होता है लेकिन ऐतिहासिक संदर्भ में इसका प्रयोग मुख्य भूमि राजस्व के अतिरिक्त लगाए जाने वाले विविध प्रकार के उपकरों या गैर-कानूनी शुल्कों के लिए किया जाता था।
           इस कर व्यवस्था की जड़ें भारत के मध्यकालीन इतिहास और विशेष रूप से दिल्ली सल्तनत के दौर में देखी जा सकती हैं जब सुल्तानों ने राज्य की वित्तीय आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए मूल कर के ऊपर अतिरिक्त कर लगाने की शुरुआत की थी। आगे चलकर मुग़ल काल और अठारहवीं शताब्दी के बंगाल के नवाबों के शासनकाल में इस व्यवस्था का अत्यधिक विस्तार हुआ। जब मुग़ल केंद्रीय सत्ता कमजोर हुई और क्षेत्रीय नवाबों तथा ज़मींदारों का प्रभाव बढ़ा तब उन्होंने अपनी व्यक्तिगत विलासिता, प्रशासनिक खर्चों और सैन्य आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए किसानों तथा आम जनता पर अनगिनत छोटे-बड़े अबवाब थोप दिए।
इन अतिरिक्त करों को लगाने के पीछे कई तरह के बहाने और प्रशासनिक कारण होते थे जिनकी प्रकृति अत्यंत विविध थी। 
        कुछ अबवाब सीधे तौर पर उन शासकों के नाम से जुड़े थे जिन्होंने उन्हें लागू करने का आदेश दिया था जैसे नवाब मीर कासिम के समय लगाया गया कर जबकि अन्य कर किसी विशेष प्रशासनिक सेवा या आवश्यकता के बहाने वसूले जाते थे। उदाहरण के लिए स्थानीय पुलिस और सैन्य व्यवस्था के खर्चों को पूरा करने के लिए ज़मींदारों से शुल्क लिया जाता था जिसे बाद में आम जनता पर डाल दिया जाता था। इसी प्रकार सैन्य चौकियों से लगे बाज़ारों में मदिरा और अन्य दैनिक वस्तुओं की बिक्री करने वाले छोटे दुकानदारों से भी विशिष्ट शुल्क वसूला जाता था जो कानून व्यवस्था बनाए रखने के नाम पर एकत्रित होता था। इसके अलावा कुछ कर ऐसे भी थे जो सीधे तौर पर सम्राट या उच्च अधिकारियों को खुश करने के लिए नजराने के रूप में वसूले जाते थे जैसे ईस्ट इंडिया कंपनी को दीवानी अधिकार मिलने के समय शासकों को भेंट देने के बहाने जनता पर कर लगा दिया गया। 
   इन करों का स्वरूप केवल प्रशासनिक ही नहीं था बल्कि यह ग्रामीण जीवन के सामाजिक और व्यक्तिगत स्तर तक फैला हुआ था। ग्रामीण क्षेत्रों में ज़मींदार जब भी किसी गाँव के दौरे पर जाते थे तो उनके रहने, खाने और स्वागत-सत्कार का पूरा खर्च उसी गाँव के गरीब निवासियों से एक विशेष उपकर के रूप में वसूला जाता था जिसे मेहमानी कर कहा जाता था।
   इसी तरह यदि स्थानीय क्षेत्रों में सार्वजनिक सड़कों या रास्तों की मरम्मत करानी होती थी तो उस जिले या शहर के लोगों से राहदारी के रूप में अलग से दरें वसूली जाती थीं। इससे भी अधिक शोषणकारी रूप तब देखने को मिलता था जब समाज के सबसे निचले और श्रमजीवी वर्गों को निशाना बनाकर टैक्स लगाए जाते थे। 
           ओडिशा जैसे क्षेत्रों में बुनकरों, पान बेचने वालों और पारंपरिक मिठाई बनाने वाले कारीगरों जैसी विशिष्ट जातियों और व्यवसायों पर उनके काम के आधार पर विशेष कर लगाए गए जिन्हें सामाजिक रूप से हेय दृष्टि से देखा जाता था। 
      ब्रिटिश शासन के आगमन के बाद जब लॉर्ड कॉर्नवालिस ने सत्रह सौ तिरानवे में बंगाल में स्थायी बंदोबस्त की शुरुआत की तो इस व्यवस्था में एक बड़ा बदलाव आया। ब्रिटिश सरकार ने अपनी राजस्व प्राप्ति को निश्चित और सुचारू बनाने के लिए इन सभी अतिरिक्त और बिखरे हुए अबवाबों को आधिकारिक रूप से अवैध घोषित कर दिया या फिर उन्हें मुख्य भूमि राजस्व के साथ ही समाहित कर दिया। 
        कानूनी रूप से इन करों को समाप्त करने के बावजूद ज़मींदारी व्यवस्था के भीतर इसका प्रचलन पूरी तरह बंद नहीं हुआ। ग्रामीण भारत में ज़मींदार अपने स्थानीय प्रभाव और शक्ति के बल पर अदालती नियमों की अनदेखी करते हुए लंबे समय तक किसानों से गुप्त रूप से ऐसे विभिन्न शुल्कों की वसूली करते रहे जिसके कारण ग्रामीण ऋणग्रस्तता और किसानों का शोषण निरंतर बढ़ता गया। अंततः भारत की स्वतंत्रता के बाद जब बीसवीं शताब्दी के मध्य में विभिन्न राज्यों द्वारा ज़मींदारी उन्मूलन अधिनियम पारित किए गए तब जाकर इस दमनकारी कर व्यवस्था और ज़मींदारों के इस पारंपरिक अधिकार को पूरी तरह और हमेशा के लिए समाप्त किया जा सका।


परिशिस्ट : कुछ अबवाब जो इस दौर में वसूले जाते थे - 
  • अबवाब कासिम अली खान: यह कर बंगाल के नवाब कासिम अली खान (जिन्हें मीर कासिम भी कहा जाता है) द्वारा जारी आदेशों के तहत वसूला जाने वाला कर था।
  • अबवाब-फौजदारी: यह टैक्स ज़मींदारों पर लगाया जाता था, जो मुख्य सैन्य और पुलिस मजिस्ट्रेट यानी फौजदार के कार्यालय को दिए जाने वाले शुल्कों के बदले में चुकाया जाता था।
  • अबवाब थानादारी: यह शुल्क शुजा खान द्वारा पुलिस या सैन्य चौकियों से जुड़े बाज़ारों में शराब और अन्य वस्तुएँ बेचने वाले खुदरा व्यापारियों से वसूला जाता था और इसे कोतवाल को दिया जाता था।
  • अबवाब खमसा: खमसा शब्द से बना यह कर ढाका के गवर्नर द्वारा उस समय लगाया गया था जब ईस्ट इंडिया कंपनी को दीवानी अधिकार प्राप्त हुए थे, और इसे सम्राट को दीवानी अनुदान की पावती के रूप में भेंट देने के बहाने वसूला जाता था।
  • अबवाब मेहमानी: यह एक ऐसा उपकर था जिसे किसी गाँव के निवासियों पर तब लगाया जाता था जब ज़मींदार वहाँ कभी-कभार दौरे पर आते थे, ताकि उनके रहने और स्वागत का खर्च निकाला जा सके।
  • अबवाब राहदारी: यह दरें या टैक्स किसी शहर या जिले के आम लोगों से वहाँ की सार्वजनिक सड़कों और रास्तों की मरम्मत तथा रखरखाव के लिए वसूला जाता था।
  • अबवाब पटाला: यह कर विशेष रूप से ओडिशा क्षेत्र में प्रचलित था जिसका शाब्दिक अर्थ पतितों या दुष्टों पर कर था, और इसे आठ निम्न या पिछड़े माने जाने वाले व्यवसायों और जातियों पर लगाया जाता था जिनमें बुनकर (तांती), पान-सुपारी बेचने वाले (तांबुली) और मिठाई बनाने वाले (गुड़िया) शामिल थे।

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