शनिवार, 26 सितंबर 2026

पूर्णिया डायरी-29 : अकाल (1769-1770) और जी. जी. डुकारेल द्वारा भू-राजस्व (लगान) की वसूली.

​1770 में जब डुकारेल पूर्णिया का डिस्ट्रिक्ट सुपरवाइज़र बना, तो उसने लगान वसूली के लिए जिले का ‘हस्त-ओ-बूद’ (Hast-o-bud) तैयार कराया। हस्त-ओ-बूद भू-राजस्व वसूली के लिए खेतों और फसलों के वास्तविक मूल्य का सर्वेक्षण था। इस सर्वेक्षण के आधार पर किया गया नया राजस्व निर्धारण स्थानीय उत्पादन क्षमता से कहीं अधिक था। 

   जब मानसून में बारिश नहीं हुई और अकाल पड़ा, तब इस अवास्तविक राजस्व मांग को बनाए रखने के लिए अतिरिक्त सेस (Cess), अबवाब और उपकर लगाए गए। इसने किसानों को भुखमरी और दरिद्रता के कगार पर लाकर छोड़ दिया। पलायन के अलावा उनके पास कोई विकल्प नहीं बचा। यही कारण है कि जहाँ बिहार, बंगाल और उड़ीसा में इस अकाल में लगभग एक-तिहाई आबादी काल-कवलित हुई, वहीं पूर्णिया में करीब आधी आबादी की मौत हो गई।

     ​कंपनी ने प्रत्यक्ष राजस्व वसूली के लिए देवी सिंह को दीवान और इज़ारेदार (Revenue Farmer) नियुक्त किया। डुकारेल ने कई प्रमुख परगनों—जैसे हवेली पूर्णिया और धरमपुर—का वित्तीय प्रबंधन उसके हाथों में सौंप दिया। डुकारेल के संरक्षण में देवी सिंह ने पूर्णिया में राजस्व वसूली को इस तरह संचालित किया कि स्थानीय जमींदार और आम रैयत पूरी तरह असहाय हो गए। किसी भी घाटे की भरपाई के लिए ‘आकस्मिक प्रभार’ (Occasional Charges) के नाम पर अतिरिक्त वसूली की जाने लगी।

​1770 के अकाल में जब पूर्णिया की आधी भूमि बंजर (Fallow) हो गई, तब जी. जी. डुकारेल के संरक्षण में देवी सिंह और कंपनी के अमले ने सरकारी मांग को पूरा करने के लिए 'नजाए' (Najay) जैसा क्रूर उपकर लगाया। मूल लगान में छूट देने के बदले जीवित बचे किसानों पर 'माथुत' (Math-hoot) जैसे क्रूर उपकर की दरें बढ़ा दी गईं। स्थानीय बही-खातों में इसे ‘माथौत परगना’ और ‘रशूम’ के तहत दर्ज किया गया। माथौत एक आनुपातिक कर था, जो मूल लगान (असल) पर इसलिए लगाया जाता था ताकि अप्रत्याशित घाटों की भरपाई की जा सके या उन प्रांतीय/स्थानीय खर्चों को पूरा किया जा सके जो नियमित बंदोबस्त में शामिल नहीं थे।

​नजाए और माथौत जैसे उपकरों ने पूर्णिया के किसानों, रैयतों और जमींदारों को दरिद्रता के कगार पर लाकर खड़ा कर दिया। अकाल और महामारी के बाद जो लोग जीवित बच गए, वे इन करों के दबाव में मोरंग के जंगलों और आसपास के इलाकों में पलायन कर गए तथा साधुओं के साथ रहने लगे। इससे सन्यासियों की संख्या में भारी वृद्धि हुई, जिसने आगे चलकर 'संन्यासी विद्रोह' की पूर्व-पीठिका तैयार की।

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