मंगलवार, 19 जुलाई 2016

मुजफ्फरपुर डायरी (Muzaffarpur diary)

मुजफ्फरपुर चतुर्भुज स्थान के इतिहास और इसके गुमनाम पात्रों से रु-ब-रु कराती 'कोठागोई ' इतिहास और साहित्य के बीच की कोई चीज है. इसमें लेखक ने कंही भी पात्रों के काल्पनिक होने की बात नहीं कही है.

इतिहास में साहित्य और साहित्य में इतिहास रचने की कोशिश में लेखक ने किसी विषय के साथ न्याय नहीं किया है. परन्तु यह भी सच है कि किसी छोटे शहर के एक मोहल्ले को लेकर कथा श्रृंखला लिखने की परम्परा हिंदी साहित्य में नहीं है, वह भी गुमनाम पात्रों पर शोध कर. गत बीसेक वर्षों के साहित्य पर नजर डालें तो 'काशी का आस्सी' छोडकर किसी और पुस्तक ने लोगों का ध्यान नहीं खीचा, जो शहर के मुहल्ले विशेष को केंद्र में रखकर लिखी गयी हो.
उपन्यास रूप में भारत के सन्दर्भ में लिखी गयी सबसे महत्वपूर्ण पुस्तक 'फ्रीडम एट मिडनाइट ' (जिसका हिंदी संस्करण राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित हुआ) है. यह विशुद्ध इतिहास की पुस्तक है, जिसमें सन १९४७, १९४८ के इतिहास और उस कालखंड के पात्रों को केंद्र में रखकर लिखी गयी है. इतिहास का ए बी सी डी नहीं जानने वाले पाठक भी इसे उतने ही आनन्द के साथ पढ़ेगे जितना की इतिहास का एक शोधार्थी . भारतीय इतिहास की इससे रोचक कोई पुस्तक मैंने आज तक नहीं पढ़ी.

         एसी ही रम्यता की कुछ अनुभूति 'कोठागोई' पढ़ते समय भी होती है. यदि पात्र और घटनाओं को तिथियों और संदर्भ सूचि के साथ लिखा जाता तो इतिहास के विद्यार्थी भी पढ़ते. भारत में क्षेत्रीय इतिहास लिखने की परम्परा दुर्भाग्य से अबतक विकसित नहीं हुई है. बिहार में डा० कालिकिंकर दत्त साहब ने कई खंडों में 'बिहार का इतिहास' लिखकर यह परम्परा प्रारम्भ की थी. इसके स्त्रोत सामग्री देखने से ज्ञात होगा कि 'कोठागोई' जैसी पुस्तक भी एक जबरदस्त स्त्रोत सामग्री बन सकती थी. बशर्ते कि इसमें स्थान पात्र और घटनाओं को प्रमाणिक ढंग से प्रस्तुत किया जाता. 
 डा० दत्त के जाने के बाद बिहार में क्षेत्रीय इतिहास लेखन की परम्परा शिथिल पड़ गई. परन्तु जब भी यह परम्परा पुनर्जीवित हो विकसित होगी, इस तरह की पुस्तकों का प्रयोग स्त्रोत सामग्री के रूप में होगा . अत: एसी पुस्तकों की रचना में लेखक को हमेशा सचेत रहना चाहिये .  


                         कोठागोई की कहानियाँ रसमय हैं. कथा-रस जो कहानियों से विदा हो चुका है; की वापसी का एहसास दिलाता है, वही कथा-रस जो पाठकों को अंत तक बांध कर रखता था . कोठागोई को बिना अधोपांत पढ़े पाठक नहीं रह सकते. यही कथाकार की सफलता है.
(कोठागोई- लेखक प्रभात रंजन)  

शुक्रवार, 15 जुलाई 2016

पटना डायरी - 2 (patna diary-2 /patna in scotland/Diaries Of Three Surgeon In Patna')

स्कॉटलैंड के  केर्रिक और कयी जिले के इस्टरसायर में एक गांव है पटना . यह बिहार के पटना से दस हज़ार कि.मी. और लन्दन से छह सौ कि.मी. की दूरी पर है. इसे विलियम फुल्लार्तों ने १८४६  इस्वी में बसाया था. यह दून नदी के किनारे बसा है. यंहा पटना स्कूल और दून अकादमी भी है.
                         यह गाँव २०१२ में तब भारतीय समाचार पत्रों में चर्चा में आया जब इंग्लैंड में पढ़े बिहार के तत्कालीन मंत्री श्री नीतीश मिश्रा ने वहां भ्रमण का कार्यक्रम बनाया. एक समाचार पत्र ने स्कॉटलैंड के इतिहासकार जॉन मूर के हवाले से लिखा की  विलियम फुल्लार्तों का जन्म बिहार के पटना में हुआ था . जन्म स्थान से प्रेम के कारण ही स्कॉटलैंड में पटना बसाया. पर यह प्रमाणिक तथ्य नहीं है. इसमें और शोध किये जाने की आवश्यकता है. इतना आवश्य  है की विलियम फुल्लार्तों ,उनके परिवार या उनके पिता का सम्बन्ध पटना से रहा है.
    पटना में  १७६७ इस्वी में जब इस्ट इंडिया कंपनी के एजेंट, सैन्य अधिकारी और प्रसाशनिक अधिकारी पलासी के जीत की वर्षगांठ मना रहे थे. तो मीर कासिम ने पटना की घेराबंदी कर इन्हे कैद कर लिया . कई महीने कैद में रखने के बाद दिसम्बर में उनकी हत्या कर दी गयी जो इतिहास में patna massacre   से प्रसिद्ध है. कैद के दौरान तीन लोगों ने अपनी डायरी में इस कैद की दास्ताँ दर्ज की . जिसे लगभग १५० साल बाद W.K.Ferminger ने''Dayries Of Three Surgon In Patna''  शीर्षक से प्रकाशित किया .patna massacre के बाद सिर्फ एक व्यक्ति बचे जो इसके चश्मदीद गवाहों में से एक थे. इनका नामWilliam Fullarton of Fullarton था. ये स्कॉटलैंड में पटना बसने वालेविलियम फुल्लार्तों के पिता थे.

रविवार, 10 जुलाई 2016

बेतिया डायरी : bettiah /west champaran dayri

                                 
सज्जाद लाईब्रेरी
                                                     पश्चिमी चम्पारण के बेतिया शहर की सज्जाद लाईब्रेरी अपनी दुर्दशा पर रो रही है.  किताबों की तो बात ही छोड़ दीजिए, हक़ीक़त तो यह है कि यह पूरी लाईब्रेरी ही बिल्डिंग सहित ग़ायब है.
       आज़ादी की लड़ाई के इतिहास से जुड़ी ये ग़ायब लाईब्रेरी फ़िलवक़्त खुद ‘सियासत’ की बेड़ियों में जकड़ी हुई है. मुसलमानों के नाम पर नाइंसाफ़ी का रोना रोने वाले मुसलमानों के ठेकेदारों से लेकर सूबे के हुक्मरानों और तमाम बुद्धिजीवियों तक किसी को इसके हालात पर ग़ौर करने की फुर्सत नहीं है.
दरअसल, 1937 में मुस्लिम इंडीपेंडेंट पार्टी के गठन के साथ ही शहर के अहम दानिश्वरों के साथ मिलकर मौलाना अबुल मुहासिन मो. सज्जाद ने इस लाईब्रेरी की स्थापना की बात की. 1939 में बेतिया के इस सज्जाद पब्लिक उर्दू लाईब्रेरी को शुरू कर दिया गया. इस लाईब्रेरी की बुनियाद डालने वालों में मौलाना असदुल्लाह महमुदी और डॉक्टर रहमतुल्लाह का नाम ख़ास तौर पर लिया जाता है. सच पूछे तो इस लाईब्रेरी का एक बेहद समृद्ध इतिहास रहा है, जो अब वक़्त की धूल-गर्द के आगे बेबस होकर घुटने टेक चुका है. सबसे अफ़सोस की बात ये है कि यहां किसी को इस लाईब्रेरी को जीवित करने का ख़्याल तक नहीं है.
अब्दुल ख़ैर निश्तर बताते हैं कि आज़ादी से पहले ये लाईब्रेरी बुद्धिजीवियों, लेखकों, साहित्यकारों और स्वतंत्रता आंदोलन में शामिल लोगों की वैचारिक बहसों का केंद्र हुआ करती थी. 1939 से यह लाईब्रेरी 1964 तक लगातार चलती रही. 1965 में यह लाईब्रेरी बंद हो गई. दुबारा 1972 में शहर के कुछ नौजवान डॉक्टर अब्दुल वहाब की सरपरस्ती में इस लाईब्रेरी को शुरू किया. उसके बाद 1995 तक यह लाईब्रेरी किसी तरह से चलती रही. 1996 में यह लाईब्रेरी पूरी तरह से ख़त्म हो गई.
वो बताते हैं कि ख़त्म होने की एक वजह यह भी है कि लाईब्रेरी के नीचे एक एक मुसाफिर खाना था. इसी मुसाफिर खाना को यहां के दुकानदारों ने अपना गोदाम बना दिया. इसी में जरनेटर रख दिया गया. इस जनरेटर के चलने की वजह से पूरी बिल्डिंग हिलने लगी. छत से बरसात के मौसम में पानी गिरने लगा. जिससे ज़्यादातर किताबें सड़ गई या धीमक लग गया.
इस लाईब्रेरी मजीद खान के मुताबिक़ मस्जिद कमिटी ने इस बिल्डिंग को यह कहकर तोड़ दिया कि इसे दुबारा से तामीर करवाया जाएगा. लेकिन आज मुसाफ़िर खाना तो बन गया, लेकिन लाईब्रेरी अभी तक नहीं बन सकी.
बताते चलें कि इस लाईब्रेरी में तक़रीबन 8 हज़ार से उपर उर्दू, हिन्दी, पाली, फारसी व अरबी में महत्वपूर्ण किताबें थी. सैकड़ों पाण्डुलीपियां भी यहां मौजूद थीं. उस समय के तमाम मशहूर अख़बार व रिसाले जैसे सर्च लाईट, इंडियन नेशन, आर्यावर्त, सदा-ए-आम, संगम, शमा, फूल आदि इस लाईब्रेरी में आते थे. दूर-दूर से लोग यहां पढ़ने आते थे. इब्ने शफ़ी की सभी सीरिज़ इस लाईब्रेरी में मौजूद थी. इसके अलावा जासूसी नॉवेल की यहां भरमार था. लेकिन बंद होने के बाद अधिकतर किताबें सड़ गईं. जो महत्वपूर्ण किताबें थी, शहर के दानिश्वर उसे अपने घर लेकर चले गए. हज़ारों किताबें ज़मीन खोदकर दफन कर दिया गया. कुछ किताबें अभी बगल के जंगी मस्जिद में सड़ रही हैं और उसे देखने वाला कोई नहीं है.
सच पूछे तो कारोबारियों ने पहले से ही इसकी शक्ल व सूरत तबाह करने की साज़िश तैयार कर ली थी. बाक़ायदा इस लाईब्रेरी के नीचे एक मुसाफ़िर-खाने में जनरेटर रखकर इसके दरों-दिवार को कमज़ोर किया गया और उसके बाद इसके ख़ात्मे में कारोबारी फ़ायदा पहुंचने की गुंजाईश ढ़ूंढ़ी गई.
अब फिर से इस लाईब्रेरी को ज़िन्दा करने के लिए शहर के कुछ नौजवान उठे हैं. लेकिन इन नौजवानों की शिकायत है कि इस वक़्फ़ प्रोपर्टी के मतवल्ली अपने व्यावसायिक फ़ायदे के लिए लाईब्रेरी के दुबारा स्थापित करने में रूकावट डाल रहे हैं.
वहीं इस संबंध जब मतवल्ली मो. रेयाजुद्दीन से बात की तो उनका कहना है कि उन्हें लाईब्रेरी बनने से उन्हें कोई समस्या नहीं है. लेकिन ज़िम्मेदारी लेने वाले लोग उन्हें यह गारंटी दें कि वो लाईब्रेरी को हमेशा चलाएंगे, क्योंकि पिछला अनुभव काफी बुरा रहा है. लाईब्रेरी कमिटी के लोगों को सैकड़ों बार कॉल करने के बाद भी उन्होंने लाईब्रेरी की किताबों के बचाने की कोई पहल नहीं की.
वहीं यहां मस्जिद कमिटी से जुड़े युवा सामाजिक कार्यकर्ता आसिफ़ इक़बाल बताते हैं कि हम सब चाहते हैं कि यह ऐतिहासिक लाईब्रेरी फिर से स्थापित हो, ताकि क़ौम के अहम दस्तावेज़ों व धरोहरों को फिर से सहेजा जा सके.
वो बताते हैं कि मस्जिद कमिटी इसके तैयार है, लेकिन पुरानी लाईब्रेरी कमिटी को थोड़ा पहल करना होगा. इसके एक बैठक होनी चाहिए, ताकि एक नई कमिटी का गठन किया जा सके. इस बैठक के लिए हम प्रयासरत हैं.
उन्होंने यह भी बताया कि यहां के कुछ व्यवसायी इस कोशिश में लगे हैं कि यह लाईब्रेरी न खुले, बल्कि इसे व्यवसायिक कार्य में इस्तेमाल कर लिया जाए.


सच पूछे तो एक ज़माने में ईल्म और तालीम की केन्द्र रही ये जगह अब व्यावसायिक नफ़े-नुक़सान की पैमाईश बन कर रह गई है. क़ौम के झंडाबरदारों इसमें बिल्कुल भी दिलचस्पी नहीं है. मुनाफ़ा कमाने और कारोबार बढ़ाने वाला तबक़ा यहां पर एक मलाईदार गोदाम की संभावना तलाश रहा है, जो उनके कारोबारी हितों की पुर्ति कर सके. यहां के तथाकथित क़ौमी रहनुमाओं व सियासतदानों को इस लाईब्रेरी का इतिहास क्या, बल्कि इसके वर्तमान नावाक़िफ़ है. कुल मिलाकर इतिहास की ये महान ईबारत अपनी आंखों के सामने ही अपने ख़ात्मे ईबारत की गवाह बन चुकी है.
(http://www.champaranpost.com/ पर Afroz Alam Sahil की टिपण्णी से साभार ) 

गुरुवार, 7 जुलाई 2016

बोधगया डायरी :Bodhgaya Diary

One of the places which I frequented as many times as I went to the Mahabodhi temple is a bookshop called Middle Way Bookshop. Most of the time, I found an American Baha'i sadhu, James, sitting there. He donates his time to the shop. James declined to be photographed. James is a very interesting conversationalist. More on him later.
The Middle Way bookshop, located just outside the Mahabodhi temple in what is known as Main Market Bodhgaya is an extremely well stocked bookshop. It had around 15000 titles on Buddhsim, Indology and also some general books. Most delightful part of the shop is that the persons looking after the shop are very knowledgable. As my old student and friend Ambuj Anand pointed on one of our visits, when I was looking for a book on Prakrit, James just pointed to the right place in one go and also knew the colour of the book. And this is despite the fact that Prakrit is much less common in a bookshop devoted to Buddhism.
The bookshop is owned by a genial soul, called Shahabuddin. Again a walking encyclopaedia on books about Buddhism. A Bodhgaya local, Shahabuddin worked for many years as a volunteer in the bookshop of Mahabodhi Society of India before starting the bookshop around 20 years back. And named it after a book, The Middle Land and the Middle Way, by an Australian author, Sravasti Dhammika, who is also a friend of his.
It is a Niyamat or blessing to have such a bookshop in contemporary times. And with such knowledgeable people looking after it.
Whenever I visited the shop, it was also a shelter to many dogs and also a goat who, James thought, thinks of herself as a dog and hangs around with them.:-))
(विद्यानंद झा जी के फेसबुक वाल पर बोधगया के एक अनछुए पहलु पर लिखी गयी टिपण्णी से साभार  )

सोमवार, 9 मई 2016

पूर्णिया डायरी (purniya dayri)- 5

(२००५ में मै पूर्णिया के सिकलिगढ़ और मौर्य कालीन स्तम्भ मनिकथ्म्ब पर काम कर रहा था. एक दिन एक पत्रकार महोदय ने मुझसे मिलने की इच्छा व्यक्त की. अगले दिन मिले इतिहास कला और संस्कृती में इनकी गहरी दिलचस्पी थी. पुरानी डायरी छुट्टी के दिन उलट रहा था, उनका फोन नंबर था लगाया , बात हुई लगभग दस साल बाद . दोस्ती हरी हो गयी. आज भी उतने ही जीवंत और उर्जावान . शाहनवाज अख्तर आजकल रांची में है. पूर्णिया के स्थापना दिवस से जुड़ा संस्मरण जो उनके फेसबुक वाल पर है उसे ही यथावत रख रहा हूँ.)

14 फरवारी को पूरी दुनिया प्यार दिवस के रूप में मनाती है...मगर 14 फरवरी बिहार के पूर्णिया ज़िले का जन्म दिवस है...14 फ़रवरी1770 को एक नौजवान अँगरेज़ कलेक्टर मिस्टर डुकरेल ने पूर्णिया के सबसे पहले कलेक्टर के रूप में पदभार संभाला था...2008 से पहले ये बात किसी को मालूम नहीं थी...बिहार सरकार ने ज़िलों के आस्थापन दिवस मनाए जाने का निर्देश तमाम ज़िलों को दिया.ये आदेश पूर्णिया भी पहुंचा....तत्कालीन कलेक्टर श्रीधर चेरुबोलु....ने इतिहास के रिटायर्ड प्रोफेसर डॉक्टर रामेश्वर प्रसाद से आग्रह किया की पूर्णिया ज़िले का जन्म दिवस इतिहास की रौशनी में तै कर के बताएं....उस महत्वपूर्ण बैठक में एक पत्रकार के तौर पर मैं भी मौजूद था और मेरे सहयोगी और पराम् मित्र राजेश कुमार शर्मा भी मौजूद थे....हम मीडिया कमिटी में थे.......डॉ रामेश्वर प्रसाद ने लगभग भूमिगत होकर अपनी रिसर्च शुरू कर दी...यहां तक की हम से भी मिलना गवारा नहीं किया....कहला भेज की अभी डिस्टर्ब न किया जाए जब वो किसी नतीजे पे पहुँच जाएंगे तो सब से पहले मुझे ही बताऐंगे.....कई हफ़्तों में मेरी बड़ी जिज्ञासा रही की पूर्णिया की जन्म तिथि कब ठहरेगी....और एक दिन डॉ साहेब का सुबह सुबह फ़ोन आ ही गया की आ जाइये....और जब मैं उनके पास पहुंचा तो उनकी शक्ल देख कर हैरान रह गया...बिलकुल सद्दाम हुसैन जैसे लग रहे थे...यानी सद्दाम हुसैन जिस हुलिए में गिरफ्तार हुए थे....उनकी शक्ल भी वैसी ही लग रही थी...अपनी लाइब्रेरी में किताबों काग़ज़ों से घिरे...डॉ रामेश्वर प्रसाद ने ख़ुशी ख़ुशी ये खुशखबरी दी की पूर्णिया के बर्थडे का पता चल गया...उन्हों ने वो लैटर दिखाया जिस में मिस्टर डुकरेल को पूर्णिया के कलेक्टर का चार्ज लेने का आदेश लिखा था...उसपर तारीख 14 फरवरी 1770 लिखी थी.....14 फरवरी 1770 को चार्ज लेने वाले...डुकरेल की उम्र उस वक़्त 22 साल की थी......नौजवान ख़ूबसूरत और बेहद रहमदिल अँगरेज़ अफसर ने एक अकाउंट में लिखा है...की जिस ज़माने में उसने पूर्णिया की ज़िम्मेदारी संभाली उस पूरे इलाके में कहत यानी फेमिन फैला हुआ था....हर 50 क़दम पर किसी न किसी इंसान और जानवर की लाश पड़ी होती थी...डुकरेल को 15 दिन तो लाशें ही उठवाने में लग गए.......एक दिन जलालगढ के पास के एक गाँव से ये खबर मिली एक गाँव में एक आदमी की भूख से मौत हो गयी है..जिसकी शादी हाल ही में हुई थी.....विधवा स्त्री ने सति होने की ठान ली है....और गाँव में सति प्रथा के मुताबिक साड़ी तैयारयांं भी हो चुकी है...विधवा चिता पर बैठ भी चुकी है......कलेक्टर डुकरेल ने तेज़ रफ़्तार में गाडी चलते हुए उस गाँव में चलने का हुक्म ड्राईवर को दिया....डुकरेल जब गाँव पहुंच तो मैदान में भीड़ जमा थी......कलेक्टर के साथ पुलिस भी थी...डुकरेल ने महिला से चिता के साथ न जलने की अपील की मगर वो महिला तैयार नहीं हुई...लंबी बहस चली....उस महिला ने कलेक्टर से सवाल पुछा के वो किस के सहारे जिएगी....कौन उससे दोबारा शादी करेगा.....मजमा खामोश रहा.....तभी डुकरेल ने बुलंद आवाज़ में कहा मैं करूँगा तुमसे शादी........कुछ तर्क वितर्क के बाद महिला चिता से उतर आई......और डुकरेल ने अपना वादा निभाते हुए उस महिला से शादी कर ली.....और डुकरेल कई सालों तक पूर्णिया के कलेक्टर बने रहे...जलालगढ के पास आज भी डकरैल नाम का एक गाँव है..ये वहीँ गाओं है..जो डुकरेल की ससुराल भी है.....और फिर उनका कलकत्ता तबादला हो गया......डॉ रामेश्वर प्रसाद के शोध के मुताबिक कालांतर में डुकरेल कलकत्ता से लंदन और फिर वहाँ से अमेरिका चले गए...मशहूर बर्ड विशेषज्ञ डॉ सालिम अली ने अपनी किताब में डुकरेल परिवार की एक 100 साल बुज़ुर्ग एक महिला से मुलाक़ात का ज़िक्र किया है.....जो पूर्णिया की रहने वाली थी....और डॉ सालिम अली को उसने अमेरिका में चूड़ा और मूढ़ी के साथ साग खिलाया था और कहा था की ये मेरे देस का खाना है...और मुझे भी बेहद पसंद है...डुकरेल परिवार अमेरिका में आज भी बेहद धनि परिवारों में शुमार होता है..उनके वहाँ 300 से भी ज़्यादा पेट्रोल पम्पस हैं...डॉ रामेश्वर प्रसाद को डुकरेल के पड़पोते ने पात्र भी लिखा था और पूनिया आने की ख्वाहिश भी जताई थी......पूर्णिया का इतना दिलचस्प इतिहास बताने वाले डॉ रामेश्वर प्रसाद का दिल से धन्यवाद करता हूँ 8 सा हो गए उनसे नहीं मिला पता नहीं कैसे होंगे....अल्लाह से दुआ है की वो स्वस्थ हों....मेरे वतन से जुड़ा हर पहलु हर आमो ख़ास मुझे बेहद अज़ीज़ है......14 फ़रवरी को जब पहला आस्थापन दिवस मनाया गया था तो उस समय सभी पूर्णिया वासी को ख़ुशी हुई थी....मेरे आदरणीय भैया विजय श्रीवास्तव जी..अक्सर मुझे फ़ोन कर उन दिनों की याद दिल दिया करते हैं....रेनू माटी...से जुड़े तमाम लोग और तमाम पूर्णिया वासिओं को मेरी और से आस्थापन दिवस की ढेरों बधाइयाँ.....

शुक्रवार, 1 जनवरी 2016

जहानाबाद डायरी-3 (Jehanabad / jahanabad dayri - 3 )

. ( 'दामुल ' के पच्चीस वर्ष पूरे होने पर कथाकार शैवाल के साक्षात्कार का अंश . जिसपर जहानाबादवासी गर्व कर सकते है)

" दरअसल मेरे साहित्यिक जीवन में मेरा कोई गुरु नहीं बल्कि जहानाबाद जिला और वहां के अति पिछड़ा घोसी ब्लाॅक के लोगों को, परिवेश को ही मैं अपना गुरू मानता हूं. मैं सरकारी नौकरी में सबसे ज्यादा दिन 1972-80 तक उसी इलाके में रहा. उन दिनों ‘रविवार’ पत्रिका में गांव काॅलम लिखा करता था. मैंने इस इलाके से एक रिपोर्ट लिखी-जमींदारों द्वारा जानवरों की चोरी करवाने की व्यवस्था यानि पनहा सिस्टम पर. देश भर से प्रतिक्रिया मिली. बाद में मैंने उसी रिपोर्ट को एक्सटेंड कर ‘ कालसूत्र’ नाम से कहानी लिखी तो हिंदी जगत में उसे नोटिस लिया गया. प्रकाश झा उन दिनों संघर्ष कर रहे थे. बिहारशरीफ में दंगा छिड़ा तो उस पर डोक्यूमेंट्री बनाने के लिए प्रकाश झा यहां आये. उन्होंने ‘फेसेज आफ्टर द स्टाॅर्म’ नाम से डोक्यूमेंट्री बनाने के क्रम में मुझसे संपर्क किया. तब मैंने बिहारशरीफ दंगे पर कुछ कविताएं लिखी थीं. प्रकाश झा ने अपने डोक्यूमेंट्री में उन कविताओं के इस्तेमाल की इजाजत मांगी.
हमारे संबंध बने.उसके बाद प्रकाश झा ने ‘कालसूत्र’ पर फिल्म बनाने की बात मुझसे कही और यह भी कहा कि इस पूरी कहानी को मैं आपके नजरिये से देखना चाहता हूं.
(शैवाल )
मैंने स्क्रिप्ट पर काम शुरू किया. फिर जो फिल्म बन ीवह तो सबके सामने आयी ही "
फिल्म को इस लिंक पर देख सकतेहैं
.https://www.youtube.com/watch?v=YNPi9FLtxPw


शनिवार, 19 दिसंबर 2015

मधुबनी डायरी (Madhubani dayri)

भौडागढी, तिरहुत सरकार की पहली राजधानी थी और करीब 200 साल तक तिरहुत की सत्‍ता यहीं से चलती थी। दरभंगा प्रमंडल के मधुबनी जिले में भौडागढी एतिहासिक और पुरात्‍वविक महत्‍व का अदभुत केंद्र है। भारत में खंडवाला राजवंश को छोड कर किसी राजवंश के पास यह आधिकारिक जानकारी नहीं है कि उसका पहला डीह कौन सा है। तिरहुत सरकार की पहली राजधानी भौडागढी का इतिहास अब तक अनजाना सा ही है। मुगल बादशाह ने मिथिला के गरीब पंडित महेश ठाकुर को तिरहुत का राज 1556 के आसपास दिया था, लेकिन महेश ठाकुर जब तक राज पाट समझते 1558 में उनका निधन हो गया। उनके बाद उनके बडे पुत्र गोपाल ठाकुर राजा बने, लेकिन वो भी अधिक दिनों तक राज नहीं कर सके और उनका भी जल्‍द ही निधन हो गया। वे नि:संतान थे, इसलिए महेश ठाकुर के दूसरे बेटे परमानंद ठाकुर को सिंहासन मिला, लेकिन इन्‍हें भी पुत्र नहीं हुआ और अल्‍पआयु में ही निधन हो गया। इसके बाद तीसरे और चौथे पुत्र ने राजा बनने से इनकार कर दिया और महेश ठाकुर के सबसे छोटे बेटे शुभंकर ठाकुर राजकाज संभालने को तैयार हुए। इसी दौरान उन्‍हें डीह बदलने की सलाह मिली और वो भौडग्राम(राजग्राम) से भौडागढी आ गये और यहां अपनी नूतन राजधानी बनायी। उन्‍होंने राज में लगान को नियमित करना शुरु किया और आसपास के राजवारे सक्रिय होने लगे। 1607 में उनके निधन के बाद पुरुषोत्‍तम ठाकुर पिता की जगह राजा बने। 1623 में पडोसी राज्‍य नेपाली ने तिरहुत पर आक्रमण कर दिया। इस दौरान तिरहुत सरकार पुरुषोत्‍तम ठाकुर वीरगति को प्राप्‍त हुए। खंडवाला कुल में वो अकेले राजा हैं, जो युद्ध के दौरान मारे गये। पुरुषोत्‍तम ठाकुर के बेटे नारायण ठाकुर और फिर रघु ठाकुर तिरहुत के सिंहासन पर बैठे। 1700 से 1736 के दौरान रघु ठाकुर ने तिरहुत की न केवल सीमा विस्‍तार किया, बल्कि भौडागढी में महल और किले का भी निर्माण कराया। वर्तमान महल उसी नींव पर बना है। कहा जाता है कि यह बिहार में जमीन के ऊपर बना सबसे पुराना महल है। इसकी नींव तो 1736 के पूर्व की है, लेकिन इसका वर्तमान स्‍वरूप भी 1880 के आसपास का है। वैसे 1762 में राजा प्रताप सिंह ने तिरहुत की राजधानी भौडागढी से दरभंगा ले आये। वैसे राजा नरेंद्र सिंह ही दरभंगा में सिंहासन ले जाने की मंजूरी दे चुके थे। दरअसल राजा नरेंद्र सिंह संतानहीन थे और प्रताप सिंह को उन्‍होंने गोद लिया था। ऐसे में प्रताप सिंह के लिए नयी राजधानी दरभंगा का चयन किया गया। राजा नरेंद्र सिंह के साथ ही भौडागढी का भी राजनीतिक समाधि हो गयी। दरभंगा के राजधानी बनने के ठीक 200 साल बाद 1962 को खंडवाला राजवंश के आखिरी राजा कामेश्‍वर सिंह का निधन हो गया। भौडागढी में 110 एकड में फैला राज महल के अलावा खंडवा से लायी गयी काली की प्रतिमा है। साथ ही 20वीं शताब्‍दी में यहां एक छोटा सा एयरपोर्ट का भी निर्माण कराया गया था। सब कुछ मरनासन्‍न है। बिहार सरकार ने इस अनुपम धरोहर को संरक्षित करने के बदले यहां पुलिस लाइन खोल रखा है और इस जर्जर महल में करीब 400 जवान रहते हैं। बाकी तसवीरों के साथ एक दो दिनों में ।


महल के कैफेटेरिया का हाल देखकर कोई भी संजीदा हो जायेगा, लेकिन स्‍थानीय लोग इसे देखने ही नहीं जाते।



भौडागढी स्थित राज महल का दरबार हॉल। सोने का पानी चढा इसका फाल्‍स सिलिंग आज काला पड चुका है, दीवारें रो रही हैं।





भारत में खंडवाला राजवंश को छोड कर किसी राजवंश के पास यह आधिकारिक जानकारी नहीं है कि उसका पहला डीह कौन सा है। तिरहुत सरकार की पहली राजधानी भौडागढी का इतिहास आप लोगों तक पहुंचाने की कोशिश में लगी हूं। महेश ठाकुर को तिरहुत का राज 1554 के आसपास मिला। महेश ठाकुर का निधन 1558 में हो गया। उनके बाद उनके बडे पुत्र गोपाल ठाकुर राजा बने, लेकिन वो नि:संतान थे, इसलिए दूसरे भाई परमानंद ठाकुर को सिंहासन मिला, लेकिन इन्‍हें भी पुत्र नहीं हुआ और अल्‍पआयु में ही इनका निधन हो गया। इसके बाद तीसरे और चौथे पुत्र ने राजा बनने से इनकार कर दिया और महेश ठाकुर के सबसे छोटे बेटे शुभंकर ठाकुर राजकाज संभालने लगे। इसी दौरान उन्‍हें डीह बदलने की सलाह मिली और वो भौडग्राम(राजग्राम) से भौडागढी आ गये और यहां अपनी नूतन राजधानी बनायी। 1607 में उनके निधन के बाद पुरुषोत्‍तम ठाकुर पिता की जगह राजा बने। 1623 में नेपाली आक्रमण के दौरान तिरहुत सरकार पुरुषोत्‍तम ठाकुर वीरगति को प्राप्‍त हुए खंडवाला कुल में वो अकेले राजा हैं जो युद्ध के दौरान मारे गये।पुरुषोत्‍तम ठाकुर के बेटे नारायण ठाकुर और फिर रघु ठाकुर तिरहुत के सिंहासन पर बैठे। 1700 से 1736 के दौरान रघु ठाकुर ने तिरहुत की न केवल सीमा विस्‍तार किया, बल्कि भौडागढी में महल और किले का भी निर्माण कराया। वर्तमान महल उसी नींव पर बनी हुई है। यह बिहार में जमीन के ऊपर बना सबसे पुराना महल है। इसकी नींव तो 1736 के पूर्व की है, लेकिन इसका वर्तमान स्‍वरूप भी 1880 के आसपास का है। वैसे 1762 में राजा प्रताप सिंह तिरहुत की राजधानी भौडागढी से दरभंगा ले आये। वैसे राजा नरेंद्र सिंह ही दरभंगा में सिंहासन ले जाने की मंजूरी दे चुके थे। ठीक 200

 (फेसबुक पर कुमुद सिंह की टिपण्णी )

बुधवार, 30 सितंबर 2015

बिहारशरीफ डायरी (Biharsharif dayri)

बिहारशरीफ में अभी आये हुए मुझे कुछ ही दिन हुए हैं . शहर इसकी सड़को से मैं धीरे -धीरे वाकिफ हो रहा हूँ. मुहल्लों चौक-चौरहों के नाम मेरे लिए नए हैं, ये सभी नाम स्वत: स्फूर्त विभिन्न काल खंडों से जुड़े है जिस कारण इनमे एक अलग तरह का आकर्षण है.
   भरावपर ,
 महिषासुर- चौक
 धनेश्वर-घाट
 मुनीराम बाबा का अखाडा
 गगन-दीवान
 मेहरपर
 सोंगरा स्कूल
 कटरा
 नवाब-रोड
 कोनहासराय
 मोगालकुंआ-चौकी
 लहेरी
 महलपर
खासगंज
 सोहसराय,
सलेमपुर
 सहोखर
 सोहडीह
सिंगाराहट
 अम्बेर
 शेखना
 इमादपुर
 नई सराय
 दायरा
 बारादरी
 खंदकपर
 पुलपर
 दरगाह-तीराहा
 झींग-नगर
 सालुगंज
 बन-औलिया
 मीर-दाद
 छज्जू मोहल्ला
बंधू-बाज़ार
 इतवारी-मोड़
 आलमगंज
 वैगनाबाद
 कागजी-मोहल्ला
 सकुनतगंज
 गढ़पर
 शेरपुर
 कोलसुमनगर
 जलालपुर
 कमरुदिन्नगंज
 पंडित-गली,
 रामचन्द्रपुर
 बबुरबन्ना
मोरा-तालाब
 पहरपुरा
नीमगंज-चौकी

इन नामों के पीछे अपना इतिहास है . इतना तो अनुमान लगाया ही जा सकता है की इस शहर का उदय तीसरी नगरीय क्रांति के दौरान हुई. मध्य-काल में यह एक संपन्न शहर रहा होगा.       

गुरुवार, 24 सितंबर 2015

पूर्णिया डायरी - 4 (Purnea dayri - 4)

( राकेश रोहित का आलेख "हिंदी कहानी की रचनात्मक चिंताए" का अंश)
चन्द्र किशोर जायसवाल की कहानी हिंगवा घाट में पानी रे ( हंस, मई 1987)  आजादी के बाद के हमारे प्रांतीय यथार्थ की एक विशिष्ट रचना है. इसमें जायसवाल जी ने ढह रहे सामंतवाद और पनप रहे नव्यतम राजनीतिक स्टंटों व छद्मों की गिरफ्त में फंसे भनटा और उसके समाज के दबावों को सामने रखा है. वर्तमान समय में भनटा जैसे लोगों की भोली आशाएं छली जाती रही हैं और इस छले जाने को भनटा अंत में स्वीकार भी करता है. पर अगर भनटा में स्थानीय स्तर पर सुरो बाबू से मुक्त होने की किसी चेतना का विस्तार नहीं हो रहा और भनटा खुद को शोषण की परंपरा में शामिल किये जाने को अहसान के साथ स्वीकारता है तो लगता है इनके यहां कहानियां अपनी अतिस्वाभाविकता में विचार को ‘ओवरटेक’ कर जाती हैं और इस तरह वे यथार्थ का अतिक्रमण करने की कोशिश में कोई समांतर यथार्थ नहीं रच पाती हैं. इस वर्ष चन्द्र किशोर जायसवाल की कहानी अभागा (हंस, अप्रैल 1991) आयी. अपराध, आपरेशन जोनाकी, देवी सिंह कौन जैसी कहानियों के एक अंतराल के बाद इस कहानी (अभागा) को एक घटना के रूप में होना चाहिए क्योंकि यह कहानी परिवर्तन की मध्यवर्गीय इच्छा की शिनाख्त करना चाहती है. पर इसमें पूर्व पीढ़ी के मध्यकालीन अभियानों में शामिल होने की अभौतिक इच्छा का आनंद है और इस आनंद में लेखक इतना डूबता है कि वह उस पीढ़ी, जो यथास्थिति को पोषित करती है, को एक मजाकिये चरित्र में बदल देता है और नयी पीढ़ी के जीवन-विचार का संकट अनछुआ रह जाता है. इन सबके बावजूद चन्द्र किशोर जायसवाल की भाषा पर अद्भुत पकड़ यथार्थ के डीटेल्स को पकड़ने में नहीं चूकती है और कथात्मकता का एक सुन्दर वितान रचा जाता है.

(" हिंगवा घाट में पानी रे " की पृष्ठभूमि बनमनखी की है )

रविवार, 13 सितंबर 2015

दरभंगा डायरी-4 (Darbhanga dayri - 4)

आजादी की बात चली तो मुगलिया सल्तनत की बात कैसे न हो। अंग्रेज 200 साल में अपना ना हो सका, लेकिन मुगल ऐसे घुल मिल गये कि हम उनके नेतृत्व में ही आजादी की पहली लडाई लडी। दिल्ली के लालकिले के अंदर शायर दिल शंहशाह तो बस एक प्रतीक मात्र था। शायद यही कारण रहा है उसे जीते जी मार देने के लिए अंग्रेजों ने थाली में उसके बेटों का सिर परोस कर उसके सामने रख दिया। मुगलिया सल्तनत की वो आखिरी पीढी थी, क्योंकि बहादुर शाह अपने सबसे बडे पोते जुबैरुद्दीन गोरगन को युवराज घोषित करने से पहले ही उनका लालकिला हमेशा के लिए अंग्रेजों के कब्जेे में चला गया और अंग्रेज मुगलिया सल्तानत के इस उत्तराधिकारी को दिल्ली से तरिपार कर दिया और हिंदुस्तान में तीन साल से ज्यादा किसी एक जगह रहने की अनुमति भी नहीं दी। खानाबदोश जीवन जीते हुए एक बार उसकी मुलाकात दरभंगा के महाराजा लक्ष्मेश्वर सिंह से हुई। उन्होंने महाराज को जैसे ही अपना परिचय दिया, महाराज खडे हो गये, उसे देखने लगे। वो जमीन काशी की थी और वहां उनका तीसरा साल था। अनुरोध था कि दरभंगा में अगले पडाव की अनुमति दी जाये। लक्ष्मेश्वर सिंह ने तत्काल जैबुउदीन को अपने साथ लेकर दरभंगा रवाना हो गये। दरभंगा में उसे राज अतिथि का दर्जा दिया और गुजर के लिए भत्ते‍ और नौकर की व्यवस्था की। अंग्रेज सरकार ने खासा विरोध किया और उन्हें महाराजाधिराज की उपाधि नहीं देने की धमकी दी। महाराजा लक्ष्मेश्वर सिंह ने कहा कि जिसने राज दिया अगर उसकी रक्षा नहीं कर पाउंगा, तो महाराजाधिराज कहला कर क्‍या करूंगा। 1857 का विद्रोह अगर सफल होता तो जैबुउदीन निश्चित तौर पर मुगलिया सल्‍तनत का अगला शंहशाह होता। महाराजा लक्ष्मेश्वर सिंह ने उनकी तीन साल बाद जगह बदलने का फरमान भी खत्म करबा दिया और वो बाकी का जीवन दरभंगा में बडे आराम से काटा। इस दौरान उन्होंने एतिहासिक किताब मौज-ए-सुल्तानी लिखी। इस किताब में बहुत सारी बातें उस समय के तिरहुत और वहां की शासन व्यवस्था की कहानी कहती है। मुझे लाल किले और ताजमहल से ज्यादा दरभंगा स्थित जैबुउदीन का मजार मुगलिया सल्तनत की याद दिलाता है।
    आतिश -ए - पिन्हाँ ' के लेखक मुश्ताक अहमद की माने तो महराज का - हाउस ऑफ़ लॉर्ड्स - में काफी असर था। जान की सुरक्षा से निश्चिन्त हो जुबैरुद्दीन ने जीवन के बाकि के साल किताबें लिखते हुए बिताई। दरभंगा में रहकर उन्होंने तीन किताबें लिखी। उनकी लिखी ' चमनिस्तान - ए - सुखन ' कविता संग्रह है जबकि ' मशनबी दुर -ए - सहसबार ' महाकाव्य है। जुबैरुद्दीन की तीसरी रचना ' मौज - ए - सुलतानी ' है। इसमें देश की विभिन्न रियासतों की शासन व्यवस्था का जिक्र है। खास बात ये है कि महाकाव्य ' मशनबी दुर -ए - सहसबार ' में राज दरभंगा और मिथिला की संस्कृति के विभिन्न पहलुओं को तफसील से बताया गया है। राज परिवार की अंतिम महारानी के द्वारा संचालित कल्याणी फाउंडेशन की ओर से ''मौज -ए -सुलतानी ' को प्रकाशित कराया गया है। कल्याणी फाउंडेशन के लाएब्रेरियन पारस के मुताबिक़ मौज ए सुल्तानी की मूल प्रतियों में से एक राज परिवार के पास है। मुश्ताक अहमद भी इसकी तसदीक करते हैं। उनके अनुसार ये प्रति कुमार शुभेश्वर सिंह की लाएब्रेरी में उन्होंने देखी थी। वे दावा करते है कि इस प्रति में जुबैरुद्दीन का मूल हस्ताक्षर भी है। विलियम डलरिम्पल अपनी किताब में दारा बखत की बार - बार चर्चा करते हैं जबकि जुबैरुद्दीन पर वे मौन हैं। उधर लाला श्रीराम अपनी किताब 'खुम - खान ए - जाबेद ' में बहादुरशाह की वंशावली का जिक्र करते हैं। इस किताब में दावा किया गया है कि जुबैरुद्दीन ही बहादुरशाह के वारिश थे। असल में बहादुरशाह के सबसे बड़े बेटे दारा बख्त 1857 के विद्रोह से पहले ही मर गए थे। लेकिन सिपाही विद्रोह के बाद सब कुछ बदल गया। बहादुरशाह के पांच बेटों को अंग्रेजों ने दिल्ली के खूनी दरवाजे के निकट बेरहमी से मार दिया। स्व महाराजाधीराज लक्ष्मीश्वर सिंह ने काजी मुहल्ला में उनके लिए घर बनवा दिया। काजी मोहल्ला ही आज का कटहल वाड़ी है। जुबैर के लिए मस्जिद भी बना दी गई। लेकिन बदकिस्मती ने उनका साथ नहीं छोड़ा। जुबैरुद्दीन के दो बेटों की मौत हैजा से हो गई। ये साल 1902 की बात है। इसी साल ग़मगीन उनकी पत्नी भी दुनिया छोड़ गई। जुबैरुद्दीन का इंतकाल 1910 में हुआ। उनका अंतिम संस्कार दिग्घी लेक के किनारे किया गया। राज परिवार की तरफ से 1914 में उस जगह पर एक मजार बनबाया गया। रेड सैंड स्टोन से बना ये मजार जर्जर हालत में है। दीवार में लगे खूबसूरत झरोखे कई जगह से टूट गए हैं। मजार के अन्दर कंटीले घास उग आए हैं। इसके अन्दर जाने वाली सीढ़ी खस्ताहाल है। दरवाजे पर बना आर्क भी दरकने लगा है। मजार के केयरटेकर उस्मान को इस बात का अंदाजा नहीं है कि ये मजार मुगलों के अंतिम वारिश की है। ... अगली वार विलियम डलरिंपल भारत आएं तो दरभंगा के संस्कृति प्रेम पर अट्टहास करते इस मजार को जरूर देखें।
( फेसबुक पर कुमुद सिंह की टिप्पणी )

मंगलवार, 8 सितंबर 2015

समस्तीपुर डायरी (Samastipur dayri)

रेलवे स्‍टेशन था। इस धरोहर को जनता के लिए बचा कर रखना चाहिए था। एक ओर जहां पैलेस आन व्‍हील गायब कर दिया गया, वहीं इस स्‍टेशन को भी नष्‍ट करने में भगवान जगन्‍नाथ ने कोई कोर कसर नहीं छोड़ी। अगर यह धरोहरों बचा कर रखा जाता तो आज अन्‍य पैलेस आन व्‍हील की तरह तिरहुत का भी अपना शाही ट्रेन होता। वहीं मिथिला विश्‍वविद्यालय विश्‍व का इकलौता विश्‍वविद्यालय होता जिसके परिसर में रेलवे टर्मिनल होता। बनारस और जेएनयू में जब बस टर्मिनल देखने को मिला जो यह स्‍टेशन याद आ गया। अब बात बरौनी में रखे गये पैलेस आन व्‍हील की करू तो 1975 में उसे आग के हवाले कर दिया गया। कहा जाता है कि उसे जलाने से पहले उसके कीमती सामनों को लूटा गया। खैर तिरहुत रेलवे का इतिहास हम बताते रहेंगे...अभी आप इतना ही समझ लें तो काफी है कि तिरहुत में बिछी 70 फीसदी पटरी तिरहुत रेलवे के दौरान ही बिछायी गयी थी। आजाद भारत में महज 30 फीसदी का विस्‍तार हुआ है। आप अगर इन तसवीरों का प्रयोग करें तो श्री हेतुकर झा, प्रबंधन न्‍यासी, महाराजा कामेश्‍वर सिंह फाउंडेश को साभार देना मत भूलें, उनकी वजह से बहुत कुछ आज हम और आप देख और पढ रहे हैं। 
(फेसबुक पर कुमुद सिंह की टिपण्णी)

शुक्रवार, 4 सितंबर 2015

दरभंगा डायरी - 3 (Darbhanga dayri - 3)

उन्‍नीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध में मिथिला में विवाह के बाद महिलाओं
 की स्थिति में हो रहे ह्रास की चिन्‍ता समाज में व्‍याप्‍त थी। बंगाल की कुलीन विवाह व्‍यवस्‍था का कुप्रभाव मिथिला पर कम से कम पड़े इसके लिए उपाय ढूंढने थे। समाज में जो व्‍यवस्‍था प्रचलित थी, उसमें ही और सुधार करना श्रेयस्‍कर माना गया। 1876 में दरभंगा में समिति गठन होने के बाद मधुबनी के एस.डी.ओ. ग्रियर्सन, आरा के पियारे लाल और दरभंगा महाराजा लक्ष्‍मेश्‍वर सिंह सौराठ सभा का भ्रमण किए। महाराजा ने अपनी ओर से इस सभा स्‍थल के विकास के लिए निधि का आवंटन भी किया। इसके पीछे उद्देश्‍य था कि जब समाज के लोगों के समक्ष, बिलकुल खुले ढंग से, शादी की बात तय होगी तो इसमें भ्रष्‍टाचार की कम से कम गुंजाइश रहेगी। सौराठ सभा गाछी में प्रत्‍येक मूल या गांव के लोगों के लिए अलग-अलग वासा बनाया गया जहां लड़का पक्ष के लोग अपने वर को लेकर सभा गाछी पहुंचते थे। लड़की वालों का अलग वासा होता था। दोनों के बीच में समन्‍वय कराने की जिम्‍मेदारी 'घटक' की होती थी और अंतिम निर्णय 'पंजीकार' का होता था जो अपनी पंजी के आधार पर, तार के पत्ते पर अश्‍वजन लिखकर देता था कि लड़का और लड़की के बीच, पिता के संबंधों के आधार पर सात पीढ़ी और मॉं के संबंधों के आधार पर पांच पीढ़ी तक कोई सम्‍बन्‍ध नहीं है। विवाह की बात तय होने के बाद शादी के रस्‍म के बारे में विमर्श होता था। मिथिला में इस परिपाटी को बढ़ावा देने के लिए अन्‍य 14 गांवों को चिन्हित किया गया और वहां पर भी सभा की स्‍थापना की गई। इन गांवों में सौराठ, कर्णगढ़ी, परतापुर, शिवहर
, गोविन्‍दपुर, फत्तेपुर, सझौल, सुखसैना, अखराही, हेमनगर, बलुआ, बरौली, समौल, सहसौला हैं। इसके अतिरिक्‍त पूर्णिया जिला में भी कई

 स्‍थानों पर सभा गाछी लगने का संदर्भ मिल रहा है। सौराठ में सभा लगने की परंपरा कायम रही जबकि बाकी गांवों में धीरे-धीरे यह परंपरा समाप्‍त हो गई। सौराठ गांव में आरंभ में पंजिकार के पांच परिवार रहते थे। नीति निर्माताओं का मूल उद्देश्‍य था कि अधिक से अधिक लड़कियों की शादी कम से कम खर्च में हो जाए ताकि सामाजिक रूप से महिलाओं की स्थिति
 में सुधार हो। इधर, लड़की की मॉं अपने पति/परिवार के लोगों को सभा गाछी भेजती थी और अपने घर में चुड़ा-दही का इंतजाम करके रखती थी। पता नहीं, किस दिन सभा गाछी से 'वर' लेकर उनके पतिदेव आ पहुंचे। बहुत ही सादगी से, परन्‍तु वैदिक मंत्र के साथ विवाह की रस्‍म संपन्‍न होती थी। जो विस्‍तार करना हो, कोजागरा में होता था। उस दिन सभी सगे-सम्‍बन्धियों को आमंत्रण दिया जाता था। नटुआ-गवैया आदि का भी
 इंतजाम होता था। भोज वगैरह भी होता था। लेकिन घटक, पंजिकार और दहेज व्‍यवस्‍था ने सौराठ सभा की सारी व्‍यवस्‍था को अपने ढंग से 'नियंत्रित' कर लिया। अब यह कहने की स्थिति में कोई नहीं है कि सभा गाछी में
 बिना दहेज की शादी तय होती है। जब मिथिला में दहेज व्‍यवस्‍था रहेगी तो फिर बिकौआ विवाह, बाल विवाह, बेमेल विवाह या बहु विवाह किसी न किसी स्‍वरूप में कैसे नहीं रहेगी। हॉं, समय के साथ इसमें परिवर्तन तो होता ही है।
(फेसबुक पर दर्ज भैरव लाल दास की टिपण्णी )

रविवार, 16 अगस्त 2015

सिवान डायरी-1 (Siwan dayri-1)

सिवान मे एक प्रखंड है पंचरुखी जंहाँ एक गाँव है  पपौर . आज से पच्चीस-तीस वर्ष पूर्व यहाँ अमेरिका से इतिहास के छात्रों का एक अध्ययन दल आया था. ये अपने अध्ययन-यात्रा में भगवान बुद्ध के निर्वाण से जुड़े स्थलों कि तलाश कर रहे थे . इस दल को पपौर में कुशेश्वर नाथ तिवारी से भेंट हुई, जो उन दिनों एक विद्यार्थी थे . कुशेश्वर जी को जानकर आश्चर्य हुआ कि भगवान बुद्ध ने आपना अंतिम भोजन उन्ही के गाँव में चुंद स्वर्णकार के घर खाया था, जिसके बाद उनका परिनिर्वाण हुआ .
   अपने गाँव के इतिहास को जानने  के लिए उन्होंने बुद्ध से जुडी कई पुस्तकों का अध्ययन किया . इन पुस्तकों मे के० पी० जायसवाल शोध संस्थान के के पूर्व निदेशक डा० जगदीश्वर पाण्डेय की पुस्तक ‘’Footprints of budha’’ भी थी . इस पुस्तक में प्रमाणित करने का प्रयास किया गया है कि पपौर ग्राम में भोजन ग्रहण करने के  सिवान मे दाहा नदी के तट पर ही भगवान बुद्ध का परिनिर्वाण हुआ था. कुशीनगर के मल्ल राजाओं को इसकी सूचना मिली तो वे सोने के शवयान मे विशेष औषधिय द्रव से उपचारित कर उनके शव को कुशीनगर ले गये . कहा जाता है कि इसी करण इस स्थान का नाम सिवान पड़ा .
       इसके बाद कुशेश्वरनाथ तिवारी एक योधा कि तरह अपने गाँव के एतिहासिक पहचान को स्थापित करने के लिए इतिहास से जुड़े सभी शोध संस्थान , बिहार सरकार के पुरातत्व निदेशालय ,  भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण कार्यालयों का चक्कर लगाने लगे . कई बार जब भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण कार्यालय दिल्ली जाने के क्रम में रेल में आरक्षित टिकट नहीं मिला तो साधरण डब्बे मे खड़ा रहकर  सिवान से दिल्ली तक की यात्रा की. अंततः उनका बीस वर्षों का परिश्रम सफल रहा . ३१ जुलाई १५’ से पपौर में  भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के देख-रेख मे खुदाई का कार्य चल रहा है. एन० बी० पी० डव्लू० एवं भगवान बुद्ध के काल के कई  पुरातात्विक साक्ष्य मिलने की सूचना है.

         पुरातात्विक विरासत के संरक्षण के लिए हमें प्रत्येक पंचयात और कस्बे में हमें एसे योध्या की जरूरत है.

सोमवार, 20 जुलाई 2015

जहानाबाद (काको) : डायरी (Jehanabad /Jahanabad : Kako - dayri)

अहमद शम्सी बिहार के पहले मुस्लिम आई० पी० एस० अफसर थे. शम्सी साहब ने १९३३ में आई० पी० एस० की परीक्षा पास की .  अपने मेहनत और लगन  के बल पर गवर्नर-जेनरल लार्ड  लिंग्लिथ्गो एवं लार्ड वैवल के मुख्य सुरक्षा अधिकारी के रूप में कार्य किया . १९४५ में शिमला कांफ्रेंस के अगले ही दिन उनकी तबियत बिगड़ी ; वंहा से दिल्ली लाया गया जंहा उनका इंतकाल हो गया.
                                         शम्सी साहब मूलतः काको के ही हैं. अलीगढ़ विश्वविद्यालय से पढ़े उनके एकलौते पुत्र काको में ही रहते हैं. इनकी आयु लगभग अस्सी वर्ष है. पुराने दिनों को याद कर भावुक हो उठते हैं. इनका जन्म वायसराय-आवास (वर्तमान राष्ट्रपति-भवन ) में हुआ था. उनसे मुलाकत हुई तो उन्होंने बताया . उन्होंने यह भी  बताया की शिमला में उनकी एक एक  बड़ा बंगला था जो बिक गया , शायद लाल कोठी नाम बताया था. इस हवेलीनुमा कोठी में कई मशहूर फिल्मों की शूटिंग भी हुई है.
लतीफ शम्सी अच्छे शायर है. अंजुम काकवी तखल्लुस से मुशायरों में प्रसिद्ध है. साठ के दशक में उन्होंने अलीगढ़ के मुशायरे में जब यह शेर पढ़ा -
ये तो मुमकिन है की तामीर न होने पाये ;
वरना हर जेहन में एक ताजमहल होता है .
तो जिगर मुरादाबादी ने उठकर उन्हें गले लगा लिया. आजकल काको पर केन्द्रित उर्दू में एक संस्मरणात्मक पुस्तक पर काम कर है, जिसकी पाण्डुलिपि उन्होंने मुझे दिखाई.

गुरुवार, 2 जुलाई 2015

शिक्षक डायरी (teacher's dayri)

सुधांशु शेखर की टिपण्णी 

इन दिनों शिक्षकों के प्रति मेरी श्रद्धा बढ़ जाने के कारण घर में रोज़ घमासान होता है......!
कुछ साल पहले की बात है.....
सरकारी तंत्र द्वारा मुझे विद्यालय निरीक्षण करने भेजा गया ! 
विद्यालय पहुँचते हीं पाया कि दस में से आठ शिक्षक बिना अवकाश लिए ग़ायब थे । मैंने ग़ुस्से में उनके वेतन बंद करने का आदेश दिया ।
शिक्षक भी आख़िर शिक्षक होते है.......!
अपनी व्यथा को लेकर मेरे गाँव जाकर पिता से मिले....!
मेरे पूज्य पिता, जो सरकारी विद्यालय में गुरूजी थे, ने ग़ुस्से में दूरभाष पर कहा----
अरे मूर्ख ! तुमने गुरूजी का वेतन बंद कर दिया ? गुरू तो ब्रह्मा-विष्णु से भी बड़े होते है । मुझे अफ़सोस है कि मैंने तुझ जैसे नालायक को जन्म दिया !
इसके बाद गुरू के प्रति आई श्रद्धा के कारण मेरे जाँच रिपोर्ट पर कई बार मेरा वेतन बंद हो चुका है !
और पत्नी भी विद्रोह कर चुकी है...........!