मंगलवार, 21 अगस्त 2018

नूरसराय डायरी(मिशन हरियाली,नूरसराय)

तैंतीस युवाओं का समूह कोई बैंकर ,कोई व्यापारी, कोई शिक्षक , कोई छात्र, कोई स्वतंत्र enterpnoyar तो कोई  अवकाशप्राप्त सरकारी सेवक. सोच एक , उदेश्य एक, हरित धरा बनाना .यह समूह जून २०१६ से अबतक दो वर्षों में लगभग दो लाख सत्तर हजार  पौधे  silently लगा चुका है. जिसकी उत्तरजीविता ९८% से अधिक है . वृक्षारोपण  से जुड़ी कोई भी सरकारी या गैर सरकारी संस्थान इतनी उतरजिविता का दावा नहीं कर सकती है . यह चमत्कार राज्य की राजधानी या अन्य किसी बड़े शहर में नहीं हुआ है . बल्कि नूरसराय से इसकी शुरुआत हुई जो नगर पंचायत भी नहीं बल्कि बिहार के एक  ब्लाक का मुख्यालय मात्र  है. इस समूह द्वारा किया जा रहा कार्य पर्यावरण के क्षेत्र में कार्य कर रहे अध्येतायों के लिए अध्ययन और शोध का विषय है .
                                       इस समूह में अधिकांश युवा २५ से ३५ वर्ष के हैं जो कभी एकसाथ नूरसराय में बचपन बिताया साथ-साथ कबड्डी और  क्रिकेट खेला करते थे. नूरसराय बाज़ार से सुबह शाम उठते धुंए और दिन भर उडती धूल ने इन्हें पर्यावरण पर सोचने के लिए मजबूर कर दिया, और फिर कारवां चल पड़ा. नाम रखा "मिशन हरियाली नूरसराय". समूह अपने उदेश्य से कभी न भटके इसके लिए सब ने अ-लिखित नियम बनाये.
      १. समूह के सभी सदस्य अपनी व्यक्तिगत कमाई में से प्रत्येक माह निर्धारित राशि जमा करेंगे.
       २.सरकार या किसी बहरी व्यक्ति संस्था से कोई धनराशि न मांगेगें न स्वीकार करेगें.
       ३.NGO या ट्रस्ट किसी भी रूप में संसथान का निबंधन नहीं करायेंगें .
       ४.राजनीति और राजनैतिक व्यक्तियों से दूर रहेंगें. 
        ५.धन-सहयोगी सदस्यों की संख्या सिमित रखेगें





इन्हीं  बाई-लॉज़ में मिशन हरियाली नूरसराय की सफलता का राज छिपा है . समूह के सदस्य जो उपलब्ध रहते है प्रत्येक दिन सुह सूर्योदय से पहले पर्यावरण संरक्षण के औजार खंती, बाल्टी, कुदाल, और कुछ शिशु पौधे लेकर निकलते हैं. नए पौधे लगाते हैं. लगे पौधे की निकाई-गुराई कर पानी डालते हैं.


             
जमा पैसे से हजारों की संख्या में अमरुद, आम , कटहल, महोगनी,शमी,जामुन,के शिशु-पौधे लाये जाते हैं. दल के सदस्य लगभग प्रत्येक दिन किसी विद्यालय या कोचिंग institute में जाकर वहां के छात्रों से रु-ब-रु होते हैं. उन्हें आंकड़ो के माध्यम से यह बताते हैं कि पेड़ो की बेतहाशा कटाई , बढ़ते प्रदुषण हमारे आस-पास हानिकारक गैैसों की मात्रा बढ़ा रही है. हम गैस चेम्बर में जीने को मजबूर हैं ,









चिंता का विस्तार बच्चो तक होता है. उन्हें ये बताते हैं कि पृथ्वी को बचाने का एकमात्र उपाय हमारे हाथ में यह है कि, हम ज्यादा से ज्यादा पौधे लगायें. इसके बाद उन्हें एक-एक पौधा निःशुल्क देकर इसे सुरक्षित बड़ा करने के लिए प्रेरित किया जाता है. उन्हें यह भी कहा जाता है कि यदि और पौधे लगाने की इच्छा हो तो नूरसराय मिशन हरियाली के कार्यालय में आकर ले सकते .  







जब तक मैं बिहारशरीफ तक था तब कभी-कभी छुट्टी के दिन दल के सदस्यों के साथ सुबह निकल पड़ता था. मिशन के एक सदस्य ने अपना अनुभव साझा करते हुए बताया की सरकारी स्कूल में शुरुआत में पर्यावरण-संवाद के बाद  बच्चों से पूछा जाता था कि  एक महिना के अंदर कोइ फल खाया है तो हाथ उठाओ. एक भी हाथ नहीं उठता , पर अब दो वर्ष बाद वही हाथ मिशन कार्यालय में अमरुद लेकर आते हैं. मिशन हरियाली नूरसराय के सदस्य अबतक 6 से अधिक  विद्यालयो एवम कोचिग मे जाकर पर्यावरण जागरूकता और पौधा वितरण का कार्य कर चुके है






इस प्रकार इस इलाके के ग्रामीण क्षेत्रों में एक पीढ़ी तैयार हो रही है जो पर्यावरण के प्रति संवेदनशील और प्रदुषण के प्रति जागरूक होगी .वरना पर्यावरण-चिंता तो खाए-पिए-अघाए शहरी लोगों का विषय था.इनकी प्रेरणा से हरित-हरनौत एवं मिशन हरियाली राजगीर जैसी संस्थाओं का भी गठन हुआ है.

शनिवार, 18 अगस्त 2018

उखई डायरी (ukhai dayri / siwan / khuda baksh khan )

खुदा बक्श खां साहब के विषय में सिवान डायरी - २ में लिखते हुए मेरी इच्छा हुए की क्यों न सिवान जाकर उनके गांव उखई घूम आया जाये. इस बात के लिए मै अपने आप को कोस भी रहा था की सिवान रहते (वर्ष २००७से २००९ के बीच ) मै उखई नहीं जा सका . मैंने तत्क्षण  वंहा अपने मित्र कुशेश्वरनाथ तिवारी से बात की , अनुरोध किया कि उखई जांयें और संभव हो तो उनके पैतृक घर को ढूूँँढेे. वंहा लोगों से मिलें . वे अत्यंत उत्साहित हुए , उखई गये . 





खुदा बक्श साहब के पैतृक घर , वंहा  की गलियों , वंहा के लोग, लोगों द्वारा सहेजी गयी स्मिर्तियो को साझा किया. उन्होंने खुदा बक्श साहब के पौत्र मो० सरफुद्दीन खां का पता भी दिया जो कलकता में रहते हैं .
सरफुदीन साहब से मेरी लम्बी बात हुई. उन्होंने भविष्य की योजना बताते हुए कहा की उखैई में वे १०० बीड का बड़ा अस्पताल बनवाना चाहते हैं. पटना आने पर मिलने का भी वचन दिया, वे खुदा बक्श खां ओरिएण्टल पुब्लिक लाइब्रेरी के गवर्निंग बॉडी के सदस्य भी हैं. 

मंगलवार, 14 अगस्त 2018

विरासत डायरी-२ (bihar heritage dyari-2 bihar research society/patna museum )

बंगाल से अलग होने के बाद सन् १९१५ इस्वी में  बिहार में  एक Indological research society का गठन किया गया बिहार रिसर्च सोसायटी .  बीसवीं सदी का एक महत्वपूर्ण शोध संस्थान बना. एशियाटिक रिसर्च सोसाइटी के बाद बिहार रिसर्च सोसाइटी ही भारत का सबसे अहम indological research institute है . यह विश्व के कुछ एक शोध संस्थानों में से है जो अपनी पत्रिकाओं  (journals) के लिए जाने जाते है.
                                                                                   इस सोसाइटी  की पहली बैठक में ही यह निर्णय लिया गया था कि बिहार में संग्रहालय भवन निर्माण के लिए स्थानीय सरकार से अनुरोध किया जाये . इस भवन के दो कमरे बिहार रिसर्च सोसायटी के लिए होंगें. पहली बैठक आयुक्त पटना के कार्यालय कक्ष में हुई थी.इस बैठक में स्थानीय सरकार से ३००० रूपये वार्षिक अनुदान देने का भी अनुरोध किया गया था , क्योंकि बंगाल रिसर्च सोसाइटी को ३६०० रूपये का सालाना अनुदान मिल रहा था.


१ फ़रवरी १९२९ को पटना संग्रहालय का अपना भवन तैयार हुआ जिसे अभी बुद्ध मार्ग पर देखा जा सकता है .



निर्णय के अनुसार राजपूत शैली में नवनिर्मित संग्रहालय भवन के उत्तर-पश्चिम भाग के दो कमरे  बिहार रिसर्च सोसायटी को मिले जिसमे यह आज भी चल रहा है.
                           संग्रहालय भवन में आने के बाद इस संसथान को एक  घुमक्कड़ संत का सहयोग मिला.  उनके द्वारा कई सामग्रियां  इस संस्थान को दी गयी. इन सामग्रियों ने इसे २०वीं शताब्दी में सृजित  विश्व के  शीर्षस्थ धरोहरों  में से एक बना दिया .



ये महान  संत राहुल संकृत्यायन थे . उनके द्वारा तिब्बत से लाई गयी लगभग दस हज़ार तिब्बती  पांडुलिपियाँ यंहा संरक्षित है . ये सभी बौद्ध धर्म  से सम्बंधित ग्रंथों की पांडुलिपियाँ हैं.
                                            नालंदा , विक्रमशिला विश्वविद्यालय  से जो संस्कृत, पाली के ग्रन्थ यंहा अध्यनरत तिब्बती बौद्ध भिक्षु द्वारा  ७वीं शताब्दी से १८वीं  शताब्दी तक लाये गाये थे , उन्ही का तिब्बती रूपांतरण था. ये ग्रन्थ अपने मूल रूप में अब न भारत में है न ही तिब्बत में
.

वे १९२९ से १९३८  के बीच  वे चार बार तिब्बत गये . इन पांडुलिपियों को खच्चरों पर लादकर कठिन मार्ग से लाया. ठीक वैसे ही जैसे हान्शांग भारत से  बौद्ध ग्रंथों को चीन ले गये थे.
                                                                  आज मै सन १९७३ में संस्थान के जर्नल में प्रकाशित एक लेख की  तलाश में यंहा आया था,

जो मुझे मिल गया .मैंने इन संरक्षित पांडुलिपियों को देखा जो कीटनाशक उपचारित डब्बे के अन्दर  लाल कपडे में सहेज कर रखे गये हैं , इन पांडुलिपियों के साथ कुछ थंका पेंटिंग भी उनके द्वारा लाई गयी थी जो यंहा संरक्षित है .

मैंने वह कुर्सी भी देखी  जिसपर बैठकर राहुल संकृत्यायन काम करते थे . इन तिब्बती पांडुलिपियों के अतिरिक्त

 बिहार रिसर्च सोसायटी में लगभग ३०० फारसी (persian ) पांडुलिपियाँ भी सुरक्षित है. वर्ष २००२ में बिहार सरकार ने इसे अपने अधीन ले लिया , अब यह पटना संग्रहालय का अंग है. बिहार सरकार के कला एवं संस्कृति विभाग के अधीन . अब इन संरक्षित पांडुलिपियों के शिघ्र प्रकाशन और अनुवाद की संभावना है.

        

शनिवार, 11 अगस्त 2018

धुरगाँव डायरी (dhurganw dyari / ekangarsrai-biharshrif, deepak anand)

दीपक जी से मेरी मुलाकात २०१६ की गर्मियों में हुई थी. नव नालंदा महाविहार के एक छोटे से कमरे में जंहा वे बैठकर श्वेनत्सांग पर कुछ शोधपरक काम कर रहे थे .  उनसे बात करके लगा कि मै २५०० वर्ष पूर्व के नालंदा में बैठा हूँ . भगवान बुद्ध यही आस पास आम्र वन में विचरण कर रहे हैं. फिर प्राचीन नालंदा महाविहार के छात्रावास होते हुए श्वेनत्सांग के साथ उन स्थानों पर गये जंहा भगवान बुद्ध गये थे. एक अध्यात्मिक यात्रा.
    मेरी यह धरना थी  कि  वे इतिहास के विद्यार्थी रहे है, और किसी विश्वविद्यालय में इतिहास के शिक्षक है . पर ऐसा नहीं था सैनिक स्कूल बलाचरी से मैट्रिक की परीक्षा पास करने के बाद बैचलर आॅफ  इंजीनियरिंग  की डिग्री लेकऱ लौटे तो नौकरी करने की इच्छा  नहीं हुई . कुछ दिनों तक एन०जी०ओ० में . ग्रामीण विकास प्रक्षेत्र में काम किया  भटके हुए कई युवाओं को मुख्य धारा से जोडा . पर्यटन क्षेत्र में काम करते हुए नेपूरा (प्रखंड-सिलाओ जिला-नालंदा ) को भारत के पर्यटन नक़्शे पर लाया. इसी दौरान  वे नव नालंदा महाविहार के निदेशक के सम्पर्क में आये. यही इतिहास, बुद्ध , और श्वेनत्सांग से जुड़ाव हुआ .  ये जुड़ाव ऐसा हुआ कि २००६ से २००८ तक  श्वेनत्सांग के यात्रा वृतांत को ही पढ़ते रहे.
                                             अक्टूबर २००९ में  इसी सम्बन्ध में एक प्रेजेंटेशन नव नालंदा महाविहार की ओर से दीपक जी ने माननीय मुख्यमंत्री जी के समक्ष प्रस्तुत किया . इस प्रस्तुती से माननीय मुख्यमंत्री काफी प्रभावित हुए . दिसम्बर में जब वे राजगीर प्रवास पर अतिथिगृह पंहुचे तो उतरते ही कहा की मै तो दीपक जी के निमंत्रण पर राजगीर आया हूँ . डी० एम०, एस० पी0 के साथ तमाम अमला यह जानने को उत्सुक हो गया की ये दीपक जी कौन है .


         

इस प्रवास में दीपक जी ने मा० मुख्यमंत्री जी को वे तमाम स्थल दिखाए जो कम प्रसिद्ध थे.इस यात्रा कि एक बड़ी उपलब्धि यह रही की प्राचीन जेठियन-राजगृह मार्ग खोलने की दिशा में कार्य प्रारम्भ हो गया . यंहा दीपक जी के सौजन्य से नव नालंदा महाविहार के तत्वाधान में वर्ष २०१४ से २०१७ तक चार भव्य जेठियन  राजगृह धम्म्यात्रा का  आयोजन हुआ जिसमे विश्व के कई देशों के बौद्ध भिक्षुओं ने भाग लिया .










 इसके बाद दीपक जी ने पीछे मुड़कर नहीं देखा. कम समय में इतनी  बौद्धिक उपलब्धि  हैरत में डाल देता है . उनके कुछ कामों का विवरण इस प्रकार है
उनके ब्लॉग nalanda on move पर लगभग 263  आलेखों का प्रकाशन अबतक हुआ  है .




जिसे अबतक १५०००० लोगों ने देखा हैं.
                         दुसरे ब्लॉग Nālandā - Insatiable in Offering पर 253  शोधपरक आलेख है.





जिसे अबतक १८३००० लोगों ने देखा है .
                                           गूगल आर्ट एंड कल्चर पर श्वेनत्सांग  मेमोरियल हॉल का विवरण दिया.




जिसे इस लिंक पर देखा जा सकता है .https://artsandculture.google.com/partner/xuanzang-memorial-nava-nalanda-mahavihara
                     दो महत्वपूर्ण पुस्तकों की भी रचना की जिसके सम्पादक कोई और है , परतु सारा परिश्रम दीपक जी का है  -
पहली journay from bihar to bihar यह पुस्तक श्वेनत्सांग की यात्रा पर केन्द्रित है . इसी नाम से एक प्रदर्शनी भी  श्वेनत्सांग मेमोरियल हॉल में लगा है .इसे भी दीपक जी ने ही तैयार किया था.
दूसरी The pilgrimage legacy of Xuanzang .

                                                              २०१७ में दीपक जी ने मुझे बताया था कि वे दिल्ली जा रहे हैं . और चले गये मैंने जात्ते हुए उन्हें बेहतर भविष्य की शुभकामनाएं दी , पर अंतकरण से बड़ा दुखी था, कि एक और हीरा बिहार से निकल गया.  इधर एक सप्ताह पहले wapp पर दीपक जी का एक मैसेज आया कि वे बिहार लौट रहे है . मन प्रस्सन हो गया वे लौट आये है. आज उनसे मुलाकात हुई . दीपक जी ने बताया की वे अब बोधगया में रहकर काम करेंगे. उनका सबसे महत्वपूर्ण काम live museum of magadh हैं




जिसका लिंकhttp://www.livemuseumofmagadha.com/ है . मगध क्षेत्र के गांवो में बिखरी मूर्तियों का documentatio इस जीवंत संग्रहालय में किया गया है.उनके द्वारा बताया गया की मगध क्षेत्र के लगभग 350 गांवों का भ्रमण उन्होंने इस उदेश्य से किया हैं शेष का अब करेंगें. इस संग्रहालय में देश विदेश के विभिन्न सग्रहालयों में रखी magadh की मूर्तियों को भी प्रदर्शित किया गया है .
दीपक जी धुरगांव एकंगरासरय नालंदा के है  . मगध के इतिहास में ऐसे  रमे की विवाह भी नहीं किया.   एकदम फक्कड संत स्वभाव . .

गुरुवार, 9 अगस्त 2018

विरासत डायरी-1(heritage dyari-1 / state archives bihar/ राज्य अभिलेखागार बिहार )

प्रसिद्ध इतिहासकार डा0 कालिकिंकर दत्त कि नजर जब बिहार के विभिन्न जिला अभिलेखागार में पड़े 18वीं एवम् 19वीं सदी के महत्वपूर्ण दस्तावेजों पर पड़ी तो उन्होंने सरकार के समक्ष एक प्रस्ताव रखा. जो इन अभिलेखों को राज्य मुख्यालय में मंगाकर संरक्षित करने के संबंध में था. सरकार ने इस प्रस्ताव को सहर्ष स्वीकार कर लिया. जिला से अभिलेख के चयन की अहम जबाबदेही दत्त साहब को सौपी गयी .जब ये अभिलेख यंहा आ गये तो डा० दत्त को बिहार राज्य अभिलेखागार का संस्थापक निदेशक बना दिया गया . उन्ही की  दूरदृष्टि और परिश्रम का परिणाम बिहार का राज्य अभिलेखगार है।   
   
यहां ब्रिटिश काल के प्रारंभिक इतिहास के महत्वपूर्ण स्त्रोत सामग्री सुरक्षित है.कालांतर मे अभिलेखागार द्वारा कई महत्वपूर्ण पुस्तकों का भी प्रकाशन किया गया है.
पूर्णिया जिले के 18वीं सदी के कुछ दस्तावेजों की तलाश में आज मै वहाँ गया था।पूर्णिया  का सबसे पुराना अभिलेख वंहा वर्ष १७७५ का है. लगभग २५० वर्ष पुराना.

मंगलवार, 7 अगस्त 2018

सिवान डायरी-2(siwan dyari-2 / Maulvi Mohammad Bakhsh /Khuda Bakhsh khan / ukhi)

उखई सिवान से 6 किलोमीटर की दूरी पर पंचरुखी प्रखंड का एक गांव है. इसी गांव में 18वीं शताब्दी के अंत में मौलवी मोहम्मद बक्श  का जन्म एक संपन्न मुस्लिम परिवार  में हुआ था. उनके पूर्वज मुगल बादशाह आलमगीर के दरबार में अभिलेख  लेखकऔर अभिलेखपाल थे. परंतु पलासी एवं बक्सर की लड़ाई के उपरांत ईस्ट इंडिया कंपनी के साथ मुग़ल बादशाह से  संधि हुई . इस संधि ने कुछ ऐसी परिस्थितियां पैदा कर दी की मुगल बादशाह अपने अमला को वेतन देने की स्थिति में नहीं रह गये. बल्कि खुद ही पेंशनभोगी बन गए थे.
     मौलवी मोहम्मद बक्श  परिवारिक विरासत को आगे बढ़ाते हुए अच्छी तालीम हासिल की और  मुस्लिम लॉ के विशेषज्ञ हुए. सत्ता के समीपस्थ  केंद्र पटना में आकर बस गए जंहा उनके लिए पर्याप्त अवसर और संभावनाएं थी . चूँकि उनके पूर्वज अभिलेखपल थे इस कारण उन्हें   दुर्लभ पुस्तकें  और  पांडुलिपियों के संकलण का जबरदस्त  शौक  था. उनके इस शौक ने दुनियां को एक नया  विरासत दिया ,जिसे आप खुदा बख्श ओरिएंटल लाइब्रेरी के नाम से जानते हैं
. लाइब्ररी  के बारे में विशेष विवरण इस लिंक http://kblibrary.bih.nic.in/default.htmपर आपको मिल जाएगा . .लाइब्रेरी के  अधिकारीक  वेबसाइट पर हमें मौलवी मोहम्मद बक्श  के बारे में बहुत कुछ नहीं बताता. यह अभी भी  उखई को छपरा जिला में ही बताता है. जबकि वर्तमान में उखई सिवान जिले में है.  खुदा बख्श खान का जन्म 2 अगस्त  1842 को  सिवान के उखई में ही हुआ था . पिता की विरासत को आगे बढ़ाते हुए अच्छी शिक्षा ग्रहण की, पटना में पेशकार के रूप में शुरुआत कर सन 1895 में मैं हैदराबाद निजामत अदालत के चीफ जस्टिस बने
. सन  1876  मौलवी मोहम्मद बक्श जब  मृत्यु शय्या  पर लेटे थे तो उन्होंने अपना दुर्लभ संग्रह योग्य पुत्र को सौंपते हुए एक पुस्तकालय खोलने की इच्छा व्यक्त की . खुदा बक्श खां ने पिता की इच्छा को जुनून में बदल दिया. सन 1891में पुस्तकालय 4000 पांडुलिपि और हजारों पुस्तकों के साथ आम लोगों के लिए खोल दी गयी. प इसके बाद भी खुदा बक्श पांडुलिपियों  और दुर्लभ ऐतिहासिक वस्तुओं  के संकलन में अपनी जमा पूंजी लगाते रहे. इस  जुनून के कारण उन्होंने कर्ज  लिया . इस कर्ज को चुकाने के लिए बंगाल सरकारने उन्हें  8000 रुपए का अनुदान  दिया.  उनकी मृत्यु 3 अगस्त 1908 को हुई . मृत्यु से पूर्व १९०५ में एक रीडिंग रूम का निर्माण कराया. सरकार द्वारा दिए गये अनुदान के एवज में इसका नाम कर्जन रीडिंग रूम रखा गया.
पुस्तकालय का अधिकारिक वेबसाइट भी इसके बारे में मौन है .खुदा बक्श सन 1915 में गठित बिहार एवं उड़ीसा रिसर्च सोसाइटी के इतिहास की समिति के सदस्य भी रहे  है. इस वर्ष खुदा बक्श साहब के जन्मदिन (२ अगस्त) के अवसर पर






यहाँ लगाई गयी प्रदर्शनी में उन दुर्लभ पांडुलिपियों को देखने का अवसर मुझे भी मिला. पटना से जुड़े तीन अलग-अलग महानुभावों ने अपने ऐसे शौक की वजह से विश्व को विरासत दिया है. दो के बारे में फिर कभी.

बुधवार, 1 अगस्त 2018

किशनगंज डायरी-१(kishanganj dyari-1 devid cortni barr and linda barr)

6 नवंबर 2006 को एक अंग्रेज महिला किशनगंज के होटल हाईवे में आकर रुकी, आमतौर पर विदेशियों का आगमन इस शहर में ना के बराबर होता है. यहां  वैसा कोई पर्यटन स्थल या अन्य स्थान नहीं है ,जिसे देखने के लिए विदेशी  पर्यटक आएँ .लोगों ने अनुमान लगाया कि वह नेपाल या दार्जिलिंग जा रही होगी, रास्ते में किशनगंज रुक गयी . उसके साथ उसके मित्र मित्र रिचर्ड  अहर्निश भी थे .  दोनों भूटान भ्रमण कर किशनगंज पहुंचे थे .अगले दिन वह महानंदा किनारे चली गई, कुछ खोजी किस्म के पत्रकारों ने उनका पीछा किया . देखा कि वो एक पोटली से कुछ राख निकाल कर , ओम शांति ,ओम शांति ,ओम शांति का तीन बार जाप कर उसे महानंदा की धारा में प्रवाहित किया खबर फैल गई . तब तक और अखबार वाले जुट गए .अखबार वालों ने उनसे पूछा कि क्या वह हिंदू है ? और किसी की अस्थियां विसर्जित करने आई  हैं. कुछ देर मौन रहने के बाद उन्होंने कहा कि वह हिंदू नहीं क्रिश्चन है , पर हां वह अपने पिता की अस्थियां विसर्जित करने आई है .


पत्रकार आश्वस्त हो गया कि उनके पिता हिंदू थे.
" पूछा कि "पिता का क्या नाम था."
"मेरे पिता का नाम डेविड कोर्टनी बार्र था."
 पत्रकारों की जिज्ञासा शांत नहीं हुई , पूछा-
" क्या वे हिन्दू थे और आपकी मां से विवाह करने के उपरांत क्रिश्चियन हो गए थे."
 अंग्रेजी युवती जिसका नाम लिंडा बार्र  था ने ना में सिर हिलाते हुए खा-
" नहीं ऐसा नहीं है , मेरे पिता जन्मजात क्रिश्चन थे."
 पत्रकारगण फिर चकरा  गए.
उसके बाद लिंडा ने  जो कहा उसे सुनकर सभी आश्चर्य में पड़ गए कि क्या, ऐसा भी हो सकता है. लिंडा ने बताया कि ब्रिटिश राज के अंतिम कुछ वर्षों में, जब भारतीय राजनीति अपने उथल-पुथल के चरम दौर पर था तब उसके पिता डेविड  कोर्टनी  बार्र  पूर्णिया के कलेक्टर हुआ करते थे इससे पहले वे किशनगंज में एसडीओ के पद पर थे .वे  एक आई० सी० एस0 पदाधिकारी थे.

सन 1932 से 1947 तक  पटना ,रांची ,पूर्णिया, और हजारीबाग के जिलाधिकारी रहे थे. उनकी अंतिम इच्छा थी कि मृत्यु के उपरांत वैदिक रीति-रिवाज से उनका दाह संस्कार किया जाए. अस्थियों को उनके कर्म स्थल रहे किशनगंज के महानंदा नदी में प्रवाहित कर दिया जाए. 29 फरवरी 2004 को डेविड  कोर्टनी  बार्र की मृत्यु लंदन में हुई .उनकी इच्छा के अनुरूप  वैदिक  रीति-रिवाज से उनका दाह संस्कार किया गया. अस्थियों  को 2 वर्षों सुरक्षित रखने के उपरांत, आज उसे  महानंदा में प्रवाहित करने लायी  हैं .डेविड को हिंदुस्तान से बड़ा लगाव था. वे हिंदुस्तान की संस्कृति और रीति-रिवाज से इस कदर घुल-मिल  गए थे कि भारत को स्वतंत्रता मिलने और प्रशासनिक पद खो  देने के बावजूद भी उन्होंने कभी भारत छोड़ने की इच्छा प्रकट नहीं की. आई० सी ० एस ०  की नौकरी छोड़ने के बाद कलकत्ता की एक प्राइवेट मेटल बॉक्स कंपनी मे वे  मुख्य जनसंपर्क पदाधिकारी के रूप में कार्यरत  थे . वह यूनाइटेड प्लांटर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष भी थे .मशहूर वन्य जीव विशेषज्ञ जिम कॉर्बेट इनके मित्र थे.
         सन 1962 तक भारत में रहे इसी दौरान ऊटी में लिंडा बार्र  का जन्म हुआ. जब उनकी पत्नी पॉलेनी को गंभीर बीमारी ( हैपेटाइटिस-बी ) हो गई तो मजबूरी में वे  लंदन लौट आये .पॉलिना की मृत्यु 1994 ईस्वी में हुई ,
                                              यह खबर अखबार में  छपी तो उन दिनों मैं पूर्णिया में ही था. किशनगंज के होटल हाईवे का फोन नंबर पता कर फोन किया ,तब तक लिंडा बार जा चुकी थी

बुधवार, 18 जुलाई 2018

पटना डायरी -३ :रवि संगम एक जुझारू व्यक्तित्व (patna diary -3: ravi sangam)

रवि संगम से मेरी मुलाकात सन 2007 में हुई थी . उन्होंने अपने कैरियर की शुरुआत एक पत्रकार के रूप में किया था 'आज ' (धनबाद) , 'प्रभात खबर ' (रांची), 'जनशक्ति'( पटना), 'नवभारत टाइम्स ' (पटना )में चीफ सब एडिटर एवं सब एडिटर से सफर तय करते हुए साप्ताहिक पत्रिका 'ब्रेस्ट समता टाइम्स' 'समाचार धारा ' इत्यादि पत्रों से  सन् 1989 से 1997 तक जुड़े रहे. वर्ष 1998 में इन्होंने बिहार के शिक्षा ,पर्यटन, कौशल विकास, उद्योग और कृषि उत्पादों से जुड़े सूचनाओं का  डेटाबेस तैयार करने की  कार्य योजना बनायी , जिससे बिहार के आर्थिक विकास को गति मिल सके . उदेश्य  था सही सूचना को सुगमता से सही व्यक्ति तक पहुंचाना ,इसे वे विजन 2020 कहते हैं  सन् 1998 से 2000 तक शोध एवं प्रकाशन की तकनीकों का अध्ययन किया. शिक्षा के क्षेत्र में काम करते हुए बिहार का पहला एजुकेशनल डायरेक्टरी वर्ष  2003 में प्रकाशित किया जिसे लोगों ने हाथों हाथ लिया, इसके बाद बिहार में पर्यटन की संभावनाओं पर शोध कार्य प्रारंभ किया इस क्षेत्र में काम करने के लिए अपनी एक कंपनी का गठन किया इसका नाम संगम मास कम्युनिकेशन प्राइवेट लिमिटेड है.
बौद्ध सर्किट बिहार तैयार करने के लिए इन्होंने कई वर्षों तक शोध एवं अध्ययन किया, परिणामस्वरूप  कुछ ऐसे नए स्थान सामने आए जो अब तक बिहार के पर्यटन नक्शे पर नहीं थे . इन स्थानों की फोटोग्राफी बिहार के विभिन्न जिलों में जाकर 1 वर्ष तक की गई, प्रतिकूल मौसम की परिस्थितियों में भी काम जारी रखा, 3 डिग्री से 48 डिग्री तक तापमान की परवाह किए बगैर फोटोग्राफी का कार्य चलता  रहा. 100 से अधिक भगवान बुद्ध से जुड़े स्थलों को चिन्हित किया गया इसमें उपेक्षित एवं पूर्व से अज्ञात स्थलों को भी शामिल किया  गया. यह लगभग 300 पृष्ठों का होगा वर्ष 2007 से यह तैयार है. इसको परिष्कृत करने के लिए अब तक रवि संगम इसे चार बार संपादित कर चुके हैं, परंतु अर्थाभाव के कारण इसका प्रकाशन नहीं हो पाया है . इस बीच कुछ चतुर किस्म के लोगों ने इनका इंप्लाई बनकर सामग्रियां चुराकर छाप दी. चोरी तब पकड़ी गई जब डमी प्रति का आंकड़ा को हु-ब-हू  छाप दिया,. जो रवि संगम ने जानबूझकर डमी प्रति में गलत अंकित किया था .
          हिंदुस्तान मीडिया के साथ मिलकर गया ,बक्सर, नवादा ,बिहार शरीफ आदि जिलों की पर्यटन निर्देशिका छापी






इससे पहले वैशाली जिले की इंफॉर्मेशन डायरेक्टरी महावीर मंदिर प्रकाशन के तत्वाधान में छपी जिसे लोगों ने हाथों-हाथ लिया 2000 प्रतियां एक माह से भी कम समय में समाप्त हो गई
बिहार का पहला इंफॉर्मेशन डायरेक्टरी संगम मास कम्युनिकेशन प्राइवेट लिमिटेड की ओर से प्रकाशित हुआ इसमें बौद्ध जैन सूफी वन्य जीवन प्राकृतिक सौंदर्य ऐतिहासिक एवं पुरातात्विक स्थलों पर दर्ज है इसके बाद महावीर मंदिर प्रकाशन के तत्वाधान में बिहार के हिंदू धर्म से जुड़े सभी स्थानों का हिंदू सर्किट इंफॉर्मेशन डायरेक्टरी प्रकाशित की गई यह भी बिहार में पहली बार हुआ
बिहार के बौद्ध स्थलों पर केंद्रित वेबसाइट  budhistcircuitebihar.com को वर्ष 2006 में लॉन्च किया गया, इस विषय पर यह सबसे ज्यादा देखा जाने वाला वेबसाइट है.
बिहार के 7 जिले गया, पूर्वी चंपारण, पश्चिमी चंपारण, जहानाबाद ,नालंदा ,पटना एवं वैशाली के बौद्ध  स्थलों का विवरण दर्ज है . वर्ष 2017 में 350वे  प्रकाश पर्व के अवसर पर टूरिस्ट  डायरेक्टरी सिख  सर्किट बिहार का प्रकाशन किया
,उन्हें उम्मीद थी कि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी एवं पर्यटन विभाग कुछ हजार प्रतियां खरीद लेगा पर ऐसा न हो सका. इन सब के अतिरिक्त बिहार से जुड़े सभी डाक टिकटों का एक संकलन भी प्रकाशित किया है .
शोध कार्यों में श्री रवि संगम जीवन की कुल जमा पूंजी लगा चुके हैं. इधर कुछ दिन पहले मिला तो पाया रामायण सर्किट पर गंभीरता से काम करे रहे है. इन्हीं कारणों से  विवाह नहीं किया.
आंखों में मोतियाबिंद उतर आया है.पांच प्रतिशत  विजिबिलिटी बची है. दिन में भी अकेले सड़क पार करने में कठिनाई है , मित्र छूटते जा रहे हैं ,लोगों से मिलना जुलना कम हो गया है .अपने कमरे में वृद्ध बीमार मां ,कुछ पुरानी किताबें, अपनी रचनाओं ,अखबार की कतरन, और पुराने फोटोग्राफ के बीच कुछ ढूंढते हुए आज भी आपको मिल जाएंगे.