शुक्रवार, 30 अक्टूबर 2026

पूर्णिया डायरी- 32 : गेरार्ड गुस्तावस डुकेरेल, शराफ़-उन-निसा और रज़ा खान[1765-1772]

अंग्रेज़ी और फ़ारसी दोनों ही भाषाओं के ऐतिहासिक दस्तावेजों  में एलिज़ाबेथ शराफ़-उन-निसा के ब्योरे कम मिलते है। जिससे मिसेज डूकरेल [एलिज़ाबेथ शराफ़-उन-निसा ]के जीवन के बारे में बहुत थोड़ी जानकारी प्राप्त होती है। पर गेरार्ड गुस्तावस डुकेरेल के बचे-खुचे काग़ज़ात उस समय के मुग़ल राज और ईस्ट इंडिया कंपनी के ऊँचे हलकों के बीच जुड़े रिश्तों के कुछ अनदेखे सुराग़ ज़रूर थमा देते हैं।

[प्रतीकात्मक चित्र]
सन् 1765 में गेरार्ड गुस्तावस डुकेरेल ने ऐसे समय भारत की धरती पर पैर रखा, जब कलकत्ता में अंग्रेज़ी राज अपनी जड़ें जमा रहा था। डुकेरेल सीधे रॉबर्ट क्लाइव के घर पहुँचे, जो उसी साल एक ऐसा बड़ा अधिकार लेकर लौटे थे जिसने सब कुछ पलट कर रख दिया—शाह आलम से मिला बंगाल, बिहार और उड़ीसा का लगान वसूलने का मनचाहा अधिकार। इसके बाद मुग़ल ढांचे के बीच कंपनी का नया ढाँचा खड़ा करने की होड़ मच गई, जिसमें क्लाइव और उनके साथी डुकेरेल आगे-आगे रहे। 1767 में क्लाइव के लौटने के बाद, डुकेरेल ने मुर्शिदाबाद और कलकत्ता के बड़े हाकिमों के साथ काम किया और जल्द ही पूर्णिया के पहले डिस्ट्रिक्ट सुपरवाईजर बन बैठे।

पूर्णिया की गद्दी सँभालने के लिए पुराने और मँजे हुए लोगों की खोज थी, पर यहाँ आए अभी पाँच बरस ही बीते थे कि डुकेरेल के चुने जाने ने सबको चौंका दिया। 1769 में अपनी गद्दी छोड़ते हुए सर फ़्रांसिस साइक्स ने अपना फ़ायदा साधने के लिए अपने तीन चहेतों—रेडफ़र्न, डुकेरेल और रूक—को अलग-अलग ज़िलों में बिठाने की चाल चली, ताकि मुहम्मद रज़ा ख़ान के अमले पर नज़र रखी जा सके। रिचर्ड बेकर के भी डुकेरेल बड़े भरोसेमंद थे। मुग़ल राज के कर्ता-धर्ता रज़ा ख़ान और उनके भाई मुहम्मद अली ख़ान से डुकेरेल का ऐसा गहरा मेलजोल था कि किसी को यह बात अखरी तक नहीं। क्लाइव, वेरेल्स्ट, साइक्स और रज़ा ख़ान—दरबार के इन सारे बड़ों की हामी ने डुकेरेल को पूर्णिया के इस भारी कमाई वाले पद का पक्का दावेदार बना दिया। ऐसा माना जाता है कि पूर्णिया पहुँचकर उन्होंने अपनी ‘भारतीय पत्नी’ चुनकर यहाँ के बड़े घरानों से अपनी पकड़ और पक्की कर ली।

डुकेरेल और रज़ा ख़ान के बीच सिर्फ़ लेन-देन और कामकाज का नाता नहीं था, बल्कि दोनों में पक्की और गहरी दोस्ती भी थी। जब डुकेरेल, शराफ़-उन-निसा के साथ इंग्लैंड चले गए, तो अपनी चुप्पी के लिए जाने जाने वाले रज़ा ख़ान ने उन्हें फ़ारसी में एक पाती भेजी। बनावटी बातों से परे, गहरे अपनेपन और चाहत से भरी यह पाती उन दोनों के सीधे और सच्चे लगाव की गवाही देती है।

पूर्णिया से रज़ा ख़ान का पुराना नाता था; उनके चाचा आग़ा मुहम्मद नक़ी ख़ान पुराने समय से ही इसी इलाके में बसे हुए थे। यह सोचना भी बेतुका नहीं लगता कि शराफ़-उन-निसा का कोई रिश्ता सैयद मुहम्मद अली ख़ान के कुनबे से रहा हो—जो रज़ा ख़ान के भाई थे, 1765 से 1770 तक नायब दीवान रहे और 1768 से 1771 तक पूर्णिया के फ़ौजदार रहे। काम से हटने के बाद मुहम्मद अली ख़ान का अपने ढलते दिनों में पूर्णिया लौटना भी यही बताता है कि उनका भरा-पूरा घर-परिवार यहीं टिका हुआ था। भले ही शराफ़-उन-निसा के पिता के नाम पर आज भी धुंध छाई है, पर रज़ा ख़ान के इस बड़े घराने से उनका कोई गहरा ख़ून का नाता रहा होगा, इस बात को नकारा नहीं जा सकता।

सन्दर्भग्रंथ सूची-
Abdul Majed Khan, The Transition in Bengal, 1767-75: A Study of Saiyid Muhammad Reza Khan. Cambridge: Cambridge University Press, 2009.

Calendar of Persian Correspondence: 1781-5 . Vol. VI. Calcutta, 1911, Entry number 1091, p. 351.

Robert Clive Letters in Persian, 1756-177. National Library of Wales. Reference number 71589-1CR-09. Accessed via British Online Archives.

Sair Mutaqherin , Volume III, p. 87; “Preface,” Calendars of Persian Correspondence: Vol. IV, 1772-5. Calcutta: 1911.

Proceedings of the Committee of Circuit at Rangpur, Dinajpur, Purnea, and Rajmahal, Vols V, VI, VII, and VIII. 16 December 1772 to 18 February 1773. Calcutta: Bengal Secretariat Book Depot, 1927, 111. Bodleian Library, Oxford.

The Letter Copy Books of the Resident at the Durbar in Murshidabad, 1769–1770. (1919) 1769-1770 ; (1919)

अनस्टेबल आर्काइव्ज़: डॉक्टर मेगन ईटन रॉब


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