शुक्रवार, 25 सितंबर 2026

पूर्णिया डायरी-28 छियतर का मन्वंतर

 1769–1770 ईस्वी में बिहार, बंगाल और ओडिशा में एक भीषण अकाल पड़ा, जिसे स्थानीय भाषा और संदर्भ ग्रंथों में  छियत्तर का मन्वंतर कहा जाता है। इस आपदा के कारण इस पूरे क्षेत्र की लगभग एक-तिहाई आबादी (करीब 1 करोड़ लोग) भुखमरी और महामारी के कारण काल के गाल में समा गई।​ पूर्णिया ज़िले में इसका प्रभाव सर्वाधिक था। तत्कालीन डिस्ट्रिक्ट सुपरवाइज़र जी. जी. डुकरेल द्वारा भेजे गए आधिकारिक पत्र में उल्लेख किया गया था कि इस अकाल में पूर्णिया की आधी आबादी समाप्त हो गई। बांग्ला संवत 1176 में यह दुर्भिक्ष (अकाल) पड़ा था। यद्यपि 'मन्वंतर' का शाब्दिक अर्थ युग परिवर्तन होता है, किंतु पूर्वी भारत और बंगाल की लोक-भाषा में इसका आशय भीषण अकाल, महामारी अथवा प्रलयंकारी भुखमरी से लिया जाता है।​इस मानवीय त्रासदी के बीच भी पूर्णिया के सुपरवाइज़र जी. जी. डुकरेल और दीवान देवी सिंह ने आपदा में अवसर तलाशा। उन्होंने अनाज की कालाबाज़ारी कर अकूत धन अर्जित किया और रैयतों (किसानों) से अत्यंत बेरहमी से लगान वसूला। यहाँ कंपनी ने शत-प्रतिशत (100%) लगान वसूली की; यहाँ तक कि इस संकट काल में वसूला गया लगान वर्ष 1768 के सामान्य वर्ष में वसूले गए लगान से भी अधिक था।

1 टिप्पणी:

  1. पूर्णिया का 1770 का मन्वंतर
    1770 का भीषण सूखा और फसल-विफलता पूर्णिया में विनाशकारी अकाल में बदल गया। अनाज की कमी और महँगाई से किसान टूट गए; भुखमरी, बीमारी, पलायन और मृत्यु ने अनेक गाँव उजाड़ दिए। तत्कालीन कंपनी अभिलेखों में एक-तिहाई से अधिक आबादी के समाप्त होने का उल्लेख मिलता है।इस अभूतपूर्व त्रासदी को लोकस्मृति में “मन्वंतर” कहा गया—एक ऐसा काल, जब जीवन और सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था दोनों बुरी तरह चरमरा गए।

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