पूर्णिया के पहले डिस्ट्रिक्ट सुपरवाइजर गेरार्ड गुस्टावस डुकरेल द्वारा 1769–1770 के अकाल वाले वर्ष में रैयतों पर 'नजाय' जैसा क्रूर भू-राजस्व उपकर लगाया गया।
नजाय मुगल काल में कभी-कभार गांव के राजस्व के साझा नुकसान की भरपाई के लिए एक स्थानीय परंपरा के रूप में लगाया जाने वाला उपकर था। लेकिन 1770 में पूर्णिया के अकाल के दौरान डुकरेल के निर्देश पर दीवान देवी सिंह और कंपनी के अमलों ने इस बेहद क्रूर और दमनकारी उपकर की वसूली की। नजाय सामूहिक दंड के सिद्धांत पर आधारित था।
ब्रिटिश राजस्व तंत्र में प्रत्येक गांव या परगने का एक निश्चित लगान (जमा) तय होता था। अकाल या महामारी में जब गांव के किसान मर जाते या अपनी जमीन छोड़कर भाग जाते थे (जिन्हें पलातक या फरारी रैयत कहा जाता था), तब कंपनी तय राजस्व में कोई कमी नहीं करती थी। मृत या भाग चुके रैयतों के हिस्से का लगान गांव के जीवित किसानों पर अतिरिक्त अधिभार के रूप में आनुपातिक ढंग से बांट दिया जाता था। इसी जबरन वसूली को 'नजाय' कहते थे। जब यह कर वसूला जाने लगा, तो गांव-के-गांव वीरान (depopulated) होने लगे। आधी आबादी तो पहले ही अकाल और महामारी के कारण काल-कवलित हो चुकी थी।
अप्रैल 1770 में डुकरेल ने मुर्शिदाबाद काउंसिल के रेजिडेंट रिचर्ड बीचर को पत्र भेजकर स्पष्ट किया कि
" हवेली पूर्णिया, धर्मपुर और आसपास के इलाकों में लगभग आधी आबादी काल-कवलित हो गई है। राजस्व के घाटे को रोकने के लिए परगना स्तर पर आमिल और चौधरी 'नजाय' की पद्धति का सहारा ले रहे हैं, जिससे जीवित रैयतों पर पलायन कर चुके और मृत रैयतों का लगान लादा जा रहा है।"
1770–1771 में पूर्णिया मुर्शिदाबाद काउंसिल के अधीन था। काउंसिल के रिकॉर्ड में पूर्णिया के भू-राजस्व खातों में नजाय को बाकायदा एक लेखा मद के रूप में दर्ज किया गया था।
पूर्णिया के विभिन्न परगनों, विशेषकर धर्मपुर, सुल्तानपुर और ताजपुर के रैयतों ने 'कमेटी ऑफ सर्किट' के समक्ष लिखित आपत्ति और गवाही दी कि अकाल के दौरान डुकरेल, उनके दीवान राजा देवी सिंह और उनके शिकदारों ने न केवल उनका उपजाया हुआ अनाज छीना, बल्कि गांव के जो किसान भूख से मर गए थे, उनकी जमीन का बकाया लगान नजाय के रूप में जीवित बचे किसानों से लाठियों के बल पर वसूला। इस वसूली ने पूर्णिया की आधी से अधिक कृषि योग्य जमीन को बंजर में तब्दील कर दिया और यहां की परंपरागत कृषि व्यवस्था पूरी तरह से ध्वस्त हो गई।
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