बुधवार, 24 अप्रैल 2019

पूंजीवाद,समाजवाद, साम्राज्यवाद, उपनिवेशवाद और बिहार

पूँजीवाद उस आर्थिक व्यवस्था को कहते है जिसमे उत्पादन के साधनों पर निजी स्वामित्व होता है . निजी अर्थात किसी व्यक्ति या व्यक्ति के समूह का अधिकार रहता है.
समाजवादी / कम्यूनिस्ट  / मार्क्सवादी व्यवस्था में उत्पादन के साधनों पर समाज , कम्यून , या श्रमिको का अधिकार रहता है.
साम्राज्यवाद पूंजीवादी विकास का चरम रूप है.अर्थात साम्राज्यवाद पूंजीवादी विकास का वह चरण है जब एकाधिकार और वितीय पूंजी का प्रभुत्व स्थापित हो जाता है.
उपनिवेशवाद वास्तव में साम्राज्यवाद को विकसित करने का एक तरीका है.
2019 चुनाव में बिहार में सभी शक्तियाँ हावी है. 23 मई को परिणाम आने है , देखें किसे मैंडेट मिलता है.

शनिवार, 23 मार्च 2019

किशनगंज डायरी -2 : एक हुक्का, एक हाथी और सताइस पतलूनें

विलियम स्लेसर (WILLIAM SLESSOR ) का जन्म पुर्तगाल में हुआ 29 अक्टूबर 1778 को था. मृत्यु १८१० ईस्वी में किशनगंज में हुई, तब डुकारेल पुरनिया से जा चुके थे. उन दिनों यूरोप के युवाओं में ब्रिटेन के पूर्वी उपनिवेशों  का जबरदस्त आकर्षण था. "East is the carrier" का मुहावरा प्रचलित था. हर कोई भारत आाकर ईस्ट इंडिया कम्पनी में नौकरी या व्यापार करना चाहता था. नौकरी और व्यापर के बीच की सीमा रेखा बङी क्षीण थी . कंपनी कम वेतन देती थी बदले में उसने अपने अधिनस्थों को निजी व्यापर की भी छूट दे रखी थी. ईस्ट इंडिया कंपनी में कोई ओहदा पाकर, भारत जाने वाले जहाजी बड़े पर चढ़ जाना एक हसीन ख्वाब था. विलियम स्लेसर (WILLIAM SLESSOR ) के इस ख्वाब की तामीर सन् 1795 ईस्वी में हुई,



जब ईस्ट इंडिया कम्पनी के रंगरूट कैडेट बन 'FRANCIS' पर सवार हो भारत पँहुचे. उनके आँखों में एक ऐसी चमक थी जो पुरे कायनात को अपने आगोश में ले लेना चाहती थी.



इसके ठीक 223 साल बाद ओलिवा कोलमन (OLIVA COLMAN ) की आँखों में भी वैसी ही चमक थी जब वह अपने पूर्वजों की तलाश में किशनगंज आईं. पर चमक थोड़ी मद्धम तब पड़ जब, उन्हें यह पता लगा कि उनकी 3*परदादी के पिता विलियम स्लेसर किशनगंज में शिकार के दौरान अपनी ही गोली के शिकार हो गए थे.



यह खबर 13 जुलाई 1810 के " EVENING MAIL" में छपी थी. वे कई महत्वपूर्ण युद्धों में भाग लेने और पदोन्नति पाकर द्वितीय नेटिव इन्फेंट्री में कैप्टेन के पद पर सीमांत प्रदेश किशनगंज में कार्यरत थे. यही उन्हें एक स्थानीय लड़की से मोहब्बत हुई और उससे विवाह किया . (OLIVIA COLMAN ) की आँखों फिर वह चमक लौट आयी जब उन्हें पता चला की उनकी 3*परदादी की माँ भारतीय महिला थी. जब विलियम स्लेसर की मृत्यु हुई तो (OLIVIA COLMAN ) की 3*परदादी HARIET SLESSOR की उम्र मात्र तीन वर्ष की थी.



मृत्यु के उपरांत जो इन्वेंट्री बनी उसमे कई सामानों के साथ एक हुक्का, एक हाथी और 27 पतलूनों का जिक्र है. यह इन्वेंट्री एक अंग्रेज ऑफिसर के संस्कृतिकरण का बयान है.
 1810 में विलियम स्लेसर की मृत्यु के बाद इंग्लैंड से उनकी माँ ने उसकी 3 वर्षीय पुत्री  (HARRIET SLESSOR) को अपने खर्चे पर इंग्लैंड बुलवा लिया. छह माह की समुद्री यात्रा अकेले तय कर वह वंहा पंहुची. युवा होकर वह फिर भारत आयी शायद माँ की तलाश में .



यंहा ईस्ट इंडिया कंपनी के सैन्य अधिकारी CHARLES YOUNG BAZETT से दूसरा विवाह किया.
                ओलिवा कोलमन (OLIVIA COLMAN) एक सफल अभिनेत्री हैं. किशनगंज से लौटने के कुछ ही दिनों बाद


               2018 में ऐतिहासिक पृष्ठ भूमि पर बनी फिल्म 'THE FAVOURITE ' में 1708 में ब्रिटेन की महारानी QUEEN ANNE की भूमिका के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का 91वा ऑस्कर पुरस्कार मिला. 

शुक्रवार, 25 जनवरी 2019

बिहार विपश्यना और हरारी

42 वर्षीय इजरायली इतिहासकार युवाल नोआह्  हरारी की पुस्तक "सेपियंस: ए ब्रीफ हिस्ट्री ऑफ़ ह्यूमन काइंड " अंग्रेजी में वर्ष 2014 में प्रकाशित हुई. इस पुस्तक ने  विश्व  को मानव विकास का एक नया सिद्धांत दिया. बिल गेट्स, मार्क जुकरबर्ग , बराक ओबामा और अन्य  सिलिकॉन वैली के बड़े खिलाड़ी  इसे पढ़ने की सलाह दे रहे है .हरारी ने ऐसी अद्भुत रचना का श्रेय विपश्यना पद्धति से किए गए ' मैडिटेशन ' को दिया  है. जो किसी विषय पर ध्यान केंद्रित करने की अद्भुत शक्ति देता है. महत्वपूर्ण और  गैर महत्वपूर्ण चीजों में अंतर समझने की अंतर्दृष्टि देती है. वरना सूचनाओं के बाढ़ में व्यक्ति का वजूद खत्म होता जा रहा है.

     
फेरारी गत 17 वर्षों से विपश्यना पद्धति से ध्यान का अभ्यास कर रहे हैं. उनका कहना है कि प्रारंभ में  10 सेकंड से ज्यादा अपने श्वास  पर ध्यान को केंद्रित नहीं कर पाते थे. पर अभ्यास से वर्तमान में प्रत्येक दिन 2 घंटे और वर्ष में 60 दिन विपश्यना का अभ्यास करते हैं उन्होंने स्वीकार किया है कि , यदि वे  विपश्यना के संसर्ग में नहीं आते  तो मध्यकालीन मिलिटेंसी पर आलेख लिख रहे  होते  या शोध कर रहे होते.

    विपश्यना चीजों को वास्तविक स्वरूप में देखने और समझने की शक्ति देता है, जो जिस रूप में है. 
         पुस्तक में यह  सिद्धांत प्रतिपादित किया गया है कि होमो सेपियंस अन्य सेपियंस से इसलिए अलग है क्योंकि वह अपने आसपास कहानियां गढ़ता है जिसका यथार्थ में कोई वजूद नहीं है. परंतु इन्हीं  फिक्शन और कहानियों के चलते वह विश्व पर राज कर रहा है. ध्यान से देखें तो हमारे दिमाग में हमारे आसपास 99% फिक्शन ही है. धर्म, सत्ता, कानून, रुपया, मानवाधिकार, सभी  इसी के अंग है. वे  उन चीजों के अस्तित्व को नकारते हैं जिनका कोई बायोलॉजिकल वजूद नहीं है.  
                   यह  दर्शन की एक बिल्कुल नई परिपाटी है. इन्होंने दर्शन के एक नई स्कूल का द्वार खोला है. विपश्यना योग और ध्यान की  एक प्राचीन पद्धति है जिसे  सिद्धार्थ ने ढाई हजार  वर्ष पूर्व बोधगया में  बोधि वृक्ष के नीचे पुनर्जीवित कर बुद्धत्व को प्राप्त किया था. उसके ढाई हजार साल बाद सत्यनारायण गोयनका जी  ने इसे पुनर्जीवित कर संपूर्ण विश्व में प्रसारित  किया ध्यान-पद्धति हरारी  तक पहुंची और " सेपियंस ", "होमो-डुएस" और "21 लेसन फ्रॉम 21स्ट सेंचुरी "  जैसी रचनायें  सामने आई.

शुक्रवार, 2 नवंबर 2018

पटना कॉलेज डायरी


(23 अक्टूबर 2018) 
कमलेश वर्मा हिंदी के ऐसोसिएट प्रोफेसर हैं सेवापुरी उत्तर प्रदेश में, हिंदी के प्रखर सेवक कहना ज्यादा उपयुक्त होगा. सन् 1989 से उनसे मेरा परिचय है, जब हम दोनों ने पटना कॉलेज के इंटर में दाखिला लिया था.
ऐसा कम ही होता है कि इंटर (आज का प्लस टू) में कोई मानविकी (Humanities) विषय लेकर पढ़ाई करें .
मैं अपने परिवार में पिछली तीन-चार पिढ़ियों में पहला व्यक्ति था जिसने इंटर से ही मानविकीय विषय की पढ़ाई की.




कमलेश जी जैक्सन छात्रावास में गये मैं मिंटो में,  पटना कॉलेज की दाखिले की सूची में कमलेश जी का नाम शीर्ष पर था. कई छात्रों के साथ मैं भी आश्चर्य में था की 728 (कुल 900 में) नंबर लाकर इस लड़के ने साइंस कॉलेज में दाखिला क्यों नहीं लिया.
यही जिज्ञासा प्रारंभिक जुड़ाव का कारण बनी. उन दिनों मैट्रिक में 700 अंको का बैरियर तोड़ पाना एक चुनौती थी.
700 अर्थात 78% आजकल सी.बी.एस.ई की परीक्षा में 94% से कम नंबर आते मैंने किसी को नहीं सुना .मिंटो हॉस्टल में आकर पहली बार मुझे जाति-व्यवस्था के पद सोपान की जानकारी हुई. इससे पहले मैं जमशेदपुर में था, वहाँ मरे स्कूल में जाति का मतलब उड़ीया,तामिल,मद्रासी,बँगली,गुजराती,सरदार(पँजाबी),क्रिश्चन,इत्यादि था जहाँ मेरी जाति का मतलब बिहारी था. 
                                छात्रावास में बिहार के विभिन्न जिलों से छात्र आये थे जो ग्रामीण पृष्ठभूमि के थे. यहीं मुझे ज्ञात हुआ कि जाति-व्यवस्था की संरचना में मैं कहाँ हूँ.
पर, कुछ अच्छी बातें भी हुई, सुभाष झा और अभय जैस अन्तेवासियों न मेरा परिचय मिथिला संस्कृति से कराया. सुभाष ने पहली बार मुझे एक मैथिलि गीत सुनाया
         "घर में बैठल हत सजनिया डिबिया बार-बार के,
         सीता बाट तकै छत पि के डिबिया बार-बार के,"
मैं इसे बार-बार सुनने की जिद करता पर, हर बार मुझे कोई नया मैथिलि गीत सुना जाता.
          कमलेश जी की दो चीजों का कायल मैं आज भी हूँ, पहली हस्तलिपि और दूसरी पुस्तकों को सहेज कर रखने की कला. उनकी सभी पुस्तकों पर सलीके से भूरे रंग की जिल्द लगी होती; उस पर सुंदर हैंडराइटिंग में पुस्तक लेखक और कमलेश वर्मा का नाम काले स्केच पेन से लिखा होता. अक्षर ऐसा मानो मोती रख दिए गए हो. जगन्नाथ गुप्ता भी पुस्तकों पर बड़ी अच्छी जिल्द लगाते थे "टाइम्स ऑफ इंडिया" का रविवारीय अंक के चिकने पन्ने पढ़ने से ज्यादा जिल्द लगाने के काम आता था.
उनके जिल्द लगाने के तरीके में अखबार का कोई भी हिस्सा व्यर्थ नहीं जाता था. 
         इंटर की परीक्षा के बाद पटना कॉलेज से दिल्ली की ओर जबरदस्त पलायन हुआ जिसमें सदन झा, विभांशु शेखर, आनंद गुप्ता, इमामुद्दीन अहमद ,अभय, आलोक शुक्ला, अलोक झा, अतुल, सुजीत चौधरी और कई सहपाठी  जिनका नाम  अब मुझे याद नहीं है बह गए. बच गया मैं, कमलेश वर्मा, प्रवीण, रंजन धिमल, अमर, जगन्नाथ गुप्ता, उमेश, ब्रजेश, सौमित्र , सुजीत घोष, प्रमेंद्र, अनुराधा,अश्विनी,नितेश और कई जिनका नाम अब स्मरण में नहीं है. 
     इनमें से कुछ मित्रों ने मिलकर "जिज्ञासा" का गठन किया "अ क्यूजिंग एंड डिबेटिंग सोसायटी" जिसका सदस्य मैं भी था. राजनीति विज्ञान विभाग का बड़ा हॉल हमारा अड्डा हुआ करता था. यहाँ सप्ताह में दो बैठकें होती जिसने हम सबों को धार दी. वही अरुण कमल वाली धार.
 "सब तो लिया उधार,
 सारा लोहा उन लोगों का
 अपनी केवल धार" 
बची-खुची शान कॉलेज के विद्वान शिक्षक इम्तियाज अहमद सर, आर० एन० नंदी सर, भारती संतोष कुमार मैडम, ओम प्रकाश सर, प्रशांत दत्ता सर ने चढ़ा दिया. 
     चूंकि बैठकें राजनीति विज्ञान विभाग के क्लास रूम में होती थी इसलिए राही सर को जिज्ञासा का संरक्षक बनाया गया था. 
                      मैंने इतिहास में और कमलेश जी ने हिंदी साहित्य में स्नातक की परीक्षा 'सम्मान' के साथ पास कर प्रतिष्ठा प्राप्त की. अन्य मित्रों ने भी अपने-अपने विषय में 'सम्मान' के साथ प्रतिष्ठा प्राप्त किया .कमलेश जी हिंदी की साधना में लग गए वे जे० एन0 यू ० चले गए और मैं नौकरी के तलाश की साधना में लग गया. कुछ मित्रों-सहपाठियों ने नौकरी की प्रतियोगिता परीक्षा देने के लिए संपूर्ण भारत की यात्रा की जिसे हम परीक्षाटन कहते थे .
                                                         कमलेश जी के साथ सौमित्र ,सुजीत और विभांशु शेखर जैसे कुछ सहपाठी भी जे० एन० यू० चले गए, इनसे मेरा पत्राचार होता रहता था .कुछ पत्र आज भी सुरक्षित है उस समय मुझे अहसास नहीं था कि, पत्र-युग  का होने वाला है. यह बीसवीं शताब्दी के अंतिम दशक के उत्तरार्ध का काल था. हम 21वीं सदी के मुहाने पर खड़े थे. पत्र-युग के अंत की दस्तक सुनाई देने लगी थी. लोगों का पत्र लिखना घट गया था. मुझे एक ऐसा पत्र भी मिला जिसमें एक ही पन्ने के आगे और पीछे दो अलग-अलग मित्रों ने पत्र लिखा था एक ओर सौमित्र ने दूसरी ओर सुजीत ने. 21वीं सदी के साथ मोबाइल का जमाना आया और पत्र लिखना लोग भूलते गए. हम कह सकते हैं कि मोबाइल ने पत्र की हत्या कर दी.
                       मेरी जानकारी में कमलेश जी ने हिंदी के लेक्चरर के अलावा किसी नौकरी के लिए कोई परीक्षा नहीं दी. जिस लक्ष्य को लेकर चले थे उसे हासिल कर लिया. जे० एन० यू० से लौटे सुचिता जी के साथ, पर बनारस में ही रह गये. नौकरी ने उन्हें रोक लिया.


"जाति के प्रश्न पर कबीर" पुस्तक के साथ हिंदी आलोचना जगत के शीर्षस्थ आलोचकों में उनका नाम गिना जाने लगा. यह पुस्तक कबीर के संबंध में इस विषय पर तमाम स्थापनाओं को चुनौती देता हुआ सामने आया और तर्क की कसौटी पर खरा है. धर्मी-विधर्मी सभी इसे पढ़कर हाँफ रहे हैं.कुछ बाई में अल-बल बोल रहे है, पर अब तक किसी ने ऐसा तर्क प्रस्तुत नहीं किया है जिसके आधार पर इस पुस्तक मे प्रतिपादित स्थापनाओं को काटा जा सके. हिंदी साहित्य से ज्यादा महत्वपूर्ण यह पुस्तक समाजशास्त्र के अध्येता के लिए है. कमलेश जी अपनी तमाम गुरुजनों के प्रति श्रद्धा भाव रखते हुए गुरु-ऋण स्वीकारने वाले, अपवाद छात्रों में से है. परंतु साहस इतना की नैतिक भय के बावजूद गुरु द्वारा प्रतिपादित सिद्धांत की आलोचना करते हैं और नैतिक भय को स्वीकारते भी हैं . पर गुरु तो गुरु शिष्य की उपलब्धि पर आशीर्वाद ही देते हैं. हिंदी साहित्य को कमलेश जी और सुचिता जी का दूसरा अवदान "प्रसाद काव्य कोश " है

जो उनके 10  बर्षों के श्रम का प्रतिफल है. यह पुस्तक विश्वविद्यालय और अध्यापकों के लिए एक अनिवार्य संदर्भ ग्रंथ बन चुका है. यही कारण है कि प्रकाशन के 10 महीना के अंदर ही इसकी सभी प्रतियां बिक चुकी है. हिंदी साहित्य में ऐसा कम ही सुनने को को मिलता है.
               हिंदी आलोचना के दो ध्रुवों पर बैठे गुरु पर समभाव से संतुलित पुस्तक और पत्रिका निकालना कमलेश वर्मा और सुचिता वर्मा जैसे शिष्य से ही संभव है.
मैनेजर पांडे पर पुस्तक "आलोचना का शुक्ल पक्ष"  और वीर भारत तलवार पर केंद्रित  "सत्राची" पत्रिका के विशेषांक  का संपादन; इससे बेहतर गुरु को सम्मान देने का तरीका और क्या हो सकता है.
परसों अचानक उनका फोन आया की वे पटना आए हुए और रंजन धिमल के साथ कल आ गए. यह मुलाकात लगभग 20 वर्ष बाद हुई थी पर जीवंतता वही जैक्शन-मिंटो वाली. हम तीनो नें पुराने दिनों को याद किया. हम तीनों ने कुछ सामाजिक वर्जना को तोड़ा था जो कहीं ना कहीं रूढ़ियों के प्रति विद्रोह की अभिव्यक्ति थी कालांतर में सभी ने इसे सहर्ष स्वीकार किया.
समकालीन हिंदी साहित्य के प्रमुख हस्ताक्षर अरुण नारायण भी थोड़ी देर में आ गए, फिर कुछ साहित्य चर्चा हुई. कमलेश जी ने शाम का कार्यक्रम तय किया. बोझिल मनसे कमलेश जी को विदा कहा.

कल शाम वे गुरुवर श्री नंदकिशोर नवल जी, साहित्यकार प्रेम कुमार मणि जी एवं अन्य कुछ लोगों से मिलकर आज पटना से बनारस के लिए प्रस्थान कर गए .उनका संदेश आया "वापसी की यात्रा शुरू हो गयी" 
                                      कॉलेज के दिनों को याद करता हूँ तो पाता हूँ कि कमलेश जी पटना से दिल्ली गए दिल्ली से फिर पटना नहीं  बनारस में ही ठहर गए. सदन झा दरभंगा से पटना पटना से दिल्ली, दिल्ली से सूरत चले गए, सुजीत घोष पटना से दिल्ली, दिल्ली से विभिन्न देशों में समय व्यतीत कर रहे हैं. सौमित्र मोहन पटना से दिल्ली के दिल्ली से पश्चिम बंगाल चले गए, विभांशु शेखर नवादा से पटना, पटना से दिल्ली, दिल्ली से अमेरिका चले गये रोजगार की तलाश में माइग्रेशन एक अनिवार्य शर्त है . आलोक शुक्ला जैसे कुछ ही लोग दिल्ली से लौट कर वापस अपने घर आये.एक दिन  मैं सोच रहा था की आज मैं जिस घर में रह रहा हूं वह मेरे जीवन का 20वां घर है. पिताजी की नौकरी और अपनी नौकरी के कारण लगातार माइग्रेशन जारी है . यहाँ माइग्रेशन पर हाल ही में प्रकाशित सदन झा के आलेख "From calcutta comes my husband, From Darbhanga he comes....का जिक्र करना अप्रसांगिक न होगा.

सोमवार, 29 अक्टूबर 2018

पूर्णिया डायरी-11 (मिसेज डुकारेल का सच/ Truth of Mrs ducarel)

इस पोस्ट को पढ़कर पूर्णिया वासियों को थोड़ी हताशा हो सकती है. पर इसे एक ना एक दिन आना ही था, बहुत दिनों तक मैं इसे जब्ब कर नहीं रख सकता. इतिहास पर किसी का बस नहीं है, इसमें कल्पना की जरा भी गुंजाईश नहीं होती. न जाने किस परिस्थिति में अबू तालिब ने 336 पन्नों के यात्रा वृतांत में एक पंक्ति लिखी की वह मिसेज डूकारेल(Mrs Ducarel ) से मिला, जिसे गेर्राड गुस्टावस डुकारेल(Gerard Gustavus Ducarel) ने पति की चिता (सती होने जा रही स्त्री ) से उतारकर विवाह किया था .
                                                इस पंक्ति ने 204 साल बाद पूर्णिया में तूफान ला दिया समाचार पत्रों ने बिना तथ्यों की पड़ताल किए धड़ा-धड़ इसे एक अद्भुत प्रेम कहानी बता, चटकारे लेने लगे. 18वीं सदी के पूर्णिया  पर शोध के क्रम में  अन्य समकालीन साक्ष्यों की गहरी पड़ताल से यह ज्ञात हुआ कि गेर्राड गुस्टावस डुकारेल(Gerard Gustavus Ducarel)ने जिस महिला से विवाह किया था वह मुसलमान थी.
                                  डुकारेल के बाद की पीढ़ी के लोगों ने जो वंशावली दी है उसमें गेर्राड गुस्टावस डुकारेल(Gerard Gustavus Ducarel)की पत्नी को पूर्णिया के महाराजा की बेटी बताया गया है. वंशावली के विभिन्न मानक वेबसाइटों में उसके निम्नांकित नाम दिए हैं
 कहीं जेबुन्निसा
 https://gw.geneanet.org पर जरफान्निशा खानम 

कहीं  सर्फुलनिशा खानम दर्ज  है.
                      इनका जन्म 1758 ईस्वी में और मृत्यु 1822 में इंग्लैंड में बताया गया है. इंग्लैंड जाने के बाद उन्होंने ईसाई धर्म को अंगीकार कर बपतिस्मा (Baptism) लिया था . अलग-अलग वंशावली वेबसाइट पर गेर्राड गुस्टावस डुकारेल(Gerard Gustavus Ducarel)के परवर्ती पीढ़ी के अलग-अलग लोगों ने सूचनाएं दी है, इनमें एक समरूपता है कि सभी ने मिसेज डूकारेल(Mrs Ducarel )को मुसलमान बताया है .
                इस संदर्भ में दूसरे  महत्वपूर्ण अभिलेखीय साक्ष्यों, का जिक्र करना भी जरूरी है, जिसके अध्ययन से यह कहने की गुंजाइश नहीं रह जाएगी कि गेर्राड गुस्टावस डुकारेल(Gerard Gustavus Ducarel)ने किसी हिंदू विधवा (जिसे सती होने के लिए पति कि चिता पर बैठाया जा रहा था ) से विवाह किया था. ये अभिलेख है इंग्लैंड की राष्ट्रीय अभिलेखागार में रक्षित  डुकारेल पेपर(Ducarel paper), जिसे डुकारेल परिवार के परवर्ती वंशज पी0जे0 पामर (P.J.Palmer)ने जमा किया था इसमें वर्ष 1784 से 1796 तक  गेर्राड गुस्टावस डुकारेल(Gerard Gustavus Ducarel)के वे पत्र शामिल है जो भारत से उनके मित्र,एटार्नी और ईस्ट इंडिया कंपनी के सेवकों ने व्यक्तिगत संबंध के कारण भेजा था. इसमें कुछ पत्रों का उल्लेख यहां करना मैं आवश्यक समझता हूँ. 
12 फरवरी 1788 को जेम्स कॉली (James Collie) जो वर्द्धमान में सर्जन थे, ने गेर्राड गुस्टावस डुकारेल(Gerard Gustavus Ducarel)को लिखे पत्र में मिसेज डूकारेल(Mrs Ducarel )भाई मिर्जा आलम बेग(Mirza Allam Beg)का जिक्र किया है, जिन्हें भत्ता (allowance ) मिलने में कुछ कठिनाई का सामना करना पड़ रहा था . 
27 फरवरी 1788 को थॉमस शॉट(Thomas Short जो कभी डुकारेल के सहायक हुआ करते थे) ने कोलकाता से  गेर्राड गुस्टावस डुकारेल(Gerard Gustavus Ducarel)को भेजे गए एक पत्र में मिसेज डूकारेल(Mrs Ducarel )के भाई मिर्जा आलम बेग को ॠण के कारण हो रही कठिनाइयों का जिक्र किया है.
 15 अक्टूबर 1788 को थामस शाट(Thomas Short ) ने मिर्जा बेग की नियुक्ति में मदद करने में असमर्थता व्यक्त की.
माह जनवरी एवं 26 फरवरी 1789 जेम्स कॉलिंग(James Collie) जो वर्द्धमान में सर्जन थे ने गेर्राड गुस्टावस डुकारेल(Gerard Gustavus Ducarel)को भेजे पत्र में मिसेज डूकारेल(Mrs Ducarel )के परिवार मिर्जा फैमिली को एक लॉ सूट दाखिल होने से हो रही कठिनाइयों का जिक्र किया है 
2 नवंबर 1789 जेम्स कॉलिंग(James Collie)ने बर्द्धमान से मिसेज डूकारेल(Mrs Ducarel )के भाई मिर्जा आलम बेग के बीमारी की सूचना दी है. 
      इन पत्रों में मिसेज डूकारेल(Mrs Ducarel )के भाई का बार-बार जिक्र है.मिसेज डूकारेल(Mrs Ducarel )का मिर्जा फैमिली से होना यह प्रमाणित करता है कि वह एक भारतीय मुसलमान थी जो बाद में ईसाइ धर्म को अंगिकार कर एलिजाबेथ हो गई थी. 
                संभव है अबू तालिब ने  किसी सुनी-सुनाई बात पर यात्रा वृतांत में  यह टिप्पणी दर्ज कर दी हो. या फिर फारसी में लिखे गए यात्रा वृतांत के अनुवादक ने औपनिवेशिक सर्वोच्चता के लिये एक अंग्रेज अफसर का महिमामंडन कर दिया हो.
जो भी हो इन तथ्यों से न तो डुकारेल की प्रेम कहानी के ओज पर कोई प्रभाव पड़ता है ना ही उसके जेंटलमैन वाले व्यक्तित्व पर.

रविवार, 7 अक्टूबर 2018

वाणावर डायरी-6 (बाबा सिद्धनाथ प्राचीन मंदिर/ancient temple of vanavar )

प्राचीन वाणावर सिद्धनाथ मान्दिर में  सातवीं शताब्दी से भक्तों की निरंतरता बनी हुई है.
यह भारत के उन दुर्लभ मन्दिरों मे से एक है जहाँ हजार वर्षों से जागृत पूजा-पाठ हो रहा है. इसके दीवार की चौड़ाई 4 फुट से अधिक है.
छत पत्थर के स्तंभ पर टिका का है जो  पत्थर के चौड़े सलेब्स से बना है यह नागर शैली के स्थापत्य कला की विशेषता है.


पर्वत के शिखर पर शिवलिंग है जो गर्भगृह के अंदर है. गर्भगृह के बाहरी दरवाजे पर दाएं-बाएं गणेश की मुर्ति है. मंडप के पश्चमी भाग में दो बड़ी मूर्तियां हैं जो मां पार्वती के रूप में जानी जाती है. इसी प्राचीन मन्दिर को बिना छेड़-छाड़ किये "बाबा सिद्धनाथ मंदिर सेवा समिति" ने इसका जिर्णोद्धार किया.
(तस्वीर: सौजन्य श्री रविशंकर एवं श्री सत्यप्रकाश )

शनिवार, 6 अक्टूबर 2018

इस्लामपुर डायरी 3(Islampur Dayri-3)

जमींदारी तो अँग्रेजों के पहले भी थी. यह कोई नहीं जानता की अंग्रेजों ने स्थाई बंदोबस्त में पुराने जमींदार को ही बरकरार रखा या "सनसेट लॉ" के तहत जमींदार की नई पौध को इस्लामपुर गढ पर रोप दिया, जो उसके प्रति और ज्यादा वफादार था.
 जमींदार साहब ने यह सोच कर अपने इतिहास को लिपिबद्ध  करने का प्रयास नहीं किया कि उनकी हस्ती को कौन मिटा सकता है. लोगों की जुबान पर उनका और उनके परिवार का इतिहास है भला, इसको लिखने की क्या जरूरत. लोग बताते हैं कि चौधरी साहब के परदादा राजा मानसिंह के समय सूबा-ऐ-बिहार के मानिंदे मनसबदार  थे 500 जात औ सवार सैनिकों की मनसबदारी थी. गढ़ के गढ़वाल भी यही सोचते होंगे, पर उस अस्सी बीघे के गढ़ के नीचे कितने महल,कितने नाचघर, कितने खजाने. हाथी घोड़े और समय का सैलाब दवा है .
अकबर रहा ना रहा सिकंदर बादशाह ;
तख्ते जमीन पर सब आए आके चले गए.
  यह हवेली और कचहरी बनने से यहां बाजार बसने लगा. सुबा-ऐ-बिहार की सत्ता का एक प्रशासनिक इकाई बना.
गुमाश्ता, पहलवान, मुंशी, कानूनगो ,अमला-फैला भरा कचहरी, लाल बस्ता, ठेकेदार, मुकर्रीदार,दर-मुकर्रीदार, पत्नीदार, दर-पत्नीदार.रैयतों का आना-जाना और उनका नजराना, एक नया नजरान-घर बना था जहां रोज इसे लेने और रखने के लिए आमला बहाल थे. रैयतों से आम, बेल, जामुन, कटहल, सब्जी की पहली फसल और तालाब की सबसे बड़ी मछली नजर की जाती.
जमींदारी का स्वर्ण युग आने वाला था .वह रैयतों पर मनमानी लगान लगाता और माफ करता.  हवेली बनानी होती तो हवेलीयाना, मोटर खरीदनी होती तो मोटराना जैसे शेष लगाए जाते हैं छः महीने में हवेली खड़ी हो जाती. तब किसी ने कल्पना भी न किया होगा कि जमींदारी व्यवस्था का अंत हो जाएगा.
(इसमें वर्णित पात्र व घटनाये काल्पनिक हैं )

मंगलवार, 2 अक्टूबर 2018

वाणावर डायरी-7 (बाबा सिद्धनाथ मंदिर का जीर्णोद्धार /renovation of vanavar tample)

प्राचीन वाणावर सिद्धनाथ मंदिर का केवल गर्भ गृह और मंडप सुरक्षित है.
इस मंदिर की महंथी समीप के गाँव लोहगढ़ के एक परिवार (विश्वनाथ भारती) को बोधगया मठ से बीसवीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में मिली थी. उसी परिवार के श्री बम सिंह अभी वहां के महंथ है. भगवान पर चढ़ावे की राशि के साथ-साथ विभिन्न संस्कार एवं पूजा के लिए निर्धारित शुल्क के रूप मे जो राशि संग्रहित होती है वह महंत जी के पास जाता है. परंतु इनके द्वारा मंदिर के विकास और जीर्णोद्धार कार्य में कोई दिलचस्पी नहीं ली जाती,


यह बात शिव भक्तों को अखड़ती. तेल्हाड़ा एकंगरसराय और मसौढी के कुछ युवा उत्साही लोगों ने मिलकर "मंदिर जीर्णोद्धार एवं विकास समिति" का गठन किया. इसमें श्री सत्य प्रकाश (एकंगरसराय) श्री फौजदार साव, स्व० सिद्धेश्वर प्रसाद (तेल्हाड़ा), श्री रविशंकर (मसौढी) का नाम उल्लेखनी है, इन लोगों ने कई शिवभक्तों को एकत्रित कर इस समिति के तहत मंदिर के समीप एक दान शिविर स्थापित किया.
लोगों से प्राप्त दान से वर्ष 2002 में मंदिर के जीर्णोद्धार का का काम प्रारंभ हुआ जो सात-आठ वर्षों तक चला.
प्राचीन मंदिर के स्वरूप को बिना कोई छेड़छाड़ किए इसके चारे और बरामदे एवं गुंबद का निर्माण किया गया है. इस समिति ने इसके अलावा कई कार्य किए है जलापूर्ति व्यवस्था,यात्री-शेड,आर०ओ०पेयजल एवं धर्मशाला प्रमुख हैं.

रविवार, 30 सितंबर 2018

मैनामठ डायरी(Kalisthan of Mainamath)

जहानाबाद जिला मुख्यालय से 18 किलोमीटर पूरब मैनामठ गांव स्थित है. राजस्व अभिलेख में मैनामठ गांव का नाम नहीं मिलता है, बल्कि महमदपुर अब्दाल दर्ज है .एक परंपरा के अनुसार यहां प्राचीन काल एवं पूर्व मध्यकाल तक बौद्ध मठ था जिसकी स्थापना मैना नामक बौद्ध भिक्षुणी ने की थी. बख्तियार खिलजी के आक्रमण के बाद बौद्ध भिक्षुओं का पलायन यहां से हो गया. मध्यकाल में इसका नाम शासकों ने महमदपुर अब्दाल रखा जो ब्रिटिश काल तक चला राजस्व अभिलेख में भी महम्मदपुर अब्दाल ही दर्ज हुआ,
लेकिन लोगों की जुबान पर मैनामठ ही चढ़ा रहा. इस गांव के उत्तर  3/4 किलोमीटर की दूरी पर लगभग 10 एकड़ का एक प्राचीन तालाब था. जिसके दक्षिण-पश्चिम छोर पर श्मशान था. यह तालाब अब एक एकड़ में ही बच गया है शेष भाग पर सड़क और सरकारी योजनाओं का भवन निर्माण हो गया है. स्थानीय लोगों से प्राप्त जानकारी के अनुसार 100 साल पहले इस तालाब की सफाई के दौरान कुछ प्राचीन मूर्तियां मिली जिसे एक चबूतरे पर स्थापित कर दिया गया इसके बाद यह जगह काली-स्थान के नाम से जाना जाने लगा.इनमें सबसे महत्वपूर्ण मूर्ति  मां काली की है .
यह कला के दृष्टिकोण से पाल काल में प्रचलित माँ कंकाली काली की मूर्ति है .बड़ा तालाब, तालाब के किनार शमशान एवं कंकाली-काली की मूर्ति इस बात को मानने का पर्याप्त कारण है कि प्राचीन काल में यह तंत्र साधना और पूजा का एक केंद्र था. माँ काली के अतिरिक्त




गणेश ,शिव, विष्णु ,की मूर्ति प्राप्त हुई है सभी ब्लैक बैसाल्ट पत्थर की बनी पाल कालीन मूर्ति कला का नायाब नमूना है. मां काली की मूर्ति तस्करों की नजर में है इसकी दो बार चोरी हुई पर दोनों बार मूर्ति मिल गई. इस पोस्ट के पहले काली-स्थान मैनामठ और यहां की मूर्तियों का कोई डॉक्यूमेंटेशन नहीं हुआ है, न ही पूर्व में किसी शोधकर्ता ने इसके पुरातात्विक महत्व पर प्रकाश डालने की कोशिश की है इन मूर्तियों का विस्तृत अध्ययन पाल  कालीन मूर्तिकला के कई नए आयामों को उद्घाटित कर सकता है.

शनिवार, 29 सितंबर 2018

सिकलीगढ़ डायरी(Sikligarh / grave of Augustus Gwatkin Williams)

 सिकलीगढ पूर्णिया से 12-13 किलोमीटर की दूरी पर बनमनखी प्रखंड में स्थित है . वर्ष 2004 से 2006 तक मैंने इस टीले का सर्वेक्षण कर शोध कार्य किया था.
शोधोपरांत प्रकाशित आलेख के आधार पर इसके ऐतिहासिक और पुरातात्विक महत्व को देखते हुए, खुदाई का प्रस्ताव वर्ष 2011 में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण को भेजा गया था,पर स्वीकृति नहीं मिली. सिकलीगढ का औदात्य मुझे बार-बार अपनी ओर खींचता , जब भी अवसर मिलता मैं वहां निकल पड़ता .
     पूर्णिया की यह विडंबना है कि न तो कनिंघम ने, और न ही उसके बाद किसी अन्य पुरातत्ववेत्ता या संस्थान ने इस क्षेत्र का पुरातात्विक सर्वेक्षण किया. इस शोध के बाद मैं इस निष्कर्ष पर पहुंचा की हिमालय के दक्षिण गंगा के उत्तर कोसी के पूरब और महानंदा के पश्चिम क्षेत्र मिलाकर जो चतुर्भुज बनता है उसका पुरातात्विक सर्वेक्षण नहीं हुआ है जिससे इस क्षेत्र की पुरातात्विक और ऐतिहासिक महत्व को दुनिया के सामने नहीं लाया जा सका है. एक कारण  सतत बाढ़ भी है, जो पुरातात्विक सामग्रियों को बाहर कर ले जाते रही है. इस क्षेत्र में प्राप्त पुरातात्विक सामग्रियों में सबसे महत्वपूर्ण पतराहा (धमदाहा अनुमंडल) से वर्ष 1913 में प्राप्त पंच-मार्क सिक्कों का भंडार है.
पंच-मार्क सिक्के छठी शताब्दी ईसा पूर्व प्रचलन में थे. भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने इन पंच-मार्क सिक्कों के भंडार पर मेमाॉयर सीरीज में एक पुस्तक का प्रकाशन किया है .
      बौद्ध ग्रंथों में वर्णित आंगुत्तराप की अवस्थिति पर से अब तक रहस्य का पर्दा नहीं उठा सका है .इसे अंग के उत्तर स्थित इस असर्वेक्षित चतुर्भुज में ढूंढने की जरूरत है. 
     सिकलीगढ़ टीले के समीप कभी विलियम्स के नील की फैक्ट्री हुआ करती थी. बड़े-बड़े हौज जिस पर निलहे मजदूर दिन-रात काम करते बहरहाल न फैक्ट्री रही, न निलहे मजदूर, न ही निलहा साहब विलियम्स रहा . हाँ रह गई तो टीले के एक हिस्से पर Augustus Gwatkin Williams की कब्र
. जिनकी मृत्यु 55 वर्ष की आयु में 4 अप्रैल 1927 को हुई थी.
उसके ऊपर संगमरमर एक सुंदर स्मृति-लेख (Epitaph) लगा है,जो उन दिनों कलकात्ता से बनकर आता था.

मंगलवार, 25 सितंबर 2018

साहेबगंज डायरी(District Gazetteer)

बात 2001 की है मैं साहबगंज जिले(झारखण्ड) मे पहली बार गया था .यहाँ मैने दो वर्ष बिताये . किसी ने मुझे बताया था कि नयी जगह को जानने का सबसे अच्छा साधन वहाँ का जिला गजेटियर होता है, उसे एक बार जरूर पढ लेना चाहिये. साहबगंज पहुँचते ही मै इसकी तलाश में लग गया.शहर की सभी लाईब्रेरियाँ छान मारी पर नहीं मिली कुछ लाईब्रेरियन इसका नाम पहली बार सुन रहे थे. कहीं से मुझे जानकारी मिली की अमुक वकील साहब के यहाँ संथाल परगना का जिला गजेटियर है. वे शहर के नामी वकील थे . एक दिन शाम में उनका घर खोजता हुआ पहुँच गया. वकील साहब बड़े गर्मजोशी से मिले चाय पिलायी, पर गजेटियर नही दिया ; देने का आश्वासन जरूर दिया. बताया कि कलक्टर साहब के पास है. उनके घर और कचहरी के कई चक्कर मैने लगाये पर जिला गजेटियर का दर्शन न हो सका. बाद में पता चला कि वकील साहब केवल कलक्टर, एस०पी०, और जिला जज को जिला गजेटियर पढने के लिए देते है, ये उनसे नजदीकी बढाने का उनका का औजार है .
   तब मैं इसकी तलाश पटना मे करने लगा. काफी मशक़्क़त के बाद यह मुझे मिली . मैने इसे वकील साहब को दिखाया तो वे हतप्रभ रह गये; मानो जिला गजेटियर पर से उनका एकाधिकार समाप्त हो गया हो. उन्होंने मुझे नसीहत दी कि यह बड़ी दुर्लभ पुस्तक है , हर किसी एैरे-गैरे को न दूँ ,पत्रकार को तो बिल्कुल ही नहीं .
 इसके बाद मैं कई जिलों मे रहा राँची, पूर्णिया, कटिहार,सिवान,औरंगाबाद,नवादा,जहानाबाद,नालंदा, प्रायः सभी जिलों मे जिला गजेटियर दुर्लभ पुस्तक रही है.
        परन्तु राजस्व एवं भूमि सुधार विभाग के प्रयास से अब यह दुर्लभ नहीं रही. विभाग ने इसे अपने वेबसाइट पर डालकर सबके लिये सुलभ कर दिया है.इसका लिंक है.http://lrc.bih.nic.in/Gazetteer/Gazetteer.aspx
                             19वीं शताब्दी की शुरूआत मे बंगाल के जिलों का  गजेटियर तैयार करने का दायित्व L S S O'malley को दिया गया था . आजादी के बाद  बिहार सरकार ने इसका संशोधित संस्करण निकला जिसका संपादन पी०सी०रायचौधरी ने किया था. यही संस्करण बेबसाईट पर उपलब्ध है. इसमें  बिहार के पुराने 11 जिले  भागलपुर,चंपारण, दरभंगा,गया,मुँगेर,मुजफ्फरपुर,पटना,पूर्णिया, शाहाबाद, सहरसा शामिल हैं.

सोमवार, 24 सितंबर 2018

पूर्णिया डायरी-10 (डुकारेल और डा० लक्ष्मीकांत सिंह/Ducarel and Dr Laxmikant Singh)

डुकारेल की कहानी ने नालंदा के डा०लक्ष्मीकांत को इतना प्रभावित किया कि "यह पत्र माँ को एक साल बाद मिलेगा" जैसी दो पन्ने की छोटी कहानी पढकर एक शोधपरक ऐतिहासिक पृष्ठभूमि का उपन्यास लिखने का निर्णय ले लिया. गत दो वर्षों से इसपर काम कर रहे हैं. डा० लक्ष्मीकांत मूलतः सारण जिले के हैं. पूर्णिया कभी नहीं गये पर पूर्णिया को केन्द्र में रखकर ऐतिहासिक पात्रों की मदद से एक ऐसी रचना कर रहे हैं जिसमें 18वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध का पूर्णिया जीवंत हो उठेगा.यहाँ हम इनकी तुलना  मैक्स मूलर से कर सकते हैं, जो कभी भारत नही आये थे पर विश्व के शिर्षस्थ भरतवीद् थे.
डा० लक्ष्मीकांत अलामा इकबाल कॉलेज नालंदा में पाली भाषा एवं साहित्य विभाग के विभागाध्यक्ष है. जिले पर संदर्भ ग्रंथ तैयार करने के सिलसिले में वर्ष 2016 में उनसे मिला था. यह संदर्भ ग्रंथ तो नही तैयार हो सका पर एक ऐतिहासिक उपन्यास के सृजन की पृष्ठभूमि जरूर तैयार हो गई.
ये विभिन्न विषयों पर कई पुस्तकों की रचना कर चुके हैं. कुछ पुस्तकें हैं-
  शाबाश डैडी (बाल समस्या एवं निदान);
 भारतीय वनऔषधि धरोहर(आयुर्वेद);
पाली व्याकरण एवं रचना; 
अशोक के धर्म शिलालेख(प्राचीन भारत) .
                     उपन्यास के ताने-बाने और कथानक पर अक्सर उनसे बातचीत होती है. उनके अप्रकाशित उपन्यास का एक रोचक अंश 
        "अब डुकारेल चार कदम का फासला तय कर चारपाई के सिरहाने पूरब में खड़ा हो, लड़की के चेहरे को एकटक देखते रहे . वह शांत बेसुध पड़ी थी . गोलाकार मरमरी चेहरा और तीखे नयन-नक्श , रुक्म-ए-फरोग सा दिख रहा था.काले घुँघराले बालों का एक लट रूखसार पर अब्र सा चिपका था. नाजनीन पँखुरियों जैसे होठ कभी-कभी स्पंदित हो रहे थे.इस हालात मे भी जैदी का आलम चेहरे पर पसरा था. डुकारेल बार-बार आँखें खोलता और बंद करता . उसे अपने आँखों पर सहसा विशवास नहीं हो रहा था.हकिकत है या कोई सपना, उसका दिमाग फर्क नहीं कर पा रहा था.उसके तसव्वुर मे . ऐंजल और मोनालिसा का नाम बसा था. लेकिन क्या कोई इतना खूबसूरत हो सकता है, यह सोचकर परेशां हो रहा था. "यकीनन हकीम साहब सौ फिसदी वाजिब बोल रहे थे."
 डुकारेल बुदबुदाया . मैने कोई गलती नहीं की, शायद यही खुदा की मर्जी थी. इस हुश्न-ए-सरापा को बचाने के लिये ही उपरवाले ने वहाँ भेजा था.उपेक्षा का भाव विलुप्त हो,अब उसके मन के किसी कोने में स्नेहासक्ति का बीज अंकुरित होने लगा.भावनाओं के अथाह सागर में डूबता उतरता डुकारेल , किसी अनजाने पाश मे जकड़ता जा रहा था. कोई मायावी ताकत अपने वश में जिल्दबंद कर रही है, वह ऐसा महसूस कर रहा था.
             तभी देखा लड़की के चेहरे और शरीर में थोड़ी कंपन शुरू हुई. ओठ स्वतः खुलने बंद होने लगे. हाथों की अँगुलियाँ हिलते-हिलते मुठ्ठी बंध गयी. फिर जोर से
 "बचा  लो बाबू" 
बोल थोड़ी गर्दन उठा निढाल हो गयी. काँपते हाथ स्वतः उठ खड़े हो गये."

शनिवार, 22 सितंबर 2018

चंडी-मौ डायरी/Chandi-Mau Dairy (जंहा तुफैल खां सूरी की पूजा मन्दिर में होती है )

यह सहज विश्वास नहीं होता कि किसी गाँव में एक ऐसे मुसलमान व्यक्ति की पूजा उसके नाम का प्रतीक पत्थर रखकर मन्दिर में की जाती हो, जो अभी जीवित हैं. परन्तु यह सत्य है. इसी की पड़ताल के लिये मै, लालबाबू सिंह और राकेश बिहारी शर्मा नालंदा के चंडी-मौ गाँव गये. गाँव के मन्दिर के दरवाजे पर अन्य कई मूर्तियों के  साथ एक पत्थर भी सूरी बाबा के नाम से पूजा जाता है. ये सूरी बाबा तुफैल खाँ सूरी हैं. जिन्होंने कभी इस गाँव में देश का पहला ग्रामीण संग्रहालय बनाने का सपना देखा था.



तुफैल खाँ सूरी से मेरी मुलाकात २०१५ मे हुई थी, जब मैं ढूँढते हुये उनके घर गया था. अनुराग सिनेमा के पास उन्होंने अपना किराये का घर बताया था. बनौलिया चौक पहुँच कर आधा घंटा अनुराग सिनेमा हाल को ढूँढता रहा पर मुझे नहीं मिला, हारकर मैंने उन्हें फोन किया . वे पाँच मिनट में आ गये . मेरी जिज्ञासा शांत नहीं हुई, मैंने पूछा कि अनुराग सिनेमा हाल किधर है ? सड़क के दाहिनी ओर इशारा कर बताया कि यहीं तो था. पर अब वह नहीं है. सिनेमा हाल ध्वस्त हो गया है और इसकी  जमीन कई खंडों में बँट, बिक चुकी है. सिनेमा हाल की जगह कई मकान खड़े हो गये है फिर भी यह मुहल्ला अनुराग सिनेमा हाल के नाम से ही जाना जाता है. सूरी साहब के बारे में मुझे पर्यटन डिप्लोमा के भूतपूर्व विद्यार्थी सुधीर जी ने बताया था. अध्ययन के दौरान सुधीर ने सुरी साहब की मदद से छोटी पहाड़ी स्थित बया खाँ के मकबरे पर एक प्रोजेक्ट रिपोर्ट तैयार किया था. इस मौलिक काम के चलते सुधीर को काफी प्रशंसा मिली.  सुधीर से सूरी साहब के इतिहास में दिलचस्पी के किस्से सुन उनको ढूढते हुये मैं उनसे मिलने चला गया.

               इतिहास की कोई औपचारिक शिक्षा नही रहने के बावजूद उन्हें बिहार शरीफ और आस-पास के ऐतिहासिक स्थलों के बारे में बड़ी अच्छी जानकारी है. इतिहास से लगाव का एक कारण शायद यह है कि वे शेरशाह सूरी के वंशज हैं. आज से करीब 20 साल पहले उन्होने एक सपना देखा था, चंडी-मौ में भारत का पहला ग्रामीण संग्रहालय बनाने का.
इस सपना को पूरा करने के लिये अपनी कुल जमा पूँजी गँवा चुके हैं. इस हेतु यहाँ एक भवन तैयार कर चुके थे. इसे तैयार करने के लिये वे बिहार शरीफ से चंडी-मौ 32 कि०मी० साईकिल से रोज जाते थे. निर्माण के लिये काम करते. कभी-कभी 12 कि०मी० दूर नालंदा से साईकिल पर सिमेंट की बोरी लादकर ले जाते. आगे कि योजना थी कि आस-पास की सभी प्राचीन मूर्तियों को इस संग्रहालय मे रखा जाये. उनके पास ये सूची थी की मूर्तियाँ किस-किस घरों में पड़ी है, प्राय: सभी लोग संग्रहालय के लिए मूर्तियाँ देने को तैयार थे. पर गाँव की सरकारी जमीन पर नजर गड़ाये भू-माफिया ने षडयंत्र कर सूरी साहब को गाँव से निकाल दिया.




संग्रहालय तो नहीं बन सका पर उस भवन मे रखी मूर्तियां मंदिर का रूप ले चुकी हैं. मंदिर के दरवाजे पर कई अन्य मूर्तियों के साथ एक पत्थर की पूजा सूरी बाबा के रूप में भी लोग करते है.

               जब तक मै बिहार शरीफ मे था तो अक्सर विधि-व्यवस्था के नाम पर बनौलिया चौक पर बैठा दिया जाता था. मैं सूरी साहब को बुला लेता और बिहार शरीफ के इतिहास को टुकड़ों मे सुनता. इतिहास प्रेम के कारण उन पर कई फतवे जारी हो चुके हैं .