सोमवार, 21 सितंबर 2026

पूर्णिया डायरी-26( पुश्तैनी जमींदारों का विस्थापन)

​1769 ईस्वी में जिन जिलों में 'डिस्ट्रिक्ट सुपरवाइजर' (जिला पर्यवेक्षक) की नियुक्ति हुई, वहां उनके सहयोग के लिए एक 'नेटिव दीवान' (देशी दीवान) को भी संबद्ध किया गया। इसी क्रम में पूर्णिया में देवी सिंह को नेटिव दीवान नियुक्त किया गया।

​1769-70 ईस्वी में पूर्णिया में भीषण अकाल पड़ा, जिससे वहां की लगभग आधी आबादी काल-कवलित हो गई। तत्कालीन सुपरवाइजर डुकरेल (Ducarrel) के लिए स्थानीय भाषा और परंपराओं की अनभिज्ञता राजस्व प्रशासन संभालने में बड़ी बाधा बन रही थी। इस कारण मालगुजारी का निर्धारण, अभिलेखों की जांच तथा किसानों व जमींदारों से कर-वसूली का वास्तविक नियंत्रण पूर्णतः देवी सिंह के हाथों में आ गया।

एक ओर जहाँ डुकरेल द्वारा अनाज वितरण जैसे कुछ राहत कार्य किए गए, जो सर्वथा अपर्याप्त थे; वहीं दूसरी ओर देवी सिंह ने भुखमरी की कगार पर खड़े किसानों और विपन्न जमींदारों से क्रूरतापूर्वक कर वसूल कर अकाल की विषम परिस्थिति में भी भारी राजस्व जुटाया। अकाल के दौरान भी संकलित राजस्व को नियमित रूप से फोर्ट विलियम (कलकत्ता) भेजने के कारण वह डुकरेल और वारेन हेस्टिंग्स की नज़रों में एक अत्यंत विश्वसनीय और कुशल राजस्व एजेंट बन गया।

​जब ईस्ट इंडिया कंपनी के निर्धारित लक्ष्य के अनुसार बंगाल में राजस्व संकलन नहीं हो पाया, तब 1772 ईस्वी में वारेन हेस्टिंग्स ने पाँच वर्षीय भू-बंदोबस्त (पंचशाला बंदोबस्त) व्यवस्था लागू की।

​देवी सिंह ने कंपनी से अपने घनिष्ठ संबंधों का लाभ उठाया और पूर्णिया के सबसे बड़े तथा समृद्ध परगनों—जैसे हवेली पूर्णिया, धरमपुर और सैफगंज—का बंदोबस्त अपने तथा अपने रिश्तेदारों के नाम पर कराने में सफल रहा।

​यहीं से पारंपरिक राजस्व व्यवस्था में आमूलचूल परिवर्तन देखने को मिलता है, जहाँ से जमींदारों और रैयतों के बीच के पारंपरिक सौहार्दपूर्ण संबंधों के टूटने का दौर शुरू हुआ। इसके परिणामस्वरूप पुराने पुस्तैनी जमींदार—जैसे हवेली के चौधरी (मुस्लिम जमींदार), श्रीपुर और सुल्तानपुर के पुस्तैनी बक्कायस (कायस्थ) जमींदार, तथा ताजपुर व सूरजपुर (सुजापुर) के फखरुद्दीन हुसैन व उनके परिवार (सैयद घराने)—के हाथों से ज़मींदारी छिन गई।

​दीवान देवी सिंह के इन दमनकारी कृत्यों के विरुद्ध 1772 ईस्वी में पूर्णिया के रैयतों और विस्थापित जमींदारों ने 'कोर्ट ऑफ सर्किट' में आवेदन दिया।

सुबोध 

22.9.26

1 टिप्पणी:

  1. आपके द्वारा लिखा गया यह इतिहास सारगर्भित, उत्कृष्ट प्रदर्शन और उदाहरण है।

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