डुकारेल की पूर्णिया को पढ़ते हुए 18 वीं शताब्दी का बंगाल बिहार और पूर्णिया जीवंत हो उठता है, जब मुगलिया सल्तनत के जूते में ईस्ट इंडिया कंपनी पांव रखकर डेगा-डेगी प्रशासन चलाने की कवायदात कर रहा था .
उपन्यासकार डॉo लक्ष्मीकांत अल्लामा इकबाल कॉलेज बिहारशरीफ में पाली भाषा एवं साहित्य विभाग के विभागाध्यक्ष है. 'यह पत्र मां को एक साल बाद मिलेगा' पढ़कर उनकी अभिरुचि इस विषय में जगी. यह कहानी राज राघव संपादित 'परती पलार' के कथा-कोसी विशेषांक में छपा था. इस कहानी को पढ़ने के बाद लगभग तीन वर्ष तक तल्लीनता से शोध कर इतिहास बोध वाले इस उपन्यास की रचना की है.
यह उपन्यास भारतीय इतिहास के एक सत्य घटना पर आधारित है, जिसका केंद्र वर्तमान बिहार और तत्कालीन बंगाल का एक सीमावर्ती जिला पूर्णिया है। इसकी शुरुआत 1770 से होती है । ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा आधुनिक प्रशासनिक व्यवस्था का बीजारोपण भी इसी समय हुआ था। बक्सर की लड़ाई के बाद जब उसे दीवानी अधिकार मिला था तो क्षेत्रीय प्रशासनिक व्यवस्था विकसित करना बाध्यकारी हो गया था । पूर्णिया बंगाल के उन 8-9 जिलों में से था जहां पहली बार क्षेत्रीय प्रशासन और लगान वसूली के पर्यवेक्षण के लिए डिस्ट्रिक्ट सुपरवाइजर की नियुक्ति 1769 इस्वी में हुई ।
तब के बंगाल में आज का बांग्लादेश पश्चिम बंगाल बिहार और उड़ीसा शामिल थे । 1770 में डिस्ट्रिक्ट सुपरवाइजरो ने प्रभार ग्रहण किया। उपन्यास का प्रारंभ भी इसी समय से होता है, जब पूर्णिया का डिस्ट्रिक्ट सुपरवाइजर डुकारेल कोलकाता से चलकर (जल मार्ग से ) काढ़ागोला घाट पहुंचता है । वहां मुगल प्रशासनिक व्यवस्था का क्षेत्रीय प्रधान फौजदार उसके स्वागत मे कई दिनों से प्रतीक्षारत है। यह अंग्रेजों के आगे मुगल सल्तनत के आत्मसमर्पण का प्रतीक है ।
डुकारेल इस उपन्यास का केंद्रीय नायक है नायिका चंदा 'नेटिव' है। 18 वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में भारतीय समाज मध्ययुगीन पाखंड और अंधविश्वास में निमग्न था । सती प्रथा मे विधवा स्त्री को पति की चिता पर जिंदा जला दिया जाना उच्च कुल में सामान्य बात थी। डुकारेल के लिए यह हिंसक दृश्य असहनीय और पीड़ादायक था। वह इस पाखंडी कर्मकांड के बीच में हस्तक्षेप कर उस स्त्री को बचा लेता है जिसे पति के साथ जिंदा जलाया जा रहा था। सामाजिक कुंठाऐ व्यक्ति से इस प्रकार नाभिनालबद्ध थी कि उसे कोई शरण देने को तैयार न था ।
परिस्थितिवश डुकारेल की नजदीकियां चंदा से बढ़ने लगी जिसकी परिणति उपन्यास मे हम देखते है। वह इंग्लैंड से ईस्ट इंडिया कंपनी मे राइटर के पद पर बहाल होकर भारत आता है । इंग्लैंड जहां बरसों पहले पुनर्जागरण नामक वैचारिक क्रांति हो चुकी थी। यूरोप मध्ययुग से निकलकर आधुनिक काल में प्रवेश कर गया था। वह तमाम मध्ययुगीन मुल्क को अपना उपनिवेश बना रहा था। भारतीय उपमहाद्वीप भी इसकी चपेट में थे।यूरोप के औपनिवेशिक कीचड़ के बीच से डुकारेल जैसा उदात्त नायक कमल सादृश्य पल्लवित होता है।
हिंदी साहित्यकारों ने औपनिवेशिक युग की पृष्ठभूमि पर कई कहानियां और उपन्यासों की रचना की है। प्रेमचंद, जैनेंद्र, राजा राधिका रमन प्रसाद, शिवपूजन सहाय, राहुल सांकृत्यायन एवं पांडे बेचन शर्मा उग्र जैसे साहित्यकारों का लंबा समय स्वतंत्रता पूर्व औपनिवेशिक काल में ही गुजरा। स्वतंत्रता संग्राम में साहित्यकारों एवं बुद्धिजीवी के सक्रिय योगदान को नकारा नहीं जा सकता है। लेखन पर भी राष्ट्रवाद और गांधीवाद की छाया पड़ी उस जमाने में ऐसे किसी पात्र पर कहानी लिखने की कोई सोच भी नहीं सकता था
1770 ईसवी के आसपास भारत पुनर्जागरण के दहलीज पर खड़ा था। अंग्रेजी शिक्षा प्राप्त बुद्धिजीवी वर्ग इसका अग्रदूत बना। राजा राममोहन राय के प्रयास से 1829 ईस्वी में सती प्रथा रोकने के लिए कानून लाया गया । सती प्रथा विरोधी आंदोलन के 50 वर्ष पूर्व डुकारेल सती होने जा रही एक स्त्री को पति कि चिता पर से उतारा तो वह समाज के सभी वर्गों से बहिष्कृत हो गई। इस अकल्पनीय स्थिति से डुकारेल उसे कैसे निकाला यह उपन्यास पढ़कर ही समझा जा सकता है। किसी भारतीय समाज सुधारक में सती प्रथा का विरोध करते हुए उसके पुनर्वास के लिए कोई व्यवस्था नहीं की जो सती प्रथा को प्रतिबंधित करने वाले कानून को अक्षरशः लागू करने में बाधक बना। सती प्रथा के विरोध में किसी भारतीय समाज सुधारक ने वह साहस नहीं दिखलाया जो पूर्णिया जिले के प्रथम सुपरवाइजर जीo जीo डुकारेल ने दिखाया। ऐसा नहीं है की डुकारेल ने भारत में पहली बार ऐसा किया, इससे पहले भी कोलकाता के संस्थापक जॉब चार्नाक द्वारा सती प्रथा के प्रबल विरोध का उदाहरण मिलता है
उपन्यास का कालखंड लगभग दो वर्षों का है। 1770 से 1772 ईo यह उत्तर भारत में औपनिवेशिक शासन के विस्तार का समय था। 1770 ईo में बंगाल में भयंकर अकाल पड़ा था। पूर्णिया भी इससे अछूता नहीं था । यहां की आधी आबादी काल-कलवित हो गई थी । डुकारेल मानवीय गुणों से लबरेज एक उदात्त नायक है।
अकाल की समस्या मे बड़ी सूझ-बूझ से निपटता है । उसके इस नायकत्व को हमारा जेहन आसानी से स्वीकार नहीं करता। हम यह पढ़ते और सुनते हुए पले-बढ़े हैं कि अंग्रेज आताताई होते थे ।उसका यह उदात्त चरित्र और विशाल बनकर तब उभरता है जब वह सती प्रथा का विरोध करते हुए एक सती होने जा रही स्त्री को उसके पति कि चिता पर से उतारकर प्राण रक्षा करता है। रूढ़िवादी समाज का विरोध झेलता है .
उपन्यासकार बारीकी से सामाजिक ताने-बाने की पड़ताल करते हुए हमें उस कालखंड में ले जाते हैं जहां रेल मोटर गाड़ी फोन जहाज जैसी कोई आधुनिक सुख सुविधा नहीं है। ईस्ट इंडिया कंपनी के शासक फौजदार जमींदार और सामंती वर्ग के आपसी संबंध पर पैनी दृष्टि रखते हुए उपन्यास आगे बढ़ता है।
यह एक शोध परक ऐतिहासिक उपन्यास है, जिसके अंत में संदर्भ ग्रंथों की लंबी फेहरिस्त है। यह भी हिंदी साहित्य मे ऐतिहासिक उपन्यासों के लिए एक बिल्कुल स्वस्थ, ईमानदार और अनुकरणीय परंपरा की शुरुआत है।
प्रकाशक द्वारा प्रूफ-रिडर रखने की परंपरा समाप्त हो गई है। जिस कारण इसमें कई वर्तनी संबंधी एवं भाषागत अशुद्धियां है । यदि इसे हटा दिया जाए तो विश्वास करना थोड़ा मुश्किल है की यह लेखक डॉo लक्ष्मीकांत सिंह का पहला उपन्यास है । यह उपन्यास एक ओर हमें गेरार्ड गुस्तावस डुकारेल के गुमनाम ऐतिहासिक चरित्र से रू-ब-रू कराता है वहीं दूसरी ओर 18वी शताब्दी के जन-जीवन, कृषि, मौसम विज्ञान , रैयत- जमींदार संबंध और न जाने कितने अनछुए पहलुओं से अवगत कराता है। विषय और कथ्य की दृष्टि से यह अपने तरह का हिंदी साहित्य में इकलौता उपन्यास है . यह हिंदी साहित्य में इतिहास के रास्ते एक नई बयार लेकर आया है ।इसे एक बार अवश्य पढ़ना चाहिए।
सुबोध
8.2.2021




Very beautifully explained.
जवाब देंहटाएंVery informative
जवाब देंहटाएंपुस्तक के बारे में प्रस्तुत संक्षिप्त जानकारी को पढ़ने के बाद ऐतिहासिक दृष्टिकोण , अंग्रेज द्वारा सामाजिक और प्रशासनिक सुधार को कुछ हद तक समझने का मौका मिला । इसके साथ ही पुस्तक को पढ़ने के प्रति जिज्ञासा भी जगी है । ताकि सम्पूर्ण तौर पर उस कालखंड को और सामाजिक व राजनीतिक व्यवस्था को और भी गहराई से जानने और समझने का मौका मिल सके । पुस्तक के संबंध में प्रस्तुत की गयी टिप्पणी के लिए बहुत आभार व्यक्त करते हैं।
जवाब देंहटाएंअशोक कुमार
अधिवक्ता
पटना उच्च न्यायालय