रेणु ने उपन्यास का नाम "मैला आंचल" रखा और सुधि आलोचकों ने इसे आंचलिक उपन्यास घोषित कर कोसी के आँचल को ना जाने क्यों मैला कह दिया. यह उपन्यास स्वतंत्रोत्तर काल के सामाजिक आर्थिक एवं राजनीतिक जीवन को प्रतिबिंबित करता है. इसकी शुरुआत परतंत्र और स्वतंत्र भारत के संधिकाल से होता है, जब बिहार में कांग्रेस मंत्रिमंडल की सरकार बनी थी. 1942 का आंदोलन समाप्त हुआ था महात्मा गांधी सर्वजन स्वीकार्य जीवित किंवदन्ती नेता हो चुके थे. कांग्रेस के अलावा किसी अन्य राजनीतिक दल की पहुँच ग्रामीण क्षेत्र में नहीं हुई थी.
भारतवर्ष के लाखों गांव की तरफ मेरीगंज भी अपने नाम के साथ एक आख्यान जोड़े हुए था. जिसका संबंध नीलहे अंग्रेज मार्टिन और उसकी पत्नी मेरी से था. गांव जाति के अनुरूप विभिन्न टोलो में बँटा था, यथा मलिक टोली, कैथ टोली, ग्वालटोली, ततमा टोली, राजपूत टोली या सिपहिया टोली, पासवान टोला, बभन टोली इसमें यादव और ततमा अपने को क्षत्रिय होने का दावा करते थे. राजपूत और कायस्थों की परस्पर जातिगत प्रतिद्वंदिता थी वह एक दूसरे के टोलों को परस्पर सिपहिया टोली और कैथ टोली कहते हैं.
ग्राम्य जीवन के सामाजिक ताने-बाने, जटिलता एवं विषमता का जितना बारिक विश्लेषण निरपेक्ष दृष्टि से किया गया है, खासकर जाति व्यवस्था का उतना अन्यत्र दुर्लभ है. यही कारण है कि आलोचक इसे सहजता से स्वीकार न कर सके और आंचलिकता का दर्जा देते हुए दरकिनार करने की कोशिश की ग्रामीण क्षेत्र में मठ होना आम बात है सो मेरी गंज में भी एक कबीर मठ है. जिसके महंथ सेवादास दासीन लक्ष्मी और रामदास है. इस मठ के प्रसंग के कारण उपन्यास कबीरमय में हो गया है. मठ में लक्ष्मी को कम उम्र में ही लाकर दासिन बना दिया जाता है. "एक बाघ है तो दूसरा बिलार बीच में लक्ष्मी" कबीर मठ के अधःपतन का जो वर्णन किया गया वह भी कहीं ना कहीं वामपंथी आलोचकों को उस जमाने में खटका होगा, पर लेखक ने ईमानदारी से मठ व्यवस्था का रोचक वर्णन किया है. यह उपन्यास का केंद्र तो नहीं पर केंद्र के आसपास की चीज जरूर है जब सेवादास अपने कुकर्मों के कारण सामाजिक उपेक्षा का शिकार हो जाता है. उसे अपने किए की सजा मिलती है. लक्ष्मी के जवान होने से पूर्व ही अंधा हो जाता है. और ग्रामीण मठ को को हेय दृष्टि से देखने लगते हैं, तो वह एक भंडारा देने का निर्णय लेता है, ताकि इसी बहाने वह अपने आप को पुनर्स्थापित कर सके यहां फिर जाति व्यवस्था के ताने-बाने की बारीकियां उभर कर सामने आती है, ब्राह्मण कहते हैं कि वे सर्व-संगठन में नहीं खाएंगे, राजपूत कहते हैं ग्वालों के साथ बैठकर नहीं खाऐंगें वे कहते हैं कि उनका आटा घी, चीनी दे दें वह अलग बनवा लेंगे, यादव कहते हैं कि धानुक लोग के साथ बैठकर नहीं खाएंगे.
इसके बावजूद बलदेव यादव गांधी बाबा का साजी शिष्य है और उनके आदर्शों पर चलता है जब राजपूत टोला में एक दिन जाता है तो शिव शंकर सिंह के दरवाजे पर चार पांच लोग बैठे हैं कोई उसे बैठने को नहीं कहता, इसके बावजूद वह सबको 'जय हिंद' कहता है. इस पर हरगौरी सिंह उसे अपमानित करते हुए कहता है "अरे भाई सभी काशी चले, पतल चाटने के लिए भी कुछ लोग रह जाओ जेल क्या गए पंडित जमाहिरलाल वन गये कांग्रेश ऑफिस में भोलंटियरी करते थे, अब अंधों में काना बनकर यहां लीडरी छांटने आया है. स्वयंसेवक ना घोड़ा का दुम." बालदेव के इस अपमान पर पूरा यादव टोला राजपूत टोला पर आक्रमण कर देता है पर बलदेवे गांधीवाद एवं अहिंसा के सिद्धांत का पालन करते हुए बलवा को रोकते हैं और गांधी महात्मा की जय कह कर स्वजातीय बलबाइयों को लौटा देता है, हरगौरी को क्षमा कर देता है. भ्रष्टाचार समाज में अपनी जड़ें जमाने लगा है एक प्रसंग में हरगौरी जो क्लास में बार-बार फेल करता है उसका बाप उसे पास कराने के लिए मास्टर को घूस देने गया था पर मास्टर ने डांट कर भगा देता है.
उपन्यास की शुरुआत ही विकास की नई बयार की आहट देता है, जो भविष्य में बनने वाले नवोदित भारतवर्ष के लोक कल्याणकारी राज्य की पृष्ठभूमि बनाता है. डिस्टिक बोर्ड के लोग एक जमीन की तलाश में गए हैं जिसे मार्टिन के डिस्पेंसरी बनाने के लिए रजिस्ट्री कर दिया था. डिस्पेंसरी बनाने में भी मजदूरी के लिए तिकड़म पेंच होती है और ग्रामीण परिवेश के मैले हो रहे आंचल का प्रथम दर्शन करवाता है लोगों ने जिस उत्साह से एक होकर स्वतंत्रता आंदोलन में हिस्सा लिया था विकासात्मक कार्य में रुचि नहीं दिखाते और इसे डिस्ट्रिक्ट बोर्ड का काम मानते हैं. उन्हें लगता है कि लीडर मजदूरी के पैसे खा गया है और हम से मजदूरी करवाना चाहता है.
डिस्पेंसरी में एक अज्ञात कुलशील का डॉक्टर आता है उसके पहुंचने से पहले ही लोग बाग उसके जात जानने को लेकर बेचैन हो जाते हैं. यह जाति व्यवस्था की कटु सच्चाई है कि ग्रामीण समाज में बिना जात जाने उसका कोई स्थान ही नहीं निर्धारित हो पाता नाम से यदि जातीय स्पष्ट नहीं होती तो नाम के बाद जाति पूछी जाती है.
"जाति बहुत बड़ी चीज होती है जाति-पात नहीं मानने वाली की भी जाति होती है शहर में कोई किसी से जाति नहीं पूछता शहर के लोगों की जाति का क्या लेकिन गांव मैं तो बिना जाति का पानी नहीं चलेगा"
यह किसी भी गांव के सामाजिकता का यथार्थ है किसी व्यक्ति के गांव पहुंचने से पहले उसकी जाति पहुंचती है राही बटोही से भी गांव घर पहुंचने के बाद उसकी जाति पहुंच जाती है. सामाजिक हैसियत के लिए जाति सबसे महत्वपूर्ण मानदंड है राजपूतों के मुखिया राम कृपाल सिह निरक्षर है जब उन्हें एक बार अपने निरक्षर होने पर ग्लानि होती है तो वे सोचते हैं: "सचमुच विद्या की महिमा बड़ी है लेकिन भगवान ने शरीर दिया है, उच्च जाति में जन्म दिया है. इसी के बल पर बाबू- बबुआन हाकिम-हुककाम और अमला-फैला से हेल-मेल हुआ जान पहचान हुई"
ग्लानि सिर्फ इसलिए कि डिस्टिक बोर्ड के ओवरसीर किरानी के आगे तहसीलदार विश्वनाथ प्रसाद बाजी मार गए इसके बावजूद भी वह विद्या ग्रहण की बात नहीं सोचते अस्पताल होने की बात सुनकर ही ब्राह्मणों ने इसका विरोध शुरू कर दिया दिन-रात डॉक्टर अंग्रेजी दवा के खिलाफ तरह-तरह की कहानियां सुनाने लगे सामाजिक ताने-बाने में शीर्ष पर बैठे व्यक्ति हमेशा यथास्थिति बनाए रखना चाहता है ताकि उसके आसन को कोई खतरा न पहुंचे. ब्राह्मणों को लगा कि यदि बीमारियां अस्पताल से ही ठीक हो जाएगी तो उसकी पूछ घट जाएगी, लोग बीमार होंगे तो अस्पताल की और दौड़ेंगे न कि ब्राह्मण ज्योतिषी के घर.
हरगौरी-बालदेव प्रकरण के बाद यादव सेना का राजपूतों पर हमले से ग्राम्य जीवन में दलबंदी शुरू हुई अन्य जाति के लोग यथा ज्योतिखी जी इसे हवा देते हुए कहते हैं की "यादव लोग बात-बात में लाठी-भाला दिखाते हैं राजपूतों के लिए यह डूब मरने की बात है." यह उस भविष्य की आहट हैं जिसने जातीय सेनाओं को जन्म दिया सनलाइट सेना, लोरिक सेना, रणवीर सेना इत्यादि यहीं ग्राम्य जीवन का आंचल मैला हुआ यह किसी एक अंचल का यथार्थ नहीं संपूर्ण भारत के ग्रामीण परिवेश का यथार्थ है.
( डायरी के पुराने पन्नों से)
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