शनिवार, 22 जून 2019

सकरा डायरी / sakra Dayari

21.6.2019
सकरा मुजफ्फरपुर जिलान्तर्गत ढोली प्रखंड में  है. यंहा रहते है सोहन लाल आजाद. फक्कङ संत कबीर. लाख समझाने के बाद भी वे न माने .जब बिहार भीषण लू की चपेट में था, सैकड़ों लोग काल के गाल में समा चुके थे ; तब ये 18 जून को साईकिल से हजारों किलोमीटर लम्बी  शहीद यादगार यात्रा पर निकल पड़े.  आज पटना पहुँचे , कुछ लोग उनके स्वागत में शहीद स्मारक के पास एकत्रित हुऐ थे.
इस यात्रा में वे सकरा से मुजफ्फरपुर, पटना,बनारस,इलाहाबाद, दिल्ली, अमृतसर,कटक, मिदनापुर, के साथ कई शहीद स्मारकों का दर्शन करेगें. कब लौटेगें उन्हें खुद पता नहीं. सन् 1992 से श्री आजाद एैसी यात्रायें कर रहे हैं. साईकिल के मध्य डंडे में राष्टृीय ध्वज होता है , पीछे सिमेंट की खाली बोरी में कुछ जरुरी सामान.
किसी शुभचिंतक ने साईकिल खरीदकर दे दी, किसी ने झंडा, तो किसी ने अपना ए॰ टी॰ एम॰ दे दिया है .  श्री सोहन लाल आजाद  जी के पास न कोई जमीन है, न आय का कोई अन्य साधन. इन्होंने विवाह भी नहीं किया है. चूँकि ये गरीब है, अति पीछड़ी जाति से है, इसलिए इनकी यात्रा कभी खबर नहीं बन सकी

गुरुवार, 13 जून 2019

पटना डायरी-4 (तब सिपाही जमींदार बन जाते थे /When soldiers became landlords)

पलासी और बक्सर युद्ध में विजय के बाद कंपनी बहादुर का उत्साह सातवें आसमान पर था .इस जीत का श्रेय बंगाल आर्मी के सिपाहियों को था. इनकी  सेवा से खुश होकर 18 फरवरी 1789 को  ब्रितानी हुकूमत ने एक रेगुलेशन लाया; इसके अनुसार बंगाल आर्मी के सैन्य ओहदादरों ( रिसालदार से सिपाही तक ) के लिए अवकाश प्राप्ति के उपरांत कुछ गैर-आबाद , बंजर जमीन बंदोबस्ती की जाती थी. उसे कृषि योग्य बनाने हेतु ग्रेच्युटी की भी  व्यवस्था थी. यह पटना जिले के साथ बंगाल के लोअर प्रोविंस के सभी जिलों में लागू था. विभिन्न ओहदों के लिए भूमि और ग्रेच्युटी का पैमाना निम्न प्रकार निर्धारित था.
रसालदार को 600 बीघा जमीन और 150 रुपया ;
सूबेदार  को 400 बीघा जमीन और 100 रुपया ;
जमादार को 200 बीघा जमीन और 50 रुपया ;
हवलदार को 120 बीघा जमीन और 30 रुपया ;
नायक को 100 बीघा जमीन और 20 रुपया ;
सिपाही  को 80 बीघा जमीन और 15 रुपया ;
  यह जमीन इन सैनिकों को आजीवन लगान मुक्त(rent free) दी जाती थी. इनके मरनोपरांत समाहर्ता ऐसी जमीनों का स्थाई लगान (fix rent) निर्धारित करते थे . जिसकी अदायगी उनके वारिस करते थे. इसका १/१० भाग मालिकाना के रूप में प्रोपराइटर  को देना पड़ता था.
  आज शायद ही किसी एक व्यक्ति के नाम से बिहार में 200 बीघा जमीन हो. सन 1804 ईस्वी में भूमि आबंटन की सीमा घटा दी गयी.
 रसालदार को 100 बीघा जमीन;
 सूबेदार  को 50 बीघा जमीन ;
 जमादार को 200 बीघा जमीन ;
 हवलदार को 30 बीघा जमीन  ;
 नायक को 250 बीघा जमीन  ;
आधुनिक भारत में पेंशन और इसके नगदीकरण की शुरुआत यंही से हुई है.   

बुधवार, 29 मई 2019

पूर्णिया डायरी-20 (लेकिन आप क्या करेंगें साहिब किस्मत/But what would you sahib kissmat.)

पूर्णिया डायरी-19  से आगे ......
पूर्णिया  1887 ईस्वी 
डिप्टी कंजरवेटर ऑफ फारेस्ट का प्रस्ताव था कि खाली झोपड़ियों के आस-पास बिखरी सड़ती लाशों को हाथियों की मदद से एकत्रित कर उन पर झोपड़ियों को डालकर आग लगा दिया जाये. उसी दिन दोपहर में पच्चीस हाथी तथा वन विभाग के साठ संथाल कर्मचारी को लाया गया. संथालों को भय और बड़ी बख्शीस का प्रलोभन देकर लाया गया था. एक लंबी सिकड़ एवं छड़ी जिसके एक सिरे पर हुक लगा हो, की व्यवस्था की गयी. इसका प्रयोग वैसी लाशों को खिंचकर लाने के लिये जाना था जो झोपड़ियों से दूर थे. 
 संथाल लाश को हूक में फंसाते और हाथी उसे खाली झोपड़ियों के दरवाजे तक खिंच लाते. काफी मशक्कत के बाद तीन फुट उँचा और तीस फुट लंबा लाशों का ढेर तैयार के लिया गया. इसके बाद आसपास की खाली झोपड़ियों को इसपर रखा गया. फोर्ब्स ने  लिखा है कि हाथियों को मानो समझ आ गया हो कि आगे क्या करना है. ढेर पर टनों लकड़ियाँ और झाड़ियां लाकर रख दी गई. इसके बाद संथालों ने इसपर दर्जनों बैरल पेट्रोल उड़ेलकर आग लगा दिया.गिद्धों का झुंड जो इस सारी प्रक्रिया को दूर से देख रहे थे, अपनी कर्कश आवाज के साथ उड़ चले. पर रात में सियारों की डरावनी आवाजें आती. जलने के बाद अवशेष बच गये टुकड़ों के लिये लड़ते. 
          महामारी का प्रभाव धीरे-धीरे घटने लगा. लोग वापस अपने रोजगार पर लौटने लगे. कुछ अमीर कुछ गरीब पर किसी मे मृत लोगों के प्रति विशष शोक का भाव न था. लेकिन आप क्या करेंगें साहिब किस्मत.

सोमवार, 27 मई 2019

पूर्णिया डायरी-19(लाशों के निस्तारण के लिए जब हाथियों की मदद ली गई./When the help of elephants was taken for the disposal of corpses)

पूर्णिया डायरी-18  से आगे ......
पूर्णिया  1887 ईस्वी 
महामारी फैलने के आठ दिनों बाद पूर्णिया में मरने वालों की संख्या घटने लगी. पलायन कर गये लोग, वापस घरों को लौटने लगे, पर यंहा रह नहीं सके .सङ रही लाशों की बदबू इतनी भयानक थी कि इनके बीच एक भी  रात बिताना शहादत देने जैसा था. एक सुबह शहर के बाहरी हिस्से में फेंके गये लाशों की गणना फोर्ब्स ने की थी जो सात सौ पचास से कम न थी. ये सभी लाशें सड़ कर शहर के वातावरण में भीषण बदबू फैला रही थी.                                                     शासन की इस उपेक्षा को छिपाते हुए फोर्ब्स ने आगे लिखा है कि , मामला इसी तरह नही चलता रहा लाशों के निस्तारण के सम्बंध में 'उपर' बेतार संवाद भेजकर निर्देश मांगे गये. पर उपर से एक ही उतर आता जितनी जल्दी हो लाशों को जला या दफना कर निस्तारित किया जाये. यह कहना तो आसान था , पर यहां स्थनीय प्रशासन के सामने यक्ष  प्रश्न यह था कि, इतनी बड़ी संख्या में लाशों को जलाये या दफनायेगा कौन ? पूर्णिया के आसपास कई मील तक इस काम के लिये कोई तैयार न हुआ.

     काफी मंथन के बाद डिप्टी कन्जरवेटर ऑफ फाॅरेस्ट ने यह प्रस्ताव दिया की सड़ती लाशों को निपटाने के लिये हाथियों की मदद ली जाये. हाथियों की मदद से लाशों को निपटाने की जो कार्य योजना बनी उसपर सभी ने सहमती दी. इस काम के लिये पच्चीस हाथियों को लगाने का निर्णय हुआ.
                            
                                     क्रमशः ........

शनिवार, 25 मई 2019

पूर्णिया डायरी-18 ( दूध न देने की सजा पन्द्रह साल की जेल /When the punishment for not giving milk was fifteen years of imprisonment)

पूर्णिया डायरी-17  से आगे ......
पूर्णिया  1887 ईस्वी 
इस महामारी में पूर्णियावासियों के असह्य कष्ट और दरिद्रता का वर्णन नहीं किया जा सकता है. इलाके की सभी दूकानें धीरे-धीरे बंद हो गई. या तो दूकानदार मर गये या पलायन कर गये या उनके परिवार के ज्यादातर सदस्य का सफाया हो गया जिसके कारण वे दूकान खोलने की स्थिती में नहीं थे. अनाज और अन्य खाद्य सामग्रियां बैलगाङियों से दूर से लायी जा रही थी. 
 कई बार सामान लाने गया गाङीवान रास्ते पर हाथ में लगाम लिये मृत पाया जाता.परन्तु इस महामारी में भी कुछ लोग मौके का लाभ उठाना नहीं चुकते. एक सुबह फोर्ब्स कहीं जा रहे थे, रास्ते में तालाब पर कुछ महिलायें कमर भर पानी मे कपङे धो रही थी. ये कपङे उन बच्चों के थे जो महामारी में मारे गये थे (न जाने फोर्ब्स ने किस आधार पर इतना विश्वास के साथ यह लिखा कि ये कपङे उन्हीं बच्चों के थे जो महामारी में मारे गये थे). एक ग्वाला उधर से दूध लेकर जा रहा था, वहाँ रुककर वह उनसे गप्प करने लगा. पूर्णिया में दूध का स्त्रोत गाँव से इसे लेकर आने वाले ग्वाले ही थे. अस्पताल में दूध की कमी रहती थी . गप्प खत्म होने के बाद  फोर्ब्स ने उस ग्वाले को अपना दूध बाजार में न बेचकर अस्पताल में लाकर बेचने को कहा . परन्तु ग्वाले ने उसकी बात सुनकर पुरा का पुरा दूध तालाब में बहा दिया. शायद भय और घृणा से. 
                                   फोर्ब्स ने आगे लिखा है कि उसका दूध तो कभी अस्पताल नहीं पहुँच सका पर, वह पंदरह साल के लिये जेल जरूर चला गया.

                                           क्रमशः .......

गुरुवार, 23 मई 2019

पूर्णिया डायरी-17 (पूर्णिया में नरबलि/ Human Sacrifice in purniya )

पूर्णिया डायरी-16  से आगे ......
पूर्णिया  1887 ईस्वी 
महामारी के दौरान की घटना की एक  जिसे कभी भुलाया नहीं जा सकता है. इस घटना ने पूर्णिया को कलंकित किया है. इतिहास केवल गौरव गाथा नहीं. विफलता लाचारी और कुंठा के कारण  घटित  घटनाएँ जो जन -जीवन को प्रभावित करती है वह भी इसका अंग है.  
                                        आकस्मिक हालत में फोर्ब्स एक अस्पताल से दूसरे अस्पताल जा रहे थे जिसकी दूरी दो मील थी. रास्ते में खुले स्थान पर कोंड जनजातियों का एक समूह मिला, ये जनजाति मुख्य रूप से कोंड-महाल ओड़िसा के थे. जो मजदूरी के लिए पूर्णिया लाये गये थे, और यहीं बस गये थे. भीड़ में से आ रही पैशाचिक चिल्लाहट तेज होती जा रही थी. उन लोगों का उत्साह चरम पर था. फोर्ब्स समीप पंहुंचे, एक को बुलाकर पूछा कि क्या हो रहा है. उसने एक ही उत्तर दिया की सब ठीक है. वे उत्सुकतावश उस भीड़ में घुस गये. भीड़ के बीच में लकड़ी की ऊँची वेदी थी, जिसपर चार-पांच साल के बच्चे को लिटाया गया था. वेदी के पास एक कोंड पूजारी बड़ा सा चाकू लिए खड़ा था. फोर्ब्स समझ पाते की यंहा क्या हो रहा है इससे पहले ही उसने चाकू बच्चे के सीने में उतार दिया . भीड़ और हत्यारे पूजारी पर पैशाचिक प्रवृती इस कदर  हावी थी की वंहा एक भी शब्द कहना खतरे से खाली नहीं था.ऐसा फोर्ब्स ने लिखा है. यदि Ducarel जैसा साहस वे दिखाते तो बच्चे को बचा सकते थे , पूर्णिया की धरती कलंकित नहीं होती . 
                  खैर फोर्ब्स ने उस भीड़ में से एक को पहचान लिया जो पास के नील की  फैक्ट्री में कुली का काम करता था.अगले दिन उससे पूछ-ताछ की गयी. उसने स्वीकार किया कि महामारी और मृत्यु से भयभीत कोंडो ने अपने भगवान को खुश करने के लिए उस बच्चे की बलि दी थी. बच्चे की माँ उसी दिन सुबह में महामारी से मरी थी, उसे चुराकर लाया गया था. इस कांड का मुख्य कर्ता कभी गिरफ्तार नहीं किया जा सका. सड़े मांस खाने की आदत के कारण  दो-तीन दिनों के अन्दर महामारी की चपेट में आ काल के गाल में समां गये.

               क्रमशः...... 

बुधवार, 22 मई 2019

पूर्णिया डायरी-16 ( पांच दिनों में तीन हजार लोग काल-कलवित हुये)

पूर्णिया डायरी-15  से आगे ......
पूर्णिया  1887 ईस्वी 
पूर्णिया के "नेटिव" समाज के बड़े तबके का यूरोपीय चिकित्सा व्यवस्था में विश्वास नहीं रहने के बावजूद जितने लोग अस्पताल आ रहे थे उनके इलाज के लिए कम से कम बीस डॉक्टरों की आवश्यकता थी. फोर्ब्स ने आगे लिखा है कि नेटिव कीड़े-मकोड़े की तरह मर रहे थे. पांच दिनों के अन्दर तीन हजार लोग काल-कलवित हुए. जो गरीब थे जिनके परिवार में कोइ नहीं बचा था उनका अंतिम संस्कार भी नहीं हो सका. लाशों के सड़ने से 'नेटिव' बस्तियों में भयंकर बदबू फ़ैल रही थी. 
               श्मशान से रात -दिन धुंये का अम्बार उठकर आसमान में विलीन हो रहा था. मुसलमानों के कब्रिस्तान भी बिना दफ़न किये गए लाशों से भरे पड़े थे. इसके ऊपर चिल-गिद्ध ऐसे मंडराते रहते मानो काले बादल उमड़-घुमड़ रहे हों. 
  हिन्दुओं की जो भी खाली जमीन थी उसपर काली की पूजा हो रही थी. यह बात आम-आवाम के मन में घर कर गयी थी कि माँ काली के कोप से ही यह महामारी पूर्णिया में फैली है, जो रोज सैकड़ो लोगों को लील रही है. इधर मस्जिदों में शरण लेने वाले मुसलमानों की संख्या भी बढती जा रही थी. उनका विश्वास था कि इस पवित्र भवन की शरण में आकर वे उस मृत्यु से बच सकते हैं जो उनके घरों में इंतजार कर रही है. परन्तु जल्द ही मस्जिद मुक्ति धाम बन गया. बीमार व्यक्ति मस्जिद में आता प्रार्थना करता पर संक्रमण इतना होता कि वह प्रार्थना पर भारी पड़ता . बीमार आदमी मर जाता. मृत शरीर को मस्जिद से निकलने वाला कोइ नहीं था.लाशों की संख्या बढती, उसके सड़ने से भीषण बदबू फैलने लगती . मुल्ला और मोईजिन मस्जिद छोड़कर अन्यत्र चले जाते .

क्रमशः 

मंगलवार, 21 मई 2019

पूर्णिया डायरी-15 (महामारी में जादू-टोना )

पूर्णिया डायरी-14 से आगे....
पूर्णिया  1887 ईस्वी 
डा० सांडर्स को दफ़न करके पूर्णिया लौटने पर फोर्ब्स के कानों में हिन्दुओं का शवयात्रा मन्त्र " राम-राम सीताराम" और मुसलमानों का "अल्लाह इल्ला अल्लाह" गूंजता रहा. श्मशान और कब्रिस्तान में लाशों के जाने का सिलसिला देर रात तक चलता रहा.इस बीच फोर्ब्स को न जाने कब नींद आ गई.
              . हैजा महामारी का रूप ले चूका था, पर पूर्णिया में कोई डाक्टर नहीं था. कमिश्नर  जिले में दूसरे सिविल सर्जन के पदस्थापन के लिए टेलीग्राम भेज चुके थे.उसने फोर्ब्स से अनुरोध किया कि जबतक कलकत्ता से कोई दूसरा डॉक्टर नहीं  आ जाता वे सिविल-सर्जन के दायित्वों का निर्वहन करें. आगे के दिनों में आनेवाली कठिनाईयों को समझते हुए भी फोर्ब्स ने इस चुनौती को स्वीकार कर रोगियों का इलाज प्रारंभ कर दिया.
                                            नील की फैक्ट्री , खलिहान, या कोई एसा भवन जिसे इस विपदा की घड़ी में अस्पताल बनया  जा सकता था,  बना दिया गया .  " नेटिव" हिन्दुओं में सबसे निम्न जाति के लोग ही यूरोपीय इलाज और दवा का लाभ उठा सके. हिन्दुओं के किसी उच्च जाति के रोगी का इलाज के लिए यंहा आना असंभव था. वे यदि इस महामारी से पीड़ित होते तो एक ब्राह्मण ओझा को उनके पास भेजा जाता. वह जादू-टोना-टोटका करता . पीड़ित व्यक्ति की स्थिती में कोई सुधार नहीं होता तो फिर  वे सभी कर्म-कांड कराये जाते जो मोक्ष के लिए आवश्यक है. उसके बाद मनहूस रोगी को मरने के लिया छोड़ दिया जाता था. मान लिया जाता की उसे मोक्ष प्राप्त होगा.
                              मुसलमानों के मामले में बात थोड़ी अलग थी. कुछ मुसलमान बीमार पड़ते तो अस्पताल आते. दवा दिए जाने पर वह इसे समीप के मस्जिद के मुल्ला के पास ले जाते. मुल्ला उसकी जाँच-परख कर  यह तय करता की दवा रोगी के लिए उपुक्त है या नहीं. यदि वह इसे सही पाता तो कागज के एक टुकड़े पर कुरान की एक आयत लिख दवा के बोतल की गर्दन में बांध देता , जो दवा की क्षमता को और बढ़ा देता .दूसरी ओर यदि मुल्ला दवा को सही नहीं बताता तो लोग उसे फेंक देते और उन फिरंगियों को कोसते हुये घर लौटते जिसने गलत दवा दी थी.
                                                   
                                                                           क्रमशः .....
    

सोमवार, 20 मई 2019

पूर्णिया डायरी-14 (डा० सांडर्स की कहानी/story of Dr sanders )

पूर्णिया डायरी-13 से आगे.....
पूर्णिया 1887 ईस्वी 
डा० सांडर्स के अंतिम संस्कार के बाद फोर्ब्स दुखी मन से पूर्णिया अपने बंगले पर लौट आया . अपने मित्र की आकस्मिक मृत्यु से वे विचलित था . मृत्यु के कारण को जानने के लिए उनके नौकर को बुलवा भेजा . उसने बताया कि रात दस बजे एक गरीब नेटिव डा० को बुलाने आया जिसका बेटा बिमार था. डा० उसके साथ गये और रात भर बीमार बच्चे के साथ रहकर उसकी तीमारदारी की. वह हैजे से पीड़ित था. उस गरीब का बेटा तो बच गया पर डा० सांडर्स हैजे की बलि चढ़ गए. डाक्टर ने हिपोक्रेतिस के नाम पर ली गई शपथ को पूरा किया. आज पूर्णिया में चार सौ से अधिक डाक्टर है. पर मुझे नहीं लगता की इनमे से कोई गरीब व्यक्ति की मदद उस तरह करता होगा जैसा डा० सांडर्स ने किया
                                                 क्रमशः.......

शुक्रवार, 17 मई 2019

पूर्णिया डायरी-13 (जब पूर्णियावासियों ने एक अंग्रेज की कब्र खोदने से इंकार कर दिया)

पूर्णिया डायरी-12 से आगे....
 पूर्णिया  1887 ईस्वी
डा० सांडर्स की लाश पालकी के अन्दर फोर्ब्स के बंगले की ड्योढ़ी में पड़ी थी . उस समय पूर्णिया की यूरोपिन कॉलोनी में रौनक हुआ करती थी . इसका विस्तार वर्तमान रंगभूमि मैदान के उतर पश्चिम था. यंहा कई लोगों के सरकारी बंगले थे जिसमे केवल ब्रिटेन ही नहीं बल्कि यूरोप के प्राय: सभी देश के मूल के लोग यथा फ्रांस आयरलैंड , जर्मनी, पुर्तगाल के लोग रहते थे. नेटिव इस ओर जाने से बचते थे. इसी कॉलोनी के पूरब सिविल लाइन बाज़ार था जो आज लाइन बाज़ार के रूप में जाना जाता है. फ़ोर्ब्स ने तत्काल तीन हरकारा (संदेशवाहक) जो तेज धावक होते थे, को बुलवाया ; इन्हे जिले के मजिस्ट्रेट , कमिश्नर , और कमांडिंग ऑफिसर के पास  डा ०  सांडर्स के मृत्यु की सूचना देने हेतु भेजा. एक अश्वारोही संदेशवाहक को मि० मुर्री  के पास यह कहवाकर भेजा कि वे जितनी जल्दी हो अपने घोड़े पर सवार हो आयें.  मि ० मुर्री नील की खेती कराने वाले बड़े जमींदार थे, जिन्हें स्थानीय लोग निलहा फिरंगी कहते थे.
                           मि० मुर्री दो घंटे में पहुँच गये. उनकी मदद से डा० सांडर्स के मृत शरीर को पालकी के अन्दर से निकाल कर कमरे में रखा गया, जंहा अब दफनाने तक इंतजार करना था. कमिश्नर शाम में पंहुचे. कैंटोनमेंट के छोटे कब्रिस्तान में लाश को दफ़नाने की तैयारी की जाने लगी जो पास में ही था. स्थानीय लोग जिसे अंग्रेज 'नेटिव' कह सम्बोधित करते थे ; में यह खबर जंगल के आग की तरह फ़ैल गयी कि हैजा महामारी का रूप ले चुका है, जिससे जिले के सबसे बड़े अंग्रेज डाक्टर की मौत हो गई है. भय लोगों में इस तरह व्याप्त था की मृत डॉक्टर की कब्र खोदने के लिए कोई तैयार न हुआ. सूचना पाकर अन्य अंग्रेज ऑफिसर असिस्टेंट पुलिस सुपरिन्टेन्डेन्ट एवं फारेस्ट कांसेर्वेटर भी पंहुंच गए. शाम-दाम-दंड-भेद की नीति अपनाने के बाद भी जब ग्यारह बजे रात  तक कोई नेटिव कब्र खोदने को तैयार नहीं हुआ तब  फोर्ब्स , मि० मुर्री असिस्टेंट पुलिस सुपरिन्टेन्डेन्ट एवं फारेस्ट कांसेर्वेटर  ने स्वयं कब्र खोदना प्रारंभ किया. इन्हे छह घंटे कब्र खोदने में लगे .  सुबह पांच बजे डा० सांडर्स के मृत शरीर को दफ़न किया गया. रातभर कब्रिस्तान में बिताने के बाद सब वापस लौटे. यह पूर्णिया के इतिहास की एक भयानक रात थी.

                                                                                          क्रमशः .....   

मंगलवार, 14 मई 2019

नवादा डायरी-2 (सहेबकोठी: 2010)


कल (२३//१०सावन की आखिरी सोमवारी थी नवादा में भी इसे शिव  भक्तो ने बड़ी धूम-धाम से मनाया, यूँ तो पुरे सावन महीने यहाँ बाबा वैद्नाथधाम जानेवाले   यात्रियों का ताँता लगा रहता है. झारखण्ड और दक्षिणी बिहार के कांवरियों का देवघर जाने और आने का यह एक सुगम मार्ग है. गत एक माह से यहाँ की मुख्य सड़को पर केसरिया रंग के आवरण में कांवरियों से भरे गाडियों में को चौबीसों घंटे देखे जा सकते थे

 इस शहर में भक्ति की ऐसी लहर चलती है की , सभी भोजनालय एवं  सामान्य फुटपाथी दुकानों पर भी खाने और नाश्ते के सामानों में लहसुन-प्याज का प्रयोग बंद कर दिया जाता है

नवादा शहर की ह्रदयस्थली साहेब कोठी में एक अति प्राचीन शिवालय अवस्थित है  यह मंदिर लगभग २५० वर्ष पुराना है   यहाँ के पुजारी ने बताया की वे अपने परिवार के पांचवी पीढ़ी के है उनके परिवार की पांचवी पीढ़ी एस मंदिर में पूजा करवा रही है  इस शिवालय में कई चीजे ऐसी है ; जो इसके और प्राचीन होने को स्थापित करती है  एस मंदिर का स्थापत्य आजकल के मंदिरों से बिलकुल अलग है  इसकी दीवारे २०-२५ इंच मोती है  आसपास के भू भाग से मंदिर का गर्भ-गृह - फीट नीची है  मंदिर में काले बैसाल्ट पत्थर की बनी कुछ मुर्तिया जो मध्यकाल या उससे पूर्व की है  यहाँ का शिव लिंग भी अद्भुत है शिवलिंग पर शिव की मुखाकृति अंकित है

मंदिर के पुजारी ने बड़े ही अच्छे ढंग से मंदिर और शिवलिंग को सजाया था। यदपि वह इसकी प्राचीनता से अनभिज्ञ था

बुधवार, 24 अप्रैल 2019

पूंजीवाद,समाजवाद, साम्राज्यवाद, उपनिवेशवाद और बिहार

पूँजीवाद उस आर्थिक व्यवस्था को कहते है जिसमे उत्पादन के साधनों पर निजी स्वामित्व होता है . निजी अर्थात किसी व्यक्ति या व्यक्ति के समूह का अधिकार रहता है.
समाजवादी / कम्यूनिस्ट  / मार्क्सवादी व्यवस्था में उत्पादन के साधनों पर समाज , कम्यून , या श्रमिको का अधिकार रहता है.
साम्राज्यवाद पूंजीवादी विकास का चरम रूप है.अर्थात साम्राज्यवाद पूंजीवादी विकास का वह चरण है जब एकाधिकार और वितीय पूंजी का प्रभुत्व स्थापित हो जाता है.
उपनिवेशवाद वास्तव में साम्राज्यवाद को विकसित करने का एक तरीका है.
2019 चुनाव में बिहार में सभी शक्तियाँ हावी है. 23 मई को परिणाम आने है , देखें किसे मैंडेट मिलता है.

शनिवार, 23 मार्च 2019

किशनगंज डायरी -2 : एक हुक्का, एक हाथी और सताइस पतलूनें

विलियम स्लेसर (WILLIAM SLESSOR ) का जन्म पुर्तगाल में हुआ 29 अक्टूबर 1778 को था. मृत्यु १८१० ईस्वी में किशनगंज में हुई, तब डुकारेल पुरनिया से जा चुके थे. उन दिनों यूरोप के युवाओं में ब्रिटेन के पूर्वी उपनिवेशों  का जबरदस्त आकर्षण था. "East is the carrier" का मुहावरा प्रचलित था. हर कोई भारत आाकर ईस्ट इंडिया कम्पनी में नौकरी या व्यापार करना चाहता था. नौकरी और व्यापर के बीच की सीमा रेखा बङी क्षीण थी . कंपनी कम वेतन देती थी बदले में उसने अपने अधिनस्थों को निजी व्यापर की भी छूट दे रखी थी. ईस्ट इंडिया कंपनी में कोई ओहदा पाकर, भारत जाने वाले जहाजी बड़े पर चढ़ जाना एक हसीन ख्वाब था. विलियम स्लेसर (WILLIAM SLESSOR ) के इस ख्वाब की तामीर सन् 1795 ईस्वी में हुई,



जब ईस्ट इंडिया कम्पनी के रंगरूट कैडेट बन 'FRANCIS' पर सवार हो भारत पँहुचे. उनके आँखों में एक ऐसी चमक थी जो पुरे कायनात को अपने आगोश में ले लेना चाहती थी.



इसके ठीक 223 साल बाद ओलिवा कोलमन (OLIVA COLMAN ) की आँखों में भी वैसी ही चमक थी जब वह अपने पूर्वजों की तलाश में किशनगंज आईं. पर चमक थोड़ी मद्धम तब पड़ जब, उन्हें यह पता लगा कि उनकी 3*परदादी के पिता विलियम स्लेसर किशनगंज में शिकार के दौरान अपनी ही गोली के शिकार हो गए थे.



यह खबर 13 जुलाई 1810 के " EVENING MAIL" में छपी थी. वे कई महत्वपूर्ण युद्धों में भाग लेने और पदोन्नति पाकर द्वितीय नेटिव इन्फेंट्री में कैप्टेन के पद पर सीमांत प्रदेश किशनगंज में कार्यरत थे. यही उन्हें एक स्थानीय लड़की से मोहब्बत हुई और उससे विवाह किया . (OLIVIA COLMAN ) की आँखों फिर वह चमक लौट आयी जब उन्हें पता चला की उनकी 3*परदादी की माँ भारतीय महिला थी. जब विलियम स्लेसर की मृत्यु हुई तो (OLIVIA COLMAN ) की 3*परदादी HARIET SLESSOR की उम्र मात्र तीन वर्ष की थी.



मृत्यु के उपरांत जो इन्वेंट्री बनी उसमे कई सामानों के साथ एक हुक्का, एक हाथी और 27 पतलूनों का जिक्र है. यह इन्वेंट्री एक अंग्रेज ऑफिसर के संस्कृतिकरण का बयान है.
 1810 में विलियम स्लेसर की मृत्यु के बाद इंग्लैंड से उनकी माँ ने उसकी 3 वर्षीय पुत्री  (HARRIET SLESSOR) को अपने खर्चे पर इंग्लैंड बुलवा लिया. छह माह की समुद्री यात्रा अकेले तय कर वह वंहा पंहुची. युवा होकर वह फिर भारत आयी शायद माँ की तलाश में .



यंहा ईस्ट इंडिया कंपनी के सैन्य अधिकारी CHARLES YOUNG BAZETT से दूसरा विवाह किया.
                ओलिवा कोलमन (OLIVIA COLMAN) एक सफल अभिनेत्री हैं. किशनगंज से लौटने के कुछ ही दिनों बाद


               2018 में ऐतिहासिक पृष्ठ भूमि पर बनी फिल्म 'THE FAVOURITE ' में 1708 में ब्रिटेन की महारानी QUEEN ANNE की भूमिका के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का 91वा ऑस्कर पुरस्कार मिला. 

शुक्रवार, 25 जनवरी 2019

बिहार विपश्यना और हरारी

42 वर्षीय इजरायली इतिहासकार युवाल नोआह्  रारी की पुस्तक "सेपियंस: ए ब्रीफ हिस्ट्री ऑफ़ ह्यूमन काइंड " अंग्रेजी में वर्ष 2014 में प्रकाशित हुई. इस पुस्तक ने  विश्व  को मानव विकास का एक नया सिद्धांत दिया. बिल गेट्स, मार्क जुकरबर्ग , बराक ओबामा और अन्य  सिलिकॉन वैली के बड़े खिलाड़ी  इसे पढ़ने की सलाह दे रहे है .हरारी ने ऐसी अद्भुत रचना का श्रेय विपश्यना पद्धति से किए गए ' मैडिटेशन ' को दिया  है. जो किसी विषय पर ध्यान केंद्रित करने की अद्भुत शक्ति देता है. महत्वपूर्ण और  गैर महत्वपूर्ण चीजों में अंतर समझने की अंतर्दृष्टि देती है. वरना सूचनाओं के बाढ़ में व्यक्ति का वजूद खत्म होता जा रहा है.

     
फेरारी गत 17 वर्षों से विपश्यना पद्धति से ध्यान का अभ्यास कर रहे हैं. उनका कहना है कि प्रारंभ में  10 सेकंड से ज्यादा अपने श्वास  पर ध्यान को केंद्रित नहीं कर पाते थे. पर अभ्यास से वर्तमान में प्रत्येक दिन 2 घंटे और वर्ष में 60 दिन विपश्यना का अभ्यास करते हैं उन्होंने स्वीकार किया है कि , यदि वे  विपश्यना के संसर्ग में नहीं आते  तो मध्यकालीन मिलिटेंसी पर आलेख लिख रहे  होते  या शोध कर रहे होते.

    विपश्यना चीजों को वास्तविक स्वरूप में देखने और समझने की शक्ति देता है, जो जिस रूप में है. 
         पुस्तक में यह  सिद्धांत प्रतिपादित किया गया है कि होमो सेपियंस अन्य सेपियंस से इसलिए अलग है क्योंकि वह अपने आसपास कहानियां गढ़ता है जिसका यथार्थ में कोई वजूद नहीं है. परंतु इन्हीं  फिक्शन और कहानियों के चलते वह विश्व पर राज कर रहा है. ध्यान से देखें तो हमारे दिमाग में हमारे आसपास 99% फिक्शन ही है. धर्म, सत्ता, कानून, रुपया, मानवाधिकार, सभी  इसी के अंग है. वे  उन चीजों के अस्तित्व को नकारते हैं जिनका कोई बायोलॉजिकल वजूद नहीं है.  
                   यह  दर्शन की एक बिल्कुल नई परिपाटी है. इन्होंने दर्शन के एक नई स्कूल का द्वार खोला है. विपश्यना योग और ध्यान की  एक प्राचीन पद्धति है जिसे  सिद्धार्थ ने ढाई हजार  वर्ष पूर्व बोधगया में  बोधि वृक्ष के नीचे पुनर्जीवित कर बुद्धत्व को प्राप्त किया था. उसके ढाई हजार साल बाद सत्यनारायण गोयनका जी  ने इसे पुनर्जीवित कर संपूर्ण विश्व में प्रसारित  किया ध्यान-पद्धति हरारी  तक पहुंची और " सेपियंस ", "होमो-डुएस" और "21 लेसन फ्रॉम 21स्ट सेंचुरी "  जैसी रचनायें  सामने आई.

शुक्रवार, 2 नवंबर 2018

पटना कॉलेज डायरी


(23 अक्टूबर 2018) 
कमलेश वर्मा हिंदी के ऐसोसिएट प्रोफेसर हैं सेवापुरी उत्तर प्रदेश में, हिंदी के प्रखर सेवक कहना ज्यादा उपयुक्त होगा. सन् 1989 से उनसे मेरा परिचय है, जब हम दोनों ने पटना कॉलेज के इंटर में दाखिला लिया था.
ऐसा कम ही होता है कि इंटर (आज का प्लस टू) में कोई मानविकी (Humanities) विषय लेकर पढ़ाई करें .
मैं अपने परिवार में पिछली तीन-चार पिढ़ियों में पहला व्यक्ति था जिसने इंटर से ही मानविकीय विषय की पढ़ाई की.




कमलेश जी जैक्सन छात्रावास में गये मैं मिंटो में,  पटना कॉलेज की दाखिले की सूची में कमलेश जी का नाम शीर्ष पर था. कई छात्रों के साथ मैं भी आश्चर्य में था की 728 (कुल 900 में) नंबर लाकर इस लड़के ने साइंस कॉलेज में दाखिला क्यों नहीं लिया.
यही जिज्ञासा प्रारंभिक जुड़ाव का कारण बनी. उन दिनों मैट्रिक में 700 अंको का बैरियर तोड़ पाना एक चुनौती थी.
700 अर्थात 78% आजकल सी.बी.एस.ई की परीक्षा में 94% से कम नंबर आते मैंने किसी को नहीं सुना .मिंटो हॉस्टल में आकर पहली बार मुझे जाति-व्यवस्था के पद सोपान की जानकारी हुई. इससे पहले मैं जमशेदपुर में था, वहाँ मरे स्कूल में जाति का मतलब उड़ीया,तामिल,मद्रासी,बँगली,गुजराती,सरदार(पँजाबी),क्रिश्चन,इत्यादि था जहाँ मेरी जाति का मतलब बिहारी था. 
                                छात्रावास में बिहार के विभिन्न जिलों से छात्र आये थे जो ग्रामीण पृष्ठभूमि के थे. यहीं मुझे ज्ञात हुआ कि जाति-व्यवस्था की संरचना में मैं कहाँ हूँ.
पर, कुछ अच्छी बातें भी हुई, सुभाष झा और अभय जैस अन्तेवासियों न मेरा परिचय मिथिला संस्कृति से कराया. सुभाष ने पहली बार मुझे एक मैथिलि गीत सुनाया
         "घर में बैठल हत सजनिया डिबिया बार-बार के,
         सीता बाट तकै छत पि के डिबिया बार-बार के,"
मैं इसे बार-बार सुनने की जिद करता पर, हर बार मुझे कोई नया मैथिलि गीत सुना जाता.
          कमलेश जी की दो चीजों का कायल मैं आज भी हूँ, पहली हस्तलिपि और दूसरी पुस्तकों को सहेज कर रखने की कला. उनकी सभी पुस्तकों पर सलीके से भूरे रंग की जिल्द लगी होती; उस पर सुंदर हैंडराइटिंग में पुस्तक लेखक और कमलेश वर्मा का नाम काले स्केच पेन से लिखा होता. अक्षर ऐसा मानो मोती रख दिए गए हो. जगन्नाथ गुप्ता भी पुस्तकों पर बड़ी अच्छी जिल्द लगाते थे "टाइम्स ऑफ इंडिया" का रविवारीय अंक के चिकने पन्ने पढ़ने से ज्यादा जिल्द लगाने के काम आता था.
उनके जिल्द लगाने के तरीके में अखबार का कोई भी हिस्सा व्यर्थ नहीं जाता था. 
         इंटर की परीक्षा के बाद पटना कॉलेज से दिल्ली की ओर जबरदस्त पलायन हुआ जिसमें सदन झा, विभांशु शेखर, आनंद गुप्ता, इमामुद्दीन अहमद ,अभय, आलोक शुक्ला, अलोक झा, अतुल, सुजीत चौधरी और कई सहपाठी  जिनका नाम  अब मुझे याद नहीं है बह गए. बच गया मैं, कमलेश वर्मा, प्रवीण, रंजन धिमल, अमर, जगन्नाथ गुप्ता, उमेश, ब्रजेश, सौमित्र , सुजीत घोष, प्रमेंद्र, अनुराधा,अश्विनी,नितेश और कई जिनका नाम अब स्मरण में नहीं है. 
     इनमें से कुछ मित्रों ने मिलकर "जिज्ञासा" का गठन किया "अ क्यूजिंग एंड डिबेटिंग सोसायटी" जिसका सदस्य मैं भी था. राजनीति विज्ञान विभाग का बड़ा हॉल हमारा अड्डा हुआ करता था. यहाँ सप्ताह में दो बैठकें होती जिसने हम सबों को धार दी. वही अरुण कमल वाली धार.
 "सब तो लिया उधार,
 सारा लोहा उन लोगों का
 अपनी केवल धार" 
बची-खुची शान कॉलेज के विद्वान शिक्षक इम्तियाज अहमद सर, आर० एन० नंदी सर, भारती संतोष कुमार मैडम, ओम प्रकाश सर, प्रशांत दत्ता सर ने चढ़ा दिया. 
     चूंकि बैठकें राजनीति विज्ञान विभाग के क्लास रूम में होती थी इसलिए राही सर को जिज्ञासा का संरक्षक बनाया गया था. 
                      मैंने इतिहास में और कमलेश जी ने हिंदी साहित्य में स्नातक की परीक्षा 'सम्मान' के साथ पास कर प्रतिष्ठा प्राप्त की. अन्य मित्रों ने भी अपने-अपने विषय में 'सम्मान' के साथ प्रतिष्ठा प्राप्त किया .कमलेश जी हिंदी की साधना में लग गए वे जे० एन0 यू ० चले गए और मैं नौकरी के तलाश की साधना में लग गया. कुछ मित्रों-सहपाठियों ने नौकरी की प्रतियोगिता परीक्षा देने के लिए संपूर्ण भारत की यात्रा की जिसे हम परीक्षाटन कहते थे .
                                                         कमलेश जी के साथ सौमित्र ,सुजीत और विभांशु शेखर जैसे कुछ सहपाठी भी जे० एन० यू० चले गए, इनसे मेरा पत्राचार होता रहता था .कुछ पत्र आज भी सुरक्षित है उस समय मुझे अहसास नहीं था कि, पत्र-युग  का होने वाला है. यह बीसवीं शताब्दी के अंतिम दशक के उत्तरार्ध का काल था. हम 21वीं सदी के मुहाने पर खड़े थे. पत्र-युग के अंत की दस्तक सुनाई देने लगी थी. लोगों का पत्र लिखना घट गया था. मुझे एक ऐसा पत्र भी मिला जिसमें एक ही पन्ने के आगे और पीछे दो अलग-अलग मित्रों ने पत्र लिखा था एक ओर सौमित्र ने दूसरी ओर सुजीत ने. 21वीं सदी के साथ मोबाइल का जमाना आया और पत्र लिखना लोग भूलते गए. हम कह सकते हैं कि मोबाइल ने पत्र की हत्या कर दी.
                       मेरी जानकारी में कमलेश जी ने हिंदी के लेक्चरर के अलावा किसी नौकरी के लिए कोई परीक्षा नहीं दी. जिस लक्ष्य को लेकर चले थे उसे हासिल कर लिया. जे० एन० यू० से लौटे सुचिता जी के साथ, पर बनारस में ही रह गये. नौकरी ने उन्हें रोक लिया.


"जाति के प्रश्न पर कबीर" पुस्तक के साथ हिंदी आलोचना जगत के शीर्षस्थ आलोचकों में उनका नाम गिना जाने लगा. यह पुस्तक कबीर के संबंध में इस विषय पर तमाम स्थापनाओं को चुनौती देता हुआ सामने आया और तर्क की कसौटी पर खरा है. धर्मी-विधर्मी सभी इसे पढ़कर हाँफ रहे हैं.कुछ बाई में अल-बल बोल रहे है, पर अब तक किसी ने ऐसा तर्क प्रस्तुत नहीं किया है जिसके आधार पर इस पुस्तक मे प्रतिपादित स्थापनाओं को काटा जा सके. हिंदी साहित्य से ज्यादा महत्वपूर्ण यह पुस्तक समाजशास्त्र के अध्येता के लिए है. कमलेश जी अपनी तमाम गुरुजनों के प्रति श्रद्धा भाव रखते हुए गुरु-ऋण स्वीकारने वाले, अपवाद छात्रों में से है. परंतु साहस इतना की नैतिक भय के बावजूद गुरु द्वारा प्रतिपादित सिद्धांत की आलोचना करते हैं और नैतिक भय को स्वीकारते भी हैं . पर गुरु तो गुरु शिष्य की उपलब्धि पर आशीर्वाद ही देते हैं. हिंदी साहित्य को कमलेश जी और सुचिता जी का दूसरा अवदान "प्रसाद काव्य कोश " है

जो उनके 10  बर्षों के श्रम का प्रतिफल है. यह पुस्तक विश्वविद्यालय और अध्यापकों के लिए एक अनिवार्य संदर्भ ग्रंथ बन चुका है. यही कारण है कि प्रकाशन के 10 महीना के अंदर ही इसकी सभी प्रतियां बिक चुकी है. हिंदी साहित्य में ऐसा कम ही सुनने को को मिलता है.
               हिंदी आलोचना के दो ध्रुवों पर बैठे गुरु पर समभाव से संतुलित पुस्तक और पत्रिका निकालना कमलेश वर्मा और सुचिता वर्मा जैसे शिष्य से ही संभव है.
मैनेजर पांडे पर पुस्तक "आलोचना का शुक्ल पक्ष"  और वीर भारत तलवार पर केंद्रित  "सत्राची" पत्रिका के विशेषांक  का संपादन; इससे बेहतर गुरु को सम्मान देने का तरीका और क्या हो सकता है.
परसों अचानक उनका फोन आया की वे पटना आए हुए और रंजन धिमल के साथ कल आ गए. यह मुलाकात लगभग 20 वर्ष बाद हुई थी पर जीवंतता वही जैक्शन-मिंटो वाली. हम तीनो नें पुराने दिनों को याद किया. हम तीनों ने कुछ सामाजिक वर्जना को तोड़ा था जो कहीं ना कहीं रूढ़ियों के प्रति विद्रोह की अभिव्यक्ति थी कालांतर में सभी ने इसे सहर्ष स्वीकार किया.
समकालीन हिंदी साहित्य के प्रमुख हस्ताक्षर अरुण नारायण भी थोड़ी देर में आ गए, फिर कुछ साहित्य चर्चा हुई. कमलेश जी ने शाम का कार्यक्रम तय किया. बोझिल मनसे कमलेश जी को विदा कहा.

कल शाम वे गुरुवर श्री नंदकिशोर नवल जी, साहित्यकार प्रेम कुमार मणि जी एवं अन्य कुछ लोगों से मिलकर आज पटना से बनारस के लिए प्रस्थान कर गए .उनका संदेश आया "वापसी की यात्रा शुरू हो गयी" 
                                      कॉलेज के दिनों को याद करता हूँ तो पाता हूँ कि कमलेश जी पटना से दिल्ली गए दिल्ली से फिर पटना नहीं  बनारस में ही ठहर गए. सदन झा दरभंगा से पटना पटना से दिल्ली, दिल्ली से सूरत चले गए, सुजीत घोष पटना से दिल्ली, दिल्ली से विभिन्न देशों में समय व्यतीत कर रहे हैं. सौमित्र मोहन पटना से दिल्ली के दिल्ली से पश्चिम बंगाल चले गए, विभांशु शेखर नवादा से पटना, पटना से दिल्ली, दिल्ली से अमेरिका चले गये रोजगार की तलाश में माइग्रेशन एक अनिवार्य शर्त है . आलोक शुक्ला जैसे कुछ ही लोग दिल्ली से लौट कर वापस अपने घर आये.एक दिन  मैं सोच रहा था की आज मैं जिस घर में रह रहा हूं वह मेरे जीवन का 20वां घर है. पिताजी की नौकरी और अपनी नौकरी के कारण लगातार माइग्रेशन जारी है . यहाँ माइग्रेशन पर हाल ही में प्रकाशित सदन झा के आलेख "From calcutta comes my husband, From Darbhanga he comes....का जिक्र करना अप्रसांगिक न होगा.

सोमवार, 29 अक्टूबर 2018

पूर्णिया डायरी-11 (मिसेज डुकारेल का सच/ Truth of Mrs ducarel)

इस पोस्ट को पढ़कर पूर्णिया वासियों को थोड़ी हताशा हो सकती है. पर इसे एक ना एक दिन आना ही था, बहुत दिनों तक मैं इसे जब्ब कर नहीं रख सकता. इतिहास पर किसी का बस नहीं है, इसमें कल्पना की जरा भी गुंजाईश नहीं होती. न जाने किस परिस्थिति में अबू तालिब ने 336 पन्नों के यात्रा वृतांत में एक पंक्ति लिखी की वह मिसेज डूकारेल(Mrs Ducarel ) से मिला, जिसे गेर्राड गुस्टावस डुकारेल(Gerard Gustavus Ducarel) ने पति की चिता (सती होने जा रही स्त्री ) से उतारकर विवाह किया था .
                                                इस पंक्ति ने 204 साल बाद पूर्णिया में तूफान ला दिया समाचार पत्रों ने बिना तथ्यों की पड़ताल किए धड़ा-धड़ इसे एक अद्भुत प्रेम कहानी बता, चटकारे लेने लगे. 18वीं सदी के पूर्णिया  पर शोध के क्रम में  अन्य समकालीन साक्ष्यों की गहरी पड़ताल से यह ज्ञात हुआ कि गेर्राड गुस्टावस डुकारेल(Gerard Gustavus Ducarel)ने जिस महिला से विवाह किया था वह मुसलमान थी.
                                  डुकारेल के बाद की पीढ़ी के लोगों ने जो वंशावली दी है उसमें गेर्राड गुस्टावस डुकारेल(Gerard Gustavus Ducarel)की पत्नी को पूर्णिया के महाराजा की बेटी बताया गया है. वंशावली के विभिन्न मानक वेबसाइटों में उसके निम्नांकित नाम दिए हैं
 कहीं जेबुन्निसा
 https://gw.geneanet.org पर जरफान्निशा खानम 

कहीं  सर्फुलनिशा खानम दर्ज  है.
                      इनका जन्म 1758 ईस्वी में और मृत्यु 1822 में इंग्लैंड में बताया गया है. इंग्लैंड जाने के बाद उन्होंने ईसाई धर्म को अंगीकार कर बपतिस्मा (Baptism) लिया था . अलग-अलग वंशावली वेबसाइट पर गेर्राड गुस्टावस डुकारेल(Gerard Gustavus Ducarel)के परवर्ती पीढ़ी के अलग-अलग लोगों ने सूचनाएं दी है, इनमें एक समरूपता है कि सभी ने मिसेज डूकारेल(Mrs Ducarel )को मुसलमान बताया है .
                इस संदर्भ में दूसरे  महत्वपूर्ण अभिलेखीय साक्ष्यों, का जिक्र करना भी जरूरी है, जिसके अध्ययन से यह कहने की गुंजाइश नहीं रह जाएगी कि गेर्राड गुस्टावस डुकारेल(Gerard Gustavus Ducarel)ने किसी हिंदू विधवा (जिसे सती होने के लिए पति कि चिता पर बैठाया जा रहा था ) से विवाह किया था. ये अभिलेख है इंग्लैंड की राष्ट्रीय अभिलेखागार में रक्षित  डुकारेल पेपर(Ducarel paper), जिसे डुकारेल परिवार के परवर्ती वंशज पी0जे0 पामर (P.J.Palmer)ने जमा किया था इसमें वर्ष 1784 से 1796 तक  गेर्राड गुस्टावस डुकारेल(Gerard Gustavus Ducarel)के वे पत्र शामिल है जो भारत से उनके मित्र,एटार्नी और ईस्ट इंडिया कंपनी के सेवकों ने व्यक्तिगत संबंध के कारण भेजा था. इसमें कुछ पत्रों का उल्लेख यहां करना मैं आवश्यक समझता हूँ. 
12 फरवरी 1788 को जेम्स कॉली (James Collie) जो वर्द्धमान में सर्जन थे, ने गेर्राड गुस्टावस डुकारेल(Gerard Gustavus Ducarel)को लिखे पत्र में मिसेज डूकारेल(Mrs Ducarel )भाई मिर्जा आलम बेग(Mirza Allam Beg)का जिक्र किया है, जिन्हें भत्ता (allowance ) मिलने में कुछ कठिनाई का सामना करना पड़ रहा था . 
27 फरवरी 1788 को थॉमस शॉट(Thomas Short जो कभी डुकारेल के सहायक हुआ करते थे) ने कोलकाता से  गेर्राड गुस्टावस डुकारेल(Gerard Gustavus Ducarel)को भेजे गए एक पत्र में मिसेज डूकारेल(Mrs Ducarel )के भाई मिर्जा आलम बेग को ॠण के कारण हो रही कठिनाइयों का जिक्र किया है.
 15 अक्टूबर 1788 को थामस शाट(Thomas Short ) ने मिर्जा बेग की नियुक्ति में मदद करने में असमर्थता व्यक्त की.
माह जनवरी एवं 26 फरवरी 1789 जेम्स कॉलिंग(James Collie) जो वर्द्धमान में सर्जन थे ने गेर्राड गुस्टावस डुकारेल(Gerard Gustavus Ducarel)को भेजे पत्र में मिसेज डूकारेल(Mrs Ducarel )के परिवार मिर्जा फैमिली को एक लॉ सूट दाखिल होने से हो रही कठिनाइयों का जिक्र किया है 
2 नवंबर 1789 जेम्स कॉलिंग(James Collie)ने बर्द्धमान से मिसेज डूकारेल(Mrs Ducarel )के भाई मिर्जा आलम बेग के बीमारी की सूचना दी है. 
      इन पत्रों में मिसेज डूकारेल(Mrs Ducarel )के भाई का बार-बार जिक्र है.मिसेज डूकारेल(Mrs Ducarel )का मिर्जा फैमिली से होना यह प्रमाणित करता है कि वह एक भारतीय मुसलमान थी जो बाद में ईसाइ धर्म को अंगिकार कर एलिजाबेथ हो गई थी. 
                संभव है अबू तालिब ने  किसी सुनी-सुनाई बात पर यात्रा वृतांत में  यह टिप्पणी दर्ज कर दी हो. या फिर फारसी में लिखे गए यात्रा वृतांत के अनुवादक ने औपनिवेशिक सर्वोच्चता के लिये एक अंग्रेज अफसर का महिमामंडन कर दिया हो.
जो भी हो इन तथ्यों से न तो डुकारेल की प्रेम कहानी के ओज पर कोई प्रभाव पड़ता है ना ही उसके जेंटलमैन वाले व्यक्तित्व पर.

रविवार, 7 अक्टूबर 2018

वाणावर डायरी-6 (बाबा सिद्धनाथ प्राचीन मंदिर/ancient temple of vanavar )

प्राचीन वाणावर सिद्धनाथ मान्दिर में  सातवीं शताब्दी से भक्तों की निरंतरता बनी हुई है.
यह भारत के उन दुर्लभ मन्दिरों मे से एक है जहाँ हजार वर्षों से जागृत पूजा-पाठ हो रहा है. इसके दीवार की चौड़ाई 4 फुट से अधिक है.
छत पत्थर के स्तंभ पर टिका का है जो  पत्थर के चौड़े सलेब्स से बना है यह नागर शैली के स्थापत्य कला की विशेषता है.


पर्वत के शिखर पर शिवलिंग है जो गर्भगृह के अंदर है. गर्भगृह के बाहरी दरवाजे पर दाएं-बाएं गणेश की मुर्ति है. मंडप के पश्चमी भाग में दो बड़ी मूर्तियां हैं जो मां पार्वती के रूप में जानी जाती है. इसी प्राचीन मन्दिर को बिना छेड़-छाड़ किये "बाबा सिद्धनाथ मंदिर सेवा समिति" ने इसका जिर्णोद्धार किया.
(तस्वीर: सौजन्य श्री रविशंकर एवं श्री सत्यप्रकाश )